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पाकिस्तान के बजाय भारत को क्यों तरजीह दे रहे हैं खाड़ी देश?

खाड़ी का इलाका मुसलिम बहुल है और इस नाते वह पाकिस्तान का स्वाभाविक साथी है, भारत के राजनयिक हलकों में हाल तक यही माना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में खाड़ी के देशों के साथ भारत के सम्बन्ध जिस तरह विकसित हुए हैं, वे इस धारणा को तोड़ने में कामयाब हुए हैं। 
हाल के सालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खाड़ी के सभी मुल्क़ों से सम्पर्क गहरे करने की कोशिश की है और इसका सकारात्मक असर हम देखने लगे हैं। सबसे अहम तो यही है कि जम्मू-कश्मीर को लेकर अरब मुल्क़ों का नजरिया बदला है और अब वे इस मुद्दे पर पाकिस्तान से कन्नी काटने लगे हैं। यदि यह कहा जाए कि खाड़ी के तेल समृद्ध देश भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर अपने भविष्य को सुरक्षित करने की रणनीति पर चल रहे हैं तो ग़लत नहीं होगा।
एक बड़ी आर्थिक ताक़त के तौर पर उभर चुके और एक बड़ी मुसलिम आबादी वाले देश भारत के साथ भविष्य के ठोस रिश्तों की नींव डालने और इसकी इमारत आज से ही खड़ी करने की अहमियत खाड़ी देशों को पता है।

शिया-सुन्नी संतुलन!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 29 अक्टूबर को सऊदी अरब का दौरा इस नज़रिये से काफ़ी अहम माना जाएगा। सबसे अहम बात यह है कि इज़राइल के साथ रिश्ते मजबूत करने और विशेष आत्मीयता दिखाते रहने के बावजूद भारत खाड़ी के सुन्नी और शिया देशों के साथ संतुलन बना कर चल रहा है और दोनों मुसलिम समुदायों के देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर अपने सामरिक हितों का संवर्द्धन करने में सफल होता लगता है।
अब ज़रूरत इस बात है कि 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अरब मुल्क़ों के साथ रिश्ते प्रगाढ़ करने के लिये जो 'लुक वेस्ट' नीति प्रतिपादित की थी, उसे औऱ गहराई के साथ लागू किया जाए।

'एक्ट वेस्ट' की नीति

'लुक वेस्ट' नीति दक्षिण पूर्व-एशिया के देशों के साथ रिश्ते प्रगाढ़ करने के लिये 'लुक ईस्ट' नीति की तर्ज़ पर बनाई गई थी, जिसे प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में एक्ट 'ईस्ट नीति' में तब्दील कर और सक्रियता से लागू किया जाने लगा। इसी तरह 'लुक वेस्ट' नीति को भी अब 'एक्ट वेस्ट' नीति में बदलने का वक़्त आ गया है ताकि भारत अपने निकट के पड़ोसी अरब मुल्क़ों के साथ भी रिश्ते मजबूत कर सके। भारत के निकट के पड़ोसी देशों में अब तक दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों को ही माना जाता था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 'लुक वेस्ट' नीति के तहत ही 2006 में सऊदी अरब के किंग अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज को भारत आमंत्रित किया था और ऐतिहासिक दिल्ली घोषणापत्र जारी किया था।
इस सिलसिले को जारी रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जब तीन साल पहले सऊदी अरब का दौरा किया तो सऊदी अरब ने अपने किंग के नाम पर अपने देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान से प्रधानमंत्री मोदी को नवाजा।
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निखरेगी भारत की छवि

प्रधानमंत्री मोदी के नवीनतम सऊदी दौरे से खाड़ी के इलाक़े में भारत की छवि और निखरेगी। खाड़ी के मुल्क़ समझने लगे हैं कि भारत में बड़ी मुसलिम आबादी रहती है, जो पाकिस्तान से अधिक है। इसलिये पाकिस्तान को मुसलिम चश्मे से देखना ठीक नहीं रहेगा। अपने आर्थिक और सामरिक हितों के नज़रिये से ही खाड़ी के मुल्क़ भारत पर निगाहें लगा रहे हैं और भारत में अभूतपूर्व निवेश करने को तत्पर हैं। 
वे यह भी मानते हैं कि उनके पास जो अकूत धन जमा हो चुका है उसका सक्षम इस्तेमाल भारत में ही निवेश कर किया जा सकता है, जिससे अपने दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों को संरक्षित रखा जा सकेगा। भारत एक बड़ा बाज़ार और बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसके साथ रिश्ते बेहतर करने की अहमियत खाड़ी के मुल्क़ भी समझते हैं, इसलिये वे पाकिस्तान से किनारा कर भारत के साथ दोस्ती बढ़ाने को आतुर लगते हैं।
पाकिस्तान ने अपने यहां आतंकवादी तत्वों को शरण देकर मुसलिम देशों की छवि ख़राब की है, जिससे सारा मुसलिम उम्मा बदनाम हुआ है।

भारत से फ़ायदा

खाड़ी के मुल्क़ों में भारतीय मूल के 90 लाख लोग रहते हैं जो खाड़ी की अर्थव्यस्था में असीम योगदान दे रहे हैं। खाड़ी के देश इसकी अहमियत समझते हैं। अब वे भारत के विशाल बाज़ार और अर्थव्यवस्था और प्रशिक्षित मानव संसाधन का लाभ अपने देश के लिये उठाना चाहते हैं। यही वजह है कि सऊदी अरब ने भारत में सबसे बड़े तेलशोधक कारखाने और पेट्रोलियम परिसर में निवेश करने की योजना को हरी झंडी दिखाई है।
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इस कारखाने में संयुक्त अरब अमीरात भी अपने सम्प्रभु कोष से धन निकाल कर निवेश करेगा। माना जा रहा है कि इस कारखाने में 35 अरब डॉलर से भी अधिक का निवेश आने वाले सालों में होगा, जिससे भारत के पश्चिमी तट के इलाक़े की तसवीर बदल जाएगी।  

तिलमिलाया पाकिस्तान!

खाड़ी के देशों का इस्तेमाल पाकिस्तान अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये कर रहा था, लेकिन खाड़ी के देश इसमें अब अपना हित नहीं देखते। यही वजह है कि खाड़ी के जिस मुल्क़ में भी भारतीय प्रधानमंत्री जाते हैं, वहाँ उन्हें विशेष सम्मान दिया जाता है। इसके ठीक विपरीत खाड़ी के देशों ने पाकिस्तानी नेताओं के साथ दोयम दर्जे वाले देश की तरह बर्ताव किया है। बीते मार्च में  इसलामी देशों के संगठन की बैठक में तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया तो पाकिस्तान तिलमिला गया था।
इसी महीने अमेरिका के दौरे के लिये पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को सऊदी के शाह ने अपना निजी विमान दिया था। लेकिन लौटते वक़्त उन्होंने इमरान ख़ान को बीच में ही उतार दिया और इमरान ख़ान को यात्री विमान से स्वदेश लौटना पड़ा।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अपने मुसलिम भ्राता देश द्वारा किये गए अपमान का घूँट पीना पड़ा, क्योंकि पाकिस्तान काफी हद तक खाड़ी के मुल्क़ों की इमदाद पर अपना दैनिक खर्च चला रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी राजनयिक शिष्टाचार की औपचारिकताओं को तिलांजलि दे कर जिस तरह खाड़ी के शेखों की हवाई अड्डे पर ख़ुद जा कर अगवानी की है, उससे खाड़ी के देशों ने भारत के प्रति अपना नज़रिया बदला है। सऊदी अरब ने तो भारत के साथ सामरिक साझेदारी के रिश्तों को मजबूती देने के लिये सामरिक साझेदारी परिषद की स्थापना की है, जिसकी अगुवाई ख़ुद सऊदी प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान और प्रधानमंत्री मोदी करेंगे।
सऊदी अरब द्वारा भारत के साथ रिश्तों को मजबूती देने में इतनी रुचि लेना इस बात का सबूत है कि खाड़ी देशों का नजरिया भारत के प्रति बदल चुका है, जिससे पाकिस्तान के राजनयिक हलकों में खलबली मची है।
रंजीत कुमार
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