loader

वित्तमंत्री की ग़लतबयानी कि सरकार को नहीं पता प्रवासी मज़दूरों की संख्या

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण क्यों कहने लगी हैं कि प्रवासी मज़दूरों से सम्बन्धित कोई आँकड़ा देश में है क्या? वह कहती हैं कि बग़ैर आँकड़ों के सरकार ये कैसे तय कर सकती है कि उसे किन-किन लोगों तक मदद पहुँचानी है? माना कि 2014 से पहले तक देश ‘निकम्माकाल’ में रहा। लेकिन बीते छह साल की कर्मठता में तो कोई कसर नहीं हो सकती। फिर भी प्रवासी मज़दूरों का डाटाबेस क्यों नहीं बना? 
मुकेश कुमार सिंह

सरकारें जब जनता के आक्रोश से डरने लगती हैं तब तरह-तरह के भ्रम फैलाती हैं। इन्हें अब साफ़ दिख रहा है कि कोरोना संकट से जुड़ी उसकी रणनीतियाँ औंधे मुँह गिर चुकी हैं। समाज के विशाल तबक़े तक सरकारी दावों और इरादों का ज़मीनी सच बेपर्दा होकर पहुँच रहा है। उधर, सरकारी नाकामियों पर पर्दा डालकर जनता को बरगलाने के लिए वित्तमंत्री जैसे सर्वोच्च स्तर से आये दिन नये-नये भ्रम फैलाये जा रहे हैं।

14 मई को जब वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन प्रवासी मज़दूरों के लिए कोरोना राहत पैकेज का ब्यौरा दे रही थीं, तब उन्हें अनुमान था कि देश में प्रवासी मज़दूरों की क्या तादाद है? लेकिन लगातार पाँच दिनों तक पैकेजों का पिटारा खोलने के बावजूद वित्तमंत्री के ख़ज़ाने से राहत के नाम पर 21 में से सिर्फ़ 2 लाख करोड़ रुपये ही निकले।

हालात जब ‘काटो तो ख़ून नहीं’ वाले हो गये तो 20 मई को वित्तमंत्री के मीडिया मैनेजरों ने एक के बाद एक, कई मीडिया संस्थानों को बुलाकर उन्हें अलग-अलग इंटरव्यू देने की बौछार कर दी। अब तक प्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा को लेकर देश भर से तमाम ऐसी ख़बरें आने लगी थीं जो किसी का भी दिल-दहला दें। लिहाज़ा, डैमेज कंट्रोल ने लिए वित्तमंत्री ने सरकार के चिर-परिचित हथकंडे का इस्तेमाल किया गया। वित्तमंत्री कहने लगीं कि ‘मैं किसी को दोष नहीं देना चाहती लेकिन बताइए कि प्रवासी मज़दूरों से सम्बन्धित कोई आँकड़ा देश में है क्या? कहाँ है? बग़ैर आँकड़ों के सरकार ये कैसे तय कर सकती है कि उसे किन-किन लोगों तक मदद पहुँचानी है?’

ताज़ा ख़बरें

वित्तमंत्री का यह बयान यदि सच होता तो किसी को जितनी हमदर्दी पैदल सड़क नाप रहे प्रवासियों से होती, शायद उतनी ही सरकार की लाचारी के प्रति भी होती। लेकिन वित्तमंत्री सच नहीं बता रही थीं। प्रवासी मज़दूरों की संख्या या ‘डाटाबेस’ को लेकर वो देश को ग़ुमराह कर रही थीं क्योंकि जनता में अपनी सरकारों के प्रति आक्रोश बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। ये दिनों-दिन विस्फोटक होता जा रहा है। अब तो सभी को दिख रहा है कि लॉकडाउन का रास्ता चुनते वक़्त सरकार ने प्रवासी मज़दूरों पर गिरने वाली आफ़त का कोई आकलन ही नहीं किया।

तो आख़िर में सवाल देश में कितने प्रवासी मज़दूर हैं? सही जबाब के लिए सबसे पहले वित्त मंत्री के ही 14 मई वाले पैकेज का रुख़ करते हैं। उस दिन वित्त मंत्री ने कहा था कि ‘प्रवासी मज़दूरों के पास चाहे राशन कार्ड हो या नहीं हो, लेकिन उन्हें दो महीने का राशन मुफ़्त दिया जाएगा। इसके तहत, 5 किलो चावल या गेहूँ और एक किलो चना प्रति परिवार प्रति माह दिया जाएगा। इसके लिए 8 लाख टन अनाज और 50,000 टन चना आबंटन होगा। इस काम पर 3,500 करोड़ रुपये ख़र्च होंगे।’

