ज्योति कुमारी पासवान के ही साथ कोई हादसा हो जाता तो फिर कह दिया जाता कि कोई इस तरह से सड़क पर निकल जाए तो उसे कैसे रोका जा सकता है? मालगाड़ी के नीचे कुचल गए सोलह मज़दूरों के बारे में यही तो कहा गया था न कि कोई रेल की पटरियों पर सोना चाहे तो उसे कैसे रोका जा सकता है?
व्यवस्थाएँ दूसरों की उपलब्धियों को पुरस्कृत कर ख़ुद का सम्मान करने की कोशिशों में अपनी ही ज़िम्मदारियों में बरती जाने वाली कोताही के लिए न तो शर्मिंदा होना चाहती हैं और न ही क्षमा माँगना चाहती हैं।
सही पूछा जाए तो ज्योति कुमारी के साहस के प्रति सम्मान को सत्ता प्रतिष्ठानों की इस ईर्ष्या के रूप में भी लिया जा सकता है कि हमारी कृपा के बिना ही तुमने ऐसा कैसे कर लिया! यह दृष्टिकोण वैसा ही तो है कि हमारी अनुमति के बिना तुम लॉकडाउन कैसे तोड़ सकते हो?