भारत ने पिछले दशक में अपनी व्यापार कूटनीति को लेकर असाधारण आत्मविश्वास दिखाया था। यह आत्मविश्वास तीन आधारों पर खड़ा था—बड़ा घरेलू बाज़ार, बड़ी आबादी और बढ़ती विनिर्माण महत्वाकांक्षा। माना गया था कि यह तीनों बातें भारत को वैश्विक बातचीत में ताकत देंगी।
कुछ समय तक यह धारणा सही भी लगी। अमेरिका की GSP व्यवस्था इसका सबसे बड़ा उदाहरण थी। इस व्यवस्था के तहत भारत के हजारों उत्पाद बिना शुल्क के अमेरिकी बाज़ार में जाते थे। इससे कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग, रत्न–जवाहरात और एमएसएमई क्षेत्र को सीधा सहारा मिलता था। 2018 में भारत ने 6.3 अरब डॉलर का निर्यात इसी व्यवस्था से किया। यह भारत की वास्तविक शक्ति थी।
2019 में यह लाभ अचानक खत्म हो गया। अमेरिका ने कहा कि भारत उसके डेयरी, मेडिकल डिवाइस और डिजिटल सेवाओं को बाज़ार में पर्याप्त जगह नहीं देता। यह नुकसान टाला जा सकता था। पर भारत ने अपनी रणनीतिक अहमियत को ज़रूरत से ज़्यादा आँका और आर्थिक लागत को कम समझा। भारत को लगा कि अमेरिका उसे छोड़ नहीं सकता। अमेरिका ने दिखा दिया कि वह छोड़ सकता है। यह भारत की पहली कमजोर चाल थी। पाँच साल बाद भी जीएसपी वापस नहीं आया। इसके बावजूद दिल्ली इसे “ऐतिहासिक रीसेट” कह रही है।
अमेरिका ने शुल्क 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया है। यह रियायत है, पर पहले के शून्य शुल्क की तुलना में बहुत कम। इसके बदले भारत ने कृषि, मेडिकल डिवाइस, डिजिटल व्यापार और ऊर्जा में बाज़ार खोलने का वादा किया है। सस्ता रूसी तेल भी कम होगा। यह तेल 2022 से भारत की ईंधन कीमतों को स्थिर रखने में मदद कर रहा था। अब यह ढाल कमजोर होगी। ईंधन महंगा होगा। महँगाई बढ़ेगी। घरेलू बजट पर दबाव बढ़ेगा। यह भारत की दूसरी कमजोर चाल है—बिना पर्याप्त लाभ के अपनी ऊर्जा स्वायत्तता को सीमित करना।
महँगाई सबको महसूस होती है
श्रम-प्रधान उद्योग पहले से दबाव में हैं। निर्यात मार्जिन घटे हैं। ऑर्डर कम हुए हैं। एमएसएमई की लागत बढ़ी है और मोल-भाव की ताकत घटी है। यह वही क्षेत्र हैं जिन्हें जीएसपी से सबसे ज़्यादा लाभ मिलता था। अब वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कमजोर स्थिति में हैं। आम आदमी पर असर और सीधा है। रिक्शा चालक, दुकानदार, किसान—कोई टैरिफ नहीं पढ़ता। पर महंगा ईंधन, महंगी ढुलाई और लगातार बढ़ती महँगाई सबको महसूस होती है। सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान से होने वाली बचत भी रोज़मर्रा की लागत में खत्म हो जाती है। यह भारत की तीसरी कमजोर चाल है—घरेलू दबाव को समझे बिना बाहरी रियायतें देना।
यूरोप ने भी 2026 में भारत की जीएसपी सुविधा रोक दी। अब ईयू –India एफटीए की बातचीत तेज़ है। लाभ हैं, पर जोखिम ज़्यादा हैं। यूरोप जिन क्षेत्रों में रियायत चाहता है—ऑटोमोबाइल, कृषि, डेटा, सरकारी खरीद—वे भारत के कमजोर क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों को समय से पहले वैश्विक प्रतिस्पर्धा में धकेलना खतरनाक होगा।
भारत की विनिर्माण क्षमता अभी असमान है। कुछ क्षेत्र मजबूत हैं, पर कई क्षेत्र अभी भी सुरक्षा और समय चाहते हैं। यह भारत की चौथी कमजोर चाल है—उद्योग की तैयारी से पहले बाज़ार खोलने की जल्दी।
समस्या असमान उदारीकरण है