अब सवाल यह है कि ये ‘8 लाख टन, 50,000 टन और 3,500 करोड़ रुपये’ वाले आँकड़े आये कहाँ से? इन्हीं आँकड़ों में ही वित्तमंत्री की ग़लतबयानी छिपी हुई है। क्योंकि 5 किलो अनाज प्रति परिवार, दो महीने में बाँटने पर लाभान्वित परिवारों की संख्या का हिसाब बहुत सीधा है। प्रति परिवार 10 किलो अनाज और 2 किलो चना का मुफ़्त वितरण। इस दर से 1 टन (1000 किलोग्राम) अनाज 100 लोगों में बँटेगा तो 8 लाख टन के लाभार्थी 8 करोड़ परिवार होंगे। इसी तरह, 500 प्रवासी मज़दूरों के परिवारों के बीच जब 1 टन चना बँटेगा तो 50,000 टन चना के लाभार्थी 2.5 करोड़ परिवार होंगे।

साफ़ है कि 2.5 करोड़ नसीब वाले प्रवासी मज़दूरों के परिवार को तो अनाज के साथ चना भी मिलेगा। लेकिन बाक़ी बचे 5.5 करोड़ परिवारों को सिर्फ़ अनाज से गुज़ारा करना पड़ेगा। उन्हें चना नहीं मिल पाएगा। मुमकिन है कि वित्त मंत्री और उनके अफ़सरों को पूर्वाभास हो गया हो कि ढाई करोड़ के बाद बाक़ी बचे 5.5 करोड़ प्रवासी मज़दूर मुफ़्त वाला सरकारी चना लेने से इनकार कर देंगे।

इस हिसाब-किताब से इतना तो पक्का है कि 14 मई को वित्तमंत्री जानती थीं कि देश में कम से कम 8 करोड़ ऐसे प्रवासी मज़दूर तो हैं ही जिन्हें मुफ़्त अनाज वाली मदद की ज़रूरत है।

मुमकिन है कि सरकार ने मान लिया होगा कि जो प्रवासी मज़दूर 8 करोड़ के अलावा होंगे, वो इतने ‘सम्पन्न’ हैं कि कोरोना संकट के दौरान भी या तो अपने बूते जी लेंगे या फिर सरकारी राशन की ‘मुफ़्तख़ोरी’ करने से पहले ही अपने गाँवों की ओर लौटने लगेंगे। अब सवाल है कि ऐसे तथाकथित सम्पन्न प्रवासी मज़दूरों की संख्या क्या होगी? वित्तमंत्री भले ही डाटाबेस की दुहाई देकर ऐसे सम्पन्न प्रवासियों से नज़रें फेर लें, लेकिन सरकार के पास इसका अनुमान भी मौजूद है। 

आर्थिक सर्वेक्षण क्या कहता है?

2016-17 में केन्द्रीय बजट के पेश होने से एक दिन पहले लोकसभा में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में एक अध्याय है – India on the Move and Churning: New Evidence। इसमें 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमणियम ने लिखा था कि देश में कुल श्रम-शक्ति 48.2 करोड़ लोगों की है। इसमें से हर तीसरा कामगार प्रवासी मज़दूर है। उनका अनुमान था कि 2016 तक ये संख्या 50 करोड़ को ज़रूर पार कर गयी होगी। इस तरह, यदि हम ये मान भी लें कि कोरोना की दस्तक से पहले भले ही भारत बेरोज़गारी के 45 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़ चुका था, तो ये अनुमान ग़लत नहीं होगा कि अभी देश में तक़रीबन 17 करोड़ प्रवासी मज़दूर तो होंगे ही।

इसी सर्वे में अरविंद सुब्रमणियम कहते हैं कि प्रवासी मज़दूरों की संख्या कुल कामगारों के 17 से 29 फ़ीसदी के बीच हो सकती है। इसका औसत 24 फ़ीसदी बैठता है। यानी, इस हिसाब से भी कुल 50 करोड़ कामगारों में से 12 करोड़ तो प्रवासी मज़दूर होंगे ही।

लेकिन यदि कोई चाहे तो यही मानता रहे कि 2016 की नोटबन्दी के बाद से लगातार गहराती गयी आर्थिक मन्दी के बावजूद 2020 आते-आते 12 करोड़ में से 4 करोड़ प्रवासी मज़दूर अपेक्षाकृत सम्पन्न समझे जाने वाले मध्यम वर्ग में पहुँच गये। इसीलिए, वित्तमंत्री ने 8 करोड़ प्रवासी मज़दूरों के परिवारों को ही मुफ़्त अनाज पाने का लाभार्थी मानने की सोची।

ज़ाहिर है, यदि वित्तमंत्री 8 करोड़ की फ़िक्र कर सकती हैं तो उन्हें 12 करोड़ के लिए मुफ़्त राशन का एलान करने में भला क्या दिक्कत होती? बस, इस राहत के फंड को 3,500 करोड़ की जगह 5,250 करोड़ रुपये तो ही करना पड़ता। इतने से इज़ाफ़े का इन्तज़ाम 21 लाख करोड़ के ‘मेगा पैकेज’ में क्यों नहीं हो जाता? कमोबेश, यही बातें सीतारमण ने अपने इंटरव्यू में कहीं। 

डाटा मोदी सरकार के पास क्यों नहीं? 

