ट्रंप युग, युद्ध, नफरत, हिंसा, झूठ और दमन के दौर में दुनिया और भारत किस ओर जा रहे हैं? क्या अच्छाई का कोई रास्ता बचा है- पढ़िए, अरुण कुमार त्रिपाठी की क़लम से एक वैचारिक विश्लेषण।
देश-दुनिया बुरे दौर से गुजर रही है। पिछला साल काल की लंबी डोर में कई गांठें लगा गया। अच्छाई ने उन्हें खोलने की कोशिशें कीं, कुछ गांठें खुलीं लेकिन कुछ और उलझ गईं। आशा की जाती है कि चंद दिन पहले शुरू हुआ नववर्ष नई गांठें नहीं लगने देगा और पुरानी कई गांठों को खोलेगा। आक्रामक राष्ट्रवाद की बुरी प्रवृत्तियों पर सवार होकर अमेरिकी राष्ट्रपति की सत्ता तक दोबारा पहुंचे डोनाल्ड ट्रंप ने देश और दुनिया को अपने ढंग से हांकने की कोशिश की। चाहे अप्रवासियों को वापस उनके देश भेजने का सवाल हो या राष्ट्रहित और रूस और यूक्रेन युद्ध के बहाने भारत समेत दूसरे देशों पर सीमा शुल्क लगाने का मामला हो, मानव समुदाय के बड़े हिस्से के लिए तनाव और परेशानी का सबब बना। नागरिकता छीनने, शैक्षणिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के उपायों से अमेरिकी जनता भी बहुत परेशान हुई। उसने ‘नो किंग्स प्रोटेस्ट’ से न सिर्फ पूरे देश को झकझोर दिया बल्कि पूरी दुनिया को एक प्रेरणा भी दी कि बुराई भले सत्तासीन हो जाए लेकिन अच्छाई ने अभी तक हार नहीं मानी है। बुराई को चुनौती देते हुए प्रोफेसर महमूद ममदानी और मीरा नायर के बेटे जोहरान ममदानी ने न्यूयॉर्क के मेयर का चुनाव जीतकर उम्मीद की लौ को तेज भी किया है।
इस माहौल में चाहे अपना चुनावी वायदा पूरा करने के लिए या फिर नोबेल पुरस्कार पाने के लिए ही सही ट्रंप ने इस सदी के सबसे क्रूर युद्ध यानी इसराइल के फिलस्तीन हमले पर विराम करवाया। लेकिन फिलस्तीनियों को उनका हक नहीं दिलवाया। उल्टे हर किस्म के झूठ और भ्रष्टाचार में फंसे और बुराई के प्रतीक इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को उनके देश में बचाने के लिए भी हस्तक्षेप भी किया। लेकिन अच्छाई का प्रदर्शन करने का उनका प्रयास रूस और उक्रेन युद्ध को रुकवाने में सफल नहीं हो सका। शायद इस असफलता की भरपाई करने के लिए वे निरंतर ऑपरेशन सिंदूर रुकवाने की सच्ची-झूठी रट लगाए हुए हैं।
घृणा, झूठ, युद्ध, हिंसा, दमन का माहौल
लेकिन घृणा, झूठ, युद्ध, हिंसा और दमन का यह वातावरण अमेरिका, यूरोप, मध्यपूर्व तक ही सीमित नहीं है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक उसकी सशक्त व्याप्ति है। भारत और पाकिस्तान के बीच तो नफरती वातावरण बना ही रहता है लेकिन विगत वर्ष वह बांग्लादेश और भारत के बीच भी एक काली छाया के रूप में उपस्थित हो गया। उससे भी बड़ी बात यह है कि भारत के प्रति घृणा का जो माहौल बांग्लादेश में 2024 से बनना शुरू हुआ था वह 2025 में नई ऊँचाई हासिल कर गया। इस माहौल में दक्षिण एशिया और दुनिया के लिए सभ्यता की एक उम्मीद कहे जाने वाले देश भारत का सिर्फ माहौल ही नहीं बिगड़ा है बल्कि अपने रास्ते से उसके कदम लड़खड़ाने लगे हैं। चाहे अनचाहे भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश की प्रतिकृति बनने लगा है। अगर वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं को ईशनिंदा या देशद्रोह के आरोप में मारा जा रहा है तो भारत भी बांग्लादेशी घुसपैठिया और विधर्मी ईसाई बताकर अपने ही नागरिकों को पीट पीटकर मारने में पीछे नहीं है।