समस्या उदारीकरण नहीं है। समस्या असमान उदारीकरण है। जब बाज़ार खुलता है और उद्योग तैयार नहीं होते, तो असमानता बढ़ती है। क्षेत्रीय अंतर गहराते हैं। राजनीतिक विरोध तेज़ होता है। यह दुनिया के कई देशों में देखा गया है। दक्षिण अमेरिका से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक, कई अर्थव्यवस्थाएँ इसी गलती से गुज़री हैं। भारत को इस गलती से बचना चाहिए था। पर भारत वही रास्ता पकड़ रहा है। यह भारत की पाँचवीं कमजोर चाल है—इतिहास से सीख न लेना।
सीमा शुल्क से मिलने वाला राजस्व घटेगा। यह राजस्व केंद्र सरकार के कर संग्रह का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सस्ता रूसी तेल कम होने से आयात बिल बढ़ेगा। चालू खाता दबाव में आएगा। सरकार के पास बुनियादी ढाँचे और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च करने की गुंजाइश कम होगी। पूँजीगत व्यय पहले ही खिंचा हुआ है। अब व्यापार कूटनीति विकास का साधन कम और राजकोषीय दबाव का कारण ज़्यादा बन रही है। यह भारत की छठी कमजोर चाल है—राजकोषीय वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करना।सही रास्ता तो अपनाए भारत
भारत को वैश्वीकरण से पीछे नहीं हटना चाहिए। भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में गहराई से जुड़ने से बड़ा लाभ मिल सकता है। अमेरिका–चीन तनाव के दौर में भारत की स्थिति महत्वपूर्ण है। पर इसके लिए सही क्रम ज़रूरी है—पहले क्षमता, फिर बाज़ार; पहले प्रतिस्पर्धा, फिर रियायत; पहले सुधार, फिर समझौता। दक्षिण कोरिया, ताइवान और वियतनाम ने यही रास्ता अपनाया। उन्होंने पहले घरेलू उद्योग को मजबूत किया, फिर बाज़ार खोला। भारत कई बदलाव एक साथ करने की कोशिश में अस्थिरता का जोखिम ले रहा है। यह भारत की सातवीं कमजोर चाल है—रणनीति का क्रम उलट देना।
मूल सवाल है—लेवरेज का। पहले भारत के पास बाज़ार पहुँच और रणनीतिक स्थिति का लाभ था। आज भारत ज़्यादा रियायतें दे रहा है और कम पा रहा है। ऊर्जा नीति में स्वायत्तता घट रही है। और हम उन टैरिफ कटौतियों का जश्न मना रहे हैं जो हमें अब भी कमजोर स्थिति में छोड़ती हैं। यह रणनीतिक उदारीकरण नहीं है। यह दबदबे का क्षरण है, जिसे सफलता की तरह पेश किया जा रहा है। अमेरिका और यूरोप अपनी आपूर्ति शृंखलाएँ बदल रहे हैं। भारत की स्थिति महत्वपूर्ण है, पर महत्व अपने आप लाभ में नहीं बदलता। बातचीत में अनुशासन न हो तो रणनीतिक साझेदारी आर्थिक रियायत बन जाती है। यह भारत की आठवीं कमजोर चाल है—भू-राजनीति को आर्थिक लाभ का विकल्प समझ लेना।रणनीति क्या हो?
भारत को नई सोच चाहिए। व्यापार समझौते घरेलू क्षमता को मजबूत करें। तकनीकी शक्ति बढ़ाएँ। विनिर्माण को बचाएँ। सुरक्षा तंत्र तैयार करें। कौशल प्रशिक्षण, उद्योग उन्नयन और राजकोषीय बफर पहले हों। उसके बाद ही बड़े समझौते हों। बातचीत स्पष्ट औद्योगिक प्राथमिकताओं पर आधारित हो—इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयाँ, प्रिसिशन इंजीनियरिंग, हरित ऊर्जा और उन्नत सामग्री। रियायतें क्षमता के ठोस मानकों पर तय हों, न कि राजनीतिक सद्भाव पर। यह भारत की नौवीं कमजोर चाल है—औद्योगिक प्राथमिकताओं की अस्पष्टता।
व्यापार समझौते तभी संप्रभुता बढ़ाते हैं जब वे विकल्प बढ़ाएँ। जब वे घरेलू नीति की गुंजाइश घटा दें, तो संप्रभुता सिकुड़ती है। भारत आज इसी मोड़ पर खड़ा है। दबदबा वापस पाना आसान नहीं होगा। इसके लिए अनुशासन चाहिए। धैर्य चाहिए। और लंबी दृष्टि चाहिए। भारत को अपनी क्षमता को ताकत में बदलना होगा। महत्वाकांक्षा को स्थायी समृद्धि में बदलना होगा। तभी भारत तिजारती शतरंज पर मजबूत चाल चलेगा। अभी की चाल कमजोर है। और इसे मजबूत बनाना लंबे दौर में भारत के हित में है।