कुछ असफलताएँ इसीलिए जीवित रहती हैं कि उन्हें भुला दिया जाता है। कुछ असफलताएँ इसीलिए अमर हो जाती हैं कि उन्हें ठीक उसी रूप में गढ़ा गया था। भारत की शिक्षा-व्यवस्था दूसरी श्रेणी में आती है।
पचहत्तर वर्ष बीत गए, फिर भी यह व्यवस्था एक ही फल देती रही है- जैसे कोई पुराना वृक्ष हर ऋतु में एक ही फल लाता हो। बच्चे स्कूल जाते हैं, नाम दर्ज होते हैं, प्रमाण-पत्र मिल जाते हैं, कक्षाएँ आगे बढ़ जाती हैं- पर दिमाग पीछे छूट जाता है। सीखने की जगह पास होना मुख्य हो गया है। पढ़ाई की जगह प्रमाणित होना।
यह कोई दुर्घटना नहीं है। यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं है। यह कोई फंड की कमी नहीं है। यह एक सुविचारित, सुसंगठित और स्व-रक्षक संतुलन है। हमने शिक्षा को ज्ञान का मंदिर नहीं बनाया, बल्कि एक विशाल कारखाना बना दिया- जहाँ कच्चा माल (बच्चे) अंदर आता है और तैयार माल (डिग्रीधारी) बाहर निकलता है। कारखाना चल रहा है। उत्पादन बढ़ रहा है। मालिक संतुष्ट हैं। केवल एक छोटी-सी बात भूल गई- माल में जान नहीं है।
यह विरोधाभास देखकर मन अवाक रह जाता है। हमने दुनिया का सबसे बड़ा स्कूल-तंत्र खड़ा कर दिया। हर बच्चा नामांकित है। नीतियाँ लिखी जाती हैं- ‘सोचने की क्षमता’, ‘लचीलेपन’, ‘इक्कीसवीं सदी की चुनौतियाँ’। फिर भी पाँचवीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते आधे से अधिक बच्चे दूसरी कक्षा का साधारण वाक्य भी नहीं पढ़ पाते। बीस वर्ष से निरंतर प्रमाण आ रहे हैं कि बच्चे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं। फिर भी वही पुराना गीत- क्लास आगे, दिमाग पीछे।
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व्यवस्था खराब नहीं चल रही। वह ठीक उसी लक्ष्य के अनुरूप चल रही है जिसके लिए उसे रचा गया था। वह मापती है भर्ती को। गिनती है पूर्णता की। मूल्य है प्रमाण-पत्र का। ये तीनों चीजें दिखाई दे सकती हैं, फोटो खींची जा सकती हैं, भाषण में गाई जा सकती हैं।

शिक्षा पास कराने का प्रबंधन बन गई!

सीखना लेकिन अंधेरे में पनपता है। वह धीमा है, असमान है, तत्काल फोटो-योग्य नहीं। इसलिए व्यवस्था ने जो पुरस्कार मिलते हैं, उसी के साथ खुद को जोड़ लिया। शिक्षा अब क्षमता का विकास नहीं, पास कराने का प्रबंधन बन गई है- एक कक्षा से दूसरी कक्षा, एक स्कूल से कॉलेज, एक डिग्री से नौकरी की लंबी कतार तक।
इस लक्ष्य को समझ लीजिए तो सारी असंगतियाँ एकदम स्पष्ट हो जाती हैं। शिक्षक का वेतन वरिष्ठता से जुड़ा है, नौकरी अटल है, छात्र की सीख पर कोई जवाबदेही नहीं। ऐसे में हर बच्चे को उसके वास्तविक स्तर पर समझकर पढ़ाना अनावश्यक हो जाता है।
सबसे सरल रास्ता है- किताब खोलो, सिलेबस पूरा करो, क्लास आगे बढ़ाओ। प्रशासक को इंफ्रास्ट्रक्चर, भर्ती और योजनाओं की पूर्ति से नापा जाता है। राजनेता को दिखने वाले आँकड़ों और संगठित शिक्षक-संघों से। शिक्षक-संघ, बुद्धिमानी से, अपने हित की रक्षा करते हैं और किसी भी ऐसे सुधार का विरोध करते हैं जो नतीजों से वेतन या सुरक्षा को जोड़े। हर पक्ष तर्कसंगत व्यवहार करता है। पूरा तंत्र मिलकर वह नतीजा पैदा करता है जिसे कोई अकेला नहीं चाहता, पर सब मिलकर बनाए रखते हैं।

यह कोई साधारण खराब संतुलन नहीं है। यह एक आत्मरक्षक, स्वयं-परिपोषित संतुलन है। कोई सुधार इसे चुनौती देता है तो उसे सीधे नहीं मारा जाता। उसे निगल लिया जाता है। नया पाठ्यक्रम नया दस्तावेज बन जाता है। नई तकनीक नई खरीदारी। नई नीति नया ऐलान। कक्षा, जहाँ असली शिक्षा होनी चाहिए, लगभग वैसी ही रह जाती है। व्यवस्था बदलाव का विरोध नहीं करती- वह उसे बेअसर कर देती है।