ऐसे में बढ़ती बुराइयों के इस ज्वार के सामने अच्छाई के लिए रास्ता क्या है? क्या हम देश और दुनिया को किसी अच्छे रास्ते के इंतज़ार की सलाह दे सकते हैं? इंतज़ार करने वालों के लिए गांधी का एक कथन बड़ा मौजूं हैः—
‘एक आदर्श रास्ते की खोज में हम दिनों दिन इंतजार करते रहते हैं। शायद वह अब मिलेगा। मगर हम यह भूल जाते हैं कि रास्ते चलने के लिए बनाए जाते हैं इंतजार के लिए नहीं।’
जाहिर सी बात है कि घृणा, झूठ, हिंसा और बुराई के इस माहौल में अच्छाई के लिए रुक कर इंतज़ार करने का कोई अर्थ नहीं बनता। यह सही है कि सोना और चांदी की तरह या डॉलर की तरह ही बुराई का मार्केट लगातार चढ़ता ही जा रहा है। उसकी धांधली उजागर होने के बावजूद उस पर न तो राज्य की संस्थाओं की तरफ़ से अंकुश लगाने का कोई प्रयास दिख रहा है और न ही समाज की ओर से। इसलिए व्यक्तिगत स्तर पर भी लोग अच्छाई का गौरवगान करने या उसे अपनाने से परहेज कर रहे हैं।
अगर आप भारत के विभाजन की कथा पढ़ेंगे तो पाएंगे कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना लगातार झूठ बोल रहे हैं। फर्जी आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस के नेताओं को गालियाँ दे रहे हैं। उनकी पार्टी मुस्लिम लीग के तमाम नेता भी यही कर रहे हैं।
हालाँकि कांग्रेस के तमाम बड़े नेता चाहे पंडित जवाहर लाल नेहरू हों, सुभाष बाबू हों, मौलाना हों या स्वयं महात्मा गांधी हों, उनका शालीनता से जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार के अधिकारी भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि मुस्लिम लीग के आरोप सही नहीं हैं। लेकिन जिन्ना और लीग लगातार ताकतवर होती जा रही है।
बहुसंख्यक समाज का उत्पीड़न?
आज हम भारत में एक लीगी मानसिकता देख रहे हैं। मौजूदा समय में भारत में सत्तारूढ़ संगठन लगभग वैसे ही बहुसंख्यक समाज के उत्पीड़न और उसके हितों को हानि पहुँचाए जाने का आरोप लगा रहा है। विडंबना यह है कि देश और समाज उन आरोपों में बहा जा रहा है। एक चीनी कथन है कि शासक वर्ग अपनी सत्ता को चलाने के लिए थोड़ा बहुत झूठ बोलता है लेकिन ख़तरनाक स्थिति तब होती है जब वह झूठ में यक़ीन करने लगता है। आज भारत के शासक वर्ग की स्थिति झूठ बोलने के साथ उसमें यक़ीन करने की होती जा रही है। समाज की दिशा भी स्वतंत्र नहीं है। वह झूठ बोलने वाली सत्ता और उसको चलाने वाले संगठन का अनुगामी हो गया है। वह ‘महामहिम’ के इस कथन में यक़ीन करने लगा है कि आवश्कता सत्य की नहीं, सत्ता की है। भारतीय शासक वर्ग और सत्ता के इस चरित्र पर देशी पत्रिका ‘कारवां’ से लेकर अंतरराष्ट्रीय अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स तक ने विस्तार से लिखा भी है। उस पर चर्चाएँ हो रही हैं। लेकिन झूठ के बड़े बाजार के सौदागारों को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे इसे अपनी प्रशंसा में ही देख रहे हैं।च्छाई का मार्केट कैसे बढ़ाएं?
