भारत और ईरान का संबंध केवल आधुनिक कूटनीति या व्यापार का विषय नहीं है। इन दोनों सभ्यताओं के बीच संबंध हजारों वर्षों पुराना है, जिसकी जड़ें इतिहास, भाषा, संस्कृति और धर्म की गहराइयों तक जाती हैं। यदि मानव सभ्यता के प्राचीन स्रोतों को समझना हो तो भारत और ईरान को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक धारा के रूप में देखना होगा।
इस संबंध को समझने के लिए दो प्राचीन ग्रंथ विशेष रूप से अहम हैं- ऋग्वेद और अवेस्ता। ऋग्वेद भारतीय वैदिक परंपरा का सबसे प्राचीन ग्रंथ है, जबकि अवेस्ता प्राचीन ईरानी धर्म ज़ोरोअस्ट्रियन परंपरा का पवित्र ग्रंथ है। भाषाविदों और इतिहासकारों का मानना है कि ये दोनों ग्रंथ एक ही प्राचीन इंडो-ईरानी सांस्कृतिक परंपरा के अवशेष हैं। यही कारण है कि इनमें अनेक शब्द, देवता, धार्मिक अवधारणाएँ और अनुष्ठान आश्चर्यजनक रूप से समान दिखाई देते हैं।
उदाहरण के लिए, ऋग्वेद का सोम अवेस्ता में होमा बन जाता है, ऋग्वेद का ‘ऋत’ अवेस्ता में ‘आशा’ के रूप में मिलता है, मित्र देवता अवेस्ता में मिथ्रा बन जाते हैं, और यम का रूप यिमा के रूप में दिखाई देता है। ये समानताएँ केवल भाषाई संयोग नहीं हैं, बल्कि यह संकेत देती हैं कि कभी भारत और ईरान के पूर्वज एक साझा सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा से जुड़े हुए थे।
'आर्य' से जुड़ाव
इतिहास के प्रमाण भी इस सांस्कृतिक संबंध को पुष्ट करते हैं। फारस के महान सम्राट दारियस प्रथम ने अपने प्रसिद्ध बेहिस्तून शिलालेख में स्वयं को “आर्य” और “आर्य वंश का” कहा है। यह इस बात का अहम प्रमाण है कि प्राचीन ईरानी भी अपने सांस्कृतिक मूल को आर्य परंपरा से जोड़ते थे। भारतीय व्याकरणाचार्य पाणिनि ने भी अपने प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टाध्यायी में उत्तर-पश्चिम की कई जनजातियों का उल्लेख किया है, जिनमें “पार्शु” नाम भी मिलता है। कुछ विद्वान इसे प्राचीन फारसियों से जोड़ते हैं।
भाषा के स्तर पर भी भारत और ईरान का संबंध अत्यंत गहरा रहा है। संस्कृत और अवेस्तन दोनों इंडो-ईरानी भाषा समूह की भाषाएँ हैं। इन्हीं से आगे चलकर हिंदी, फारसी और कई अन्य भाषाएँ विकसित हुईं। इसी कारण इन भाषाओं में ध्वनि, व्याकरण और शब्दों के स्तर पर गहरी समानताएँ दिखाई देती हैं।
मध्यकाल में यह संबंध और भी गहरा हुआ। विशेषकर मुगल काल में फारसी भाषा भारत की प्रशासनिक और साहित्यिक भाषा बन गई। इसके परिणामस्वरूप हिंदी और उर्दू में बड़ी संख्या में फारसी शब्द शामिल हो गए। आज भी हमारी रोज़मर्रा की भाषा में अनेक शब्द फारसी मूल के हैं।
ईरान का पुराना नाम फारस था, जो प्राचीन “पार्सा” क्षेत्र से निकला था। 1935 में रज़ा शाह पहलवी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अनुरोध किया कि देश को उसके ऐतिहासिक नाम “ईरान” से संबोधित किया जाए। “ईरान” शब्द प्राचीन “एर्यानाम” से निकला है, जिसका अर्थ है “आर्यों की भूमि”।
सातवीं शताब्दी में अरब विजय के बाद ईरान में इस्लाम का प्रसार हुआ। उसी दौर में ज़ोरोअस्ट्रियन समुदाय के कुछ लोग भारत आकर बस गए। यही समुदाय आगे चलकर पारसी कहलाया। गुजरात में बसने के बाद पारसियों ने भारतीय समाज, उद्योग और विज्ञान के विकास में असाधारण योगदान दिया।
भारत के आधुनिक इतिहास में टाटा, गोदरेज, वाडिया और पूनावाला जैसे पारसी परिवारों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उद्योग, विज्ञान, शिक्षा और सेना में पारसी समुदाय की भूमिका भारतीय समाज की बहुलतावादी परंपरा का सुंदर उदाहरण है।
इतिहासकारों का मानना है कि भारत और ईरान के बीच संबंध केवल धर्म और भाषा तक सीमित नहीं थे। व्यापार, कला, साहित्य और दर्शन के स्तर पर भी दोनों सभ्यताओं ने एक-दूसरे को गहराई से प्रभावित किया। प्राचीन व्यापार मार्गों और सांस्कृतिक संपर्कों ने इन दोनों समाजों को निरंतर संवाद में बनाए रखा।
आज जब दुनिया में पहचान की राजनीति और सांस्कृतिक टकराव की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं, तब भारत और ईरान का साझा इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—सभ्यताएँ टकराकर नहीं, बल्कि संवाद और आदान-प्रदान से विकसित होती हैं।
भारत और ईरान वास्तव में दो अलग-अलग सभ्यताएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही प्राचीन सांस्कृतिक वृक्ष की दो शाखाएँ हैं। हजारों वर्षों के इतिहास ने इन्हें अलग-अलग रूप दिया, लेकिन उनकी जड़ें आज भी कहीं गहराई में एक ही मिट्टी में मिलती हैं।