फिर भी इस घोर जड़ता के बीच एक चमकती हुई आशा छिपी है। हम जानते हैं कि क्या काम करता है। पिछले बीस वर्षों में भारत के स्कूलों में किए गए कठोर, वैज्ञानिक प्रयोगों ने साबित कर दिया है कि सीखना तेजी से, सस्ते में और गहराई से बढ़ाया जा सकता है। सबसे बड़ा रहस्य सरल है- बच्चा असफल नहीं होता क्योंकि वह सीखने में अक्षम है। वह असफल होता है क्योंकि उसे उस स्तर से ऊपर पढ़ाया जाता है जहाँ वह अभी पहुँचा ही नहीं है। जो बच्चा बुनियादी वाक्य नहीं पढ़ पाता, उसे चौथी-छठी कक्षा का पाठ कैसे समझ आएगा? पढ़ाई शुरू होते ही वह बाहर हो जाता है। कक्षा आगे बढ़ती रहती है। फर्क बढ़ता जाता है और सामान्य हो जाता है।
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जब पढ़ाई बच्चे के वास्तविक स्तर के अनुसार की जाती है- जब उसे समूहों में बाँटकर उसी के अनुसार पढ़ाया जाता है- तो चमत्कार होता है। नतीजे कई महीनों या पूरे एक वर्ष की अतिरिक्त सीख के बराबर हो जाते हैं। यह महँगा नहीं है। जटिल नहीं है। इसमें सिर्फ इतना चाहिए कि शिक्षक बच्चे की स्थिति समझे, समूह बनाए और उसी के अनुसार पढ़ाए।
कई राज्यों में यह आजमाया गया, दोहराया गया और सही साबित हुआ। फिर भी यह राष्ट्रीय नीति का केंद्र नहीं बना। कारण अज्ञान नहीं। कारण यह है कि जो व्यवस्था आगे बढ़ाने के लिए बनी है, उसे सबसे कमजोर बच्चे के इर्द-गिर्द घूमने का कोई लाभ नहीं दिखता।
अब सवाल यह है कि लक्ष्य बदला जा सकता है या नहीं। अगर लक्ष्य बदल जाए- अगर व्यवस्था सीखने के वास्तविक लाभ के लिए काम करने लगे- तो सब कुछ बदल जाएगा। बच्चे को जहाँ है, वहीं से परखा जाएगा। शिक्षक को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिलेगा कि वह बच्चे की सीख पर ध्यान दे। प्रगति क्षमता से मापी जाएगी, पूर्णता से नहीं। माता-पिता को नियमित और स्पष्ट जानकारी दी जाएगी कि उनका बच्चा क्या कर सकता है। तब सीखना दृश्यमान हो जाएगा। और जो दृश्यमान होता है, वह चुनौतीपूर्ण भी हो जाता है।

मुश्किल तकनीकी नहीं, राजनीतिक है। जो इस संतुलन से लाभान्वित हैं, वे संगठित और शक्तिशाली हैं। जो इससे पीड़ित हैं, वे असंख्य लेकिन बिखरे हुए। इसलिए सुधार सबूतों पर अकेले नहीं टिक सकता। उसे प्रोत्साहन और आवाज का संतुलन बदलना होगा। जानकारी पहला हथियार है। समय दूसरा।

भारत का युवा-जनसांख्यिकीय लाभ कोई स्वर्गीय वरदान नहीं है। वह तब तक संपत्ति नहीं बन सकता जब तक वह सक्षम न हो। जो स्कूल सिस्टम बच्चों को आगे भेजता है बिना उन्हें पढ़ने, सोचने और अनुकूलन सिखाए, वह लाभ नहीं देता- वह विकास की दीवार बन जाता है। फर्क जनसंख्या में नहीं है। फर्क कक्षा में होता है कि क्या हो रहा है।
भारत ने ऊँचे शिखरों पर उत्कृष्ट संस्थाएँ खड़ी की हैं। अब सवाल यह है कि क्या वह उस उत्कृष्टता की एक किरण भी आधार तक पहुँचा सकता है। सवाल यह नहीं है कि हम चमकते सितारे पैदा कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या हम औसत को ऊपर उठा सकते हैं। जिन राष्ट्रों ने अपना इतिहास बदला, उन्होंने मानवीय क्षमता को आधार माना, न कि बचा-खुचा नतीजा। उन्होंने स्कूलिंग नहीं बढ़ाई- उन्होंने स्कूलिंग का अर्थ बदला।
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भारत की शिक्षा-व्यवस्था इसलिए नहीं लड़खड़ा रही कि वह सफल नहीं हो सकती। वह इसलिए लड़खड़ा रही है क्योंकि वह कुछ और में बेहद सफल हो रही है। यही कड़वी सच्चाई है। और यही सबसे बड़ी आशा भी।
जो व्यवस्था एक नतीजे के लिए रची गई है, उसे दूसरे नतीजे के लिए फिर से रचा जा सकता है। आसानी से नहीं। विरोध के बिना नहीं। लेकिन जान-बूझकर, दृढ़ता से और सच्ची शिक्षा की प्यास से।
जब तक यह बदलाव नहीं होगा, देश वही करता रहेगा जो वह कुशलता से करता आया है- लाखों बच्चों को स्कूल से गुजारना, उनके दिमाग को अछूता छोड़ना और फिर भी इसे शिक्षा कहना।