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अच्छाई लाएं कहां से और उसे कैसे लोकप्रिय और शक्तिशाली बनाएं? यानी अच्छाई का मार्केट कैसे बढ़ाएं? अच्छाई धर्म से आएगी, राजनीति से आएगी, विज्ञान से आएगी, दर्शन से आएगी, अध्यात्म से आएगी या एआई से आएगी? इस सवाल ने मानवता को लंबे समय से बेचैन किया है और इसका उत्तर ढूँढने में ही तमाम लोग महापुरुष बन गए और दूसरी ओर अच्छाई के विरुद्ध बड़े-बड़े शैतान खड़े हो गए जिन्होंने कभी राष्ट्र के नाम पर, तो कभी धर्म के नाम पर, तो कभी जाति के नाम पर और कभी अपने सम्मान के नाम पर बुराइयों की बाढ़ ला दी है। तमाम लोग अच्छाई को प्राप्त करने के लिए धर्म को त्यागने की सुझाव देते हैं बल्कि उनका मानना है कि धर्म ही सारी बुराइयों की जड़ है। इस सुझाव में लोग आधे अधूरे मार्क्सवाद का सहारा लेते हैं तो उससे आगे विज्ञान की मदद लेते हैं।
हाल में लेखक जावेद अख्तर और मौलाना मुफ्ती समाइल के बीच ईश्वर के अस्तित्व पर बहस के बहाने देश के अच्छे लोगों ने अच्छाई का मार्ग पा लेने की खुशी जताई है। लेकिन क्या वास्तव में राजनीति और विज्ञान इतने अच्छे हैं कि वे स्वतः अच्छाई का मार्ग प्रशस्त कर देंगे? विनोबा भावे ने तो संगठित धर्म और संगठित राजनीति दोनों के चरित्र को बुरा बताया है। इसीलिए उनका मानना है कि आखिर में विज्ञान और अध्यात्म ही बचेंगे मानवता के लिए। जबकि डॉ. लोहिया तो धर्म और राजनीति के अलग रिश्ते की बात करते हैं और यह मानते हैं कि धर्म अच्छाई कायम करता है और राजनीति बुराई से लड़ती है। गौर करने लायक बात है कि डॉ. लोहिया ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे। डॉ. आंबेडकर तो ईश्वर विहीन बौद्ध धर्म को स्वीकार करते हुए यह मानते हैं कि समाज में कानून के पालन के लिए जो नैतिक वातावरण प्राप्त होता है वह बौद्ध धर्म प्रदान करता है। कई देशों में तो धर्म ने अन्याय से लड़ने की प्रेरणा दी है।
विज्ञान ने मानवता को बहुत कुछ दिया है लेकिन विज्ञान ने जो गति दी है और जो कृत्रिम संसार निर्मित किया है उससे समाजशास्त्री, भाषा शास्त्री, इतिहासकार और बहुत सारे दार्शनिक भी चिंतित हैं। युआल नोवा हरारी तो नई संचार प्रौद्योगिकी और विशेषकर एआई को हमारी सभ्यता के भविष्य के लिए ख़तरा मानते हैं। इसलिए सवाल यह है कि पर्यावरण, प्रकृति और मानवता के अस्तित्व को ध्यान में रखते हुए विज्ञान के लिए कोई नैतिक मानदंड कैसे विकसित किया जाए? क्या अच्छाई मानव का आविष्कार है या प्रकृति में अच्छाई का कोई नियम है? कुछ विद्वान तो प्रकृति को संचालित करने वाले नियम ‘ऋत’ को ही सत्य और उसी को ईश्वर की अवधारणा के समतुल्य मानते हैं। निजी संपत्ति और असमानता के सवाल भी अच्छाई और बुराई को परिभाषित करने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
लेकिन यह दौर बुराई की एकता और अच्छाई के बिखराव का है। अच्छे लोगों का अहंकार, उनका अलगाव और उससे उपजी हताशा हमारी सभ्यता के पतन के प्रमुख कारणों में है। ऐसे में अवध क्षेत्र के एक मनीषी स्वतंत्रता सेनानी और जनमोर्चा अख़बार के संस्थापक महात्मा हरगोविंद की यह बात मौजूं लगती है कि धर्म, राजनीति और विज्ञान यह सब अगर अच्छे हाथों में होंगे तो उनका अच्छाई के लिए इस्तेमाल होगा और अगर बुरे हाथों में होंगे तो उनका बुरा इस्तेमाल होगा। अच्छाई का मार्केट अप करने का शायद यही तरीका है।