अब रुख़ करें इस बात पर कि प्रवासी मज़दूरों का जैसा ‘प्रमाणिक’ डाटाबेस वित्तमंत्री चाहती हैं, आख़िर वो मोदी सरकार के पास है क्यों नहीं? हम जानते हैं कि मोदी सरकार ने सैकड़ों बेकार और पुराने क़ानूनों को ख़त्म करके दिखाया है। लेकिन ‘Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Services) Act, 1979’ को तो मोरारजी देसाई वाली उस जनता पार्टी की सरकार ने बनाया था, जिसमें अटल जी विदेश मंत्री और आडवाणी जी सूचना और प्रसारण मंत्री थे। इस क़ानून को 11 जून 1979 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। लेकिन इसे 01 जून 1987 को लागू किया राजीव गाँधी की सरकार ने।

माना कि कांग्रेस की सरकारें निकम्मी थीं, लेकिन 1987 से लेकर अब तक के 37 वर्षों में वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिम्हा राव, वाजपेयी, देवेगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे कितनी सरकारें आकर चलीं गयीं, किसी ने भी संसद के क़ानून के मुताबिक़ प्रवासी मज़दूरों का वैसा डाटाबेस बनाने की कोशिश क्यों नहीं की? उन्हें मंत्री पद की शपथ को तोड़ते हुए झूठ नहीं बोलना पड़ता। 

माना कि 2014 से पहले तक देश ‘निकम्माकाल’ में रहा। लेकिन बीते छह साल की कर्मठता में तो कोई कसर नहीं हो सकती। फिर भी प्रवासी मज़दूरों का डाटाबेस क्यों नहीं बना? यहाँ तक कि 2016 वाला आर्थिक सर्वेक्षण भी चार साल पुराना है। फिर भी डाटाबेस अभी तक क्यों नदारद है?

किसकी मजाल है कि वो वित्त मंत्री से ऐसे बुनियादी प्रति-प्रश्न कर सके? पत्रकारों के वश का भले ही ना हो, लेकिन सांसदों ने संसद में सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत ज़रूर दिखायी। अभी ‘जनता कर्फ्यू’ के अगले दिन 23 मार्च को केन्द्रीय श्रम राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) सन्तोष गंगवार ने सांसदों को बताया कि ‘सरकार के पास प्रवासी मज़दूरों की संख्या को लेकर न तो कोई अनुमान है और ना ही 1979 के बाद से अभी तक मज़दूरों के आवास, सेहत और सुरक्षा को लेकर कोई अध्ययन ही किया गया है।’

इसी दिन एक अन्य प्रश्न के जबाब में सन्तोष गंगवार बताते हैं कि ‘Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Services) Act, 1979 को प्रभावी बनाने के लिए देश में केन्द्रीय मुख्य श्रम आयुक्त के नेतृत्व में एक सुगठित तंत्र मौजूद है। इसके बावजूद प्रवासी मज़दूरों की दशा से सम्बन्धित कोई आँकड़ा इसलिए सरकार के पास नहीं है क्योंकि ये मज़दूर कभी यहाँ तो कभी वहाँ आते-जाते रहते हैं।’

विचार से ख़ास

साफ़ है कि वित्तमंत्री और श्रम मंत्री दोनों ही विरोधाभाषी बातें कर रहे हैं। ये ऐसी झूठी बहानेबाज़ियाँ हैं जिनका मक़सद पारदर्शिता का शासन देना नहीं बल्कि तथ्यों को छिपाकर जनता को बरगलाने का है। तभी तो सरकार अपने इन्हीं लिखित जवाबों में संसद को बताती है कि ‘1979 के उपरोक्त क़ानून के मुताबिक़, मज़दूरों को न्यूनतम वेतन, आवागमन भत्ता, पुनर्स्थापन भत्ता, निवास, चिकित्सा सुविधाएँ और सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाया जाता है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना (PM-SYM) के तहत असंगठित क्षेत्र के वृद्ध मज़दूरों को ‘योग्यतानुसार’ पेंशन भी दी जाती है।’

ऐसे दावों का सच ही प्रवासी मज़दूरों की आपबीती है। वैसे, इत्तिफ़ाक़ से ऐसी तमाम हवा-हवाई बातें भी अब बेमानी हो चुकी हैं क्योंकि देश के छह बड़े राज्यों – मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और गोवा ने तीन साल के लिए तमाम श्रम क़ानूनों को स्थगित करने की अधिसूचना को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेज दिया है। ज़ाहिर है कि ज़मीन पर तो सिर्फ़ इतना दिख रहा है कि सरकार ने प्रवासी मज़दूरों पर जितना रहम खाया है, उससे कहीं ज़्यादा सितम किया है। अब आप चाहें तो सरकारों की वाहवाही करते रहें।

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता प्रमाणपत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
मुकेश कुमार सिंह
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

विचार से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें