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पक्ष : देश बदनाम होता है नसीर के 'सच' कहने से?

क्या आपके कोई बेटी या बहन है जो 9-10 साल से बड़ी है? यदि है तो अगर वह कहीं बाहर गई हुई हो, ख़ास कर रात को सात-आठ बजे के बाद और उसे घर लौटने में देर हो रही हो और उसका मोबाइल भी नहीं लग रहा हो तो आपको फ़िक़्र होगी या नहीं? ज़रूर होगी। और फ़िक़्र किस बात की होगी? यही न कि कहीं…

मुझे कहने की ज़रूरत नहीं। आप समझ गए होंगे कि मैं क्या मीन कर रहा हूँ। यही कि हमारे इस महान भारतवर्ष में कोई राह चलती लड़की या स्त्री सुरक्षित नहीं है। राह चलती क्या, घर में वह अकेली हो तो भी वह सुरक्षित नहीं है, पता नहीं पड़ोस में रहने वाला 15 से 75 की उम्र का कौनसा पुरुष उसे अकेला पा कर हैवान बन जाए। यह ऐसी बात है जो हर कोई जानता और मानता है। कोई व्यक्ति इससे असहमत नहीं, कोई संगठन इससे असहमत नहीं, कोई पार्टी इससे असहमत नहीं।
  • इसीलिए यदि मैं कहूँ कि मेरी बेटी यदि रात को देर से लौटे तो मुझे फ़िक़्र होती है तो कोई नहीं कहेगा कि मैं देश को बदनाम कर रहा हूँ। अधिक से अधिक कोई यह कह सकता है कि मैं सरकार को बदनाम कर रहा हूँ।

लेकिन यदि नसीरुद्दीन शाह कहें कि उनको अपने बच्चों के लिए फ़िक़्र होती है कि यदि कभी किसी भीड़ ने उन्हें घेर लिया तो वे ख़ुद को क्या बताएँगे - हिंदू या मुसलमान…  तो इससे किसी दल या संगठन पर लांछन नहीं लगता, कोई सरकार घेरे में नहीं आती, किसी समाज पर कीचड़ नहीं उछलता - सीऽऽऽऽऽऽधे देश बदनाम हो जाता है। भारतवर्ष के चेहरे पर कालिख पुत जाती है।

कब-कब बदनाम नहीं होता है देश!

जब देश में हर रोज़ हर शहर, हर कस्बे में बलात्कार होते हैं तो देश बदनाम नहीं होता, जब देश में हर दिन 30-35 किसान आत्महत्या करते हैं तो देश बदनाम नहीं होता, जब गोमांस खाने के अपराध में एक बूढ़े इंसान को भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डाला जाता है तो देश बदनाम नहीं होता, जब बुलंदशहर में क़ानून की रक्षा में मुस्तैद एक पुलिसकर्मी को मार दिया जाता है तो देश बदनाम नहीं होता, जब ग़रीबी के चलते लड़कियाँ गली-गली में शरीर बेचने पर मजबूर हो जाती हैं तो देश बदनाम नहीं होता, जब आठ-दस साल के बच्चे ढाबों मे काम करते हैं तो देश बदनाम नहीं होता, जब एक-चौथाई आबादी को रोज़ आधा पेट सोना पड़ता है तो देश बदनाम नहीं होता, जब सीट की लड़ाई में एक टोपी पहने किशोर की हत्या कर दी जाती है तो देश बदनाम नहीं होता।

नफ़रत पर चिंता से बदनामी कैसे?

लेकिन देश तब बदनाम हो जाता है जब एक ऐक्टर देश में भड़काई जा रही सांप्रदायिक नफ़रत पर चिंतित होता है। जब वह अपने बच्चों के लिए चिंतित होता है कि पता नहीं, कब कौनसी उन्मादी भीड़ उसके बच्चों को अकेला पा कर (अभिमन्यु की तरह) उनकी हत्या कर दे, तो देश बदनाम होता है। 

आज से क़रीब 20 साल पहले एक पादरी और 6 और 10 साल के उनके दो बच्चों को जब एक ऐसी ही हिंसक भीड़ ने जला कर मार डाला तो देश बदनाम नहीं हुआ लेकिन नसीरुद्दीन शाह के केवल ऐसी घटना के घटने की आशंका व्यक्त करने से देश बदनाम हो जाता है।
is the comment of naseeruddin shah a blot on the face of the country - Satya Hindi
दरअसल जो ताक़तें यह सांप्रदायिक ज़हर फैला रही हैं, वे जानती हैं कि जब किसान मरते हैं तो उँगली उनकी तरफ़ नहीं उठती क्योंकि किसान तो कांग्रेस के राज में भी मर रहे थे। जब देश में हर जगह रेप होते हैं तो वे जानते हैं कि उँगली उनकी तरफ़ नहीं उठती क्योंकि ज़ुल्म तो सदियों से चला आ रहा है। लेकिन जब उन्मादी भीड़ की हिंसा में कोई इख़लाक या सुबोध कुमार सिंह मरता है या दलितों को पीटा जाता है तो उँगली उन्हीं की तरफ़ उठती है क्योंकि यह उन्हीं को बोया गया घृणा की बीज है जो पेड़ बन कर इस तरह की हिंसा के फल देता है। इसलिए जब भी ऐसी कोई हिंसा होती है और उसके लिए कोई उनकी तरफ़ उँगली उठाता है तो वे चीखने लगते हैं कि देखो, देखो, यह बंदा देश को बदनाम कर रहा है।

हिंदी में एक कहावत है - जबरा मारे और रोने न दे। यानी मारेंगे ख़ूब लेकिन रोने नहीं देंगे। अगर रोए तो और मारेंगे। निष्कर्ष यह कि तुमको पिटना तो है ही लेकिन शिकायत नहीं करनी है। सहे जाना है सबकुछ। ये बीजेपी वाले और उनके संघी-साथी जो हैं, वे इसी सोच के हैं। बहुत लंबे समय के बाद उनको देश की सत्ता मिली है और देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर एक ऐसा आदमी है जिसने धृतराष्ट्र की तरह आँखें बंद कर रखी हैं, सो इन कौरवों की मौज हो आई है। भगवा झंडा हाथ में ले लिया, माथे पर तिलक लगा लिया और तलवार-डंडा-पिस्तौल लेकर निकल पड़े हिंदू धर्म की सेवा में। कोई गायें ले जा रहा है तो उसको पीट दिया और गायें छीन लीं, मुसलमान हुआ तो जान से मार दिया। कोई ख़िलाफ़ बोल या लिख रहा है तो गोली मार दी।

दुष्यंत कुमार ने कभी कहा था - मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
उसी से मिलती-जुलती ये लाइनें कहने का आज मन कर रहा है - यह तो सब जानते हैं, हाल-ए-मुल्क यही है

मगर उनका कहना है कि यह कहना नहीं है।

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नीरेंद्र नागर
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