इस हफ़्ते जंतर-मंतर पर धुआँ फिर उठा। हज़ारों नौजवान सड़क पर थे। बीस लाख बच्चों के ख़्वाब एक ही झटके में टूटकर चकनाचूर हुए, तो शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग तो होनी ही थी।

आँसू गैस के गोले छूटे, भूख हड़तालें शुरू हुईं और पुलिस संसद की तरफ़ बढ़ते छात्रों से भिड़ गई। कुछ ही घंटों में दिल्ली का जाना-पहचाना राग बजने लगा—किसी ने इसे सरकारी जवाबदेही का जनाज़ा बताया, किसी ने कहा कि राज्य अपनी ज़िम्मेदारियों से हाथ खींच रहा है, तो किसी ज्ञानी ने इसे एग्ज़ाम सिस्टम का मामूली ‘प्लंबिंग इश्यू’ करार दे दिया। विपक्ष के नेता हमदर्दी जताने पहुँचे और प्रधानमंत्री जी ने ‘फास्ट-ट्रैक कोर्ट’ का दिलासा दे डाला।

फिर, जुलाई की उसी तपती शाम ढली। भीड़ छँटने लगी, टीवी की नौटंकी चालू रही, और वो तंत्र—जिसने पिछले दस सालों में 152 पेपर लीक देखे हैं और सज़ा शायद किसी को नहीं दी—अगले लीक की तैयारी में जुट गया।

भारत में संस्थागत आग से निपटने का यही चिर-परिचित तरीक़ा है। तंत्र सालों-साल अंदर ही अंदर सुलगता रहता है। फिर अचानक लपटें बाहर आती हैं। भीड़ जमा होती है। ज्ञानी अपने-अपने कुतर्क पेश करते हैं। और अंत में? अंत में मूल व्यवस्था वैसी की वैसी बनी रहती है।
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मैं इन ज्ञानियों की कुतर्कों वाली दुकान पर ज़रा ठहरना चाहता हूँ, क्योंकि असली खेल यहीं छुपा है।

ज्ञानियों की दुकान और छह रटे-रटाए चश्मे

दिल्ली को समझने के हमारे पास छह रटे-रटाए चश्मे हैं:
  1. एक ऐसी सनकी सरकार जो चुनाव तो जीतती है पर एक साफ़-सुथरा एग्ज़ाम नहीं करा पाती;
  2. एक ऐसा राज्य जिसने पढ़ाई को हक़ से हटाकर एक महँगी लॉटरी बना दिया है;
  3. रोज़गार का ऐसा अकाल कि किसी भी निष्पक्ष परीक्षा का बेमतलब हो जाना;
  4. इन विरोध प्रदर्शनों पर क़ब्ज़ा जमाता कोचिंग माफिया;
  5. एक ऐसी टेस्टिंग एजेंसी जिसे तुरंत उखाड़ फेंकना चाहिए; और
  6. एक मंत्री जिसे तुरंत घर भेजा जाना चाहिए।
इन छहों बातों में कुछ-न-कुछ सच ज़रूर है। किसी एक अख़बार के पन्ने पर या किसी एक शाम टीवी डिबेट में इन्हें सजा दीजिए, तो ऐसा लगता है जैसे बीमारी का पूरा एक्स-रे हो गया है। पर अफ़सोस, मरीज़ पहले की तरह ही वेंटिलेटर पर पड़ा रहता है।

जब 'व्याख्या' ही बीमारी बन जाए

यही वो मुग़ालता है जो हमारा बौद्धिक वर्ग बहुत नज़ाकत से परोसता है। चंद घंटों में बेहद चमकीले लेख आ जाते हैं—एक से बढ़कर एक। वो समस्या को बड़ी नफ़ीस भाषा में नाम देते हैं। पाठक को लगता है कि वाह, अब तो वो 'जागरूक' हो गया! और इस तरह, एक गहरी बुनियादी नाकामी को एक सीधी-सादी कहानी में बदल दिया जाता है—जिसकी एक शुरुआत है, एक मध्य है और एक सुखद अंत।

एक बार कहानी सही से सुना दी गई, तो जनता को लगता है कि बस, समझ लिया तो फर्ज़ पूरा हो गया। अब सुधार को फिर से टटोला जा सकता है।

सच तो यह है कि व्याख्या अब इलाज नहीं है। व्याख्या ही खुद में एक बीमारी बन चुकी है—और यह लिखते हुए मुझे भली-भांति एहसास है कि यह जुमला मेरे इस लेख पर भी लागू होता है। क्योंकि ये सारे विश्लेषण सिर्फ़ जलती हुई आग पर जाकर रुक जाते हैं। कोई यह नहीं पूछता कि इस इमारत को इतना ज्वलनशील बनाया ही क्यों गया था?

'भरी हुई थाली' और एक ही दरवाज़ा

वर्षों पहले मैंने भारतीय क्लासरूम की तुलना एक ‘ठसाठस भरी थाली’ से की थी। बच्चे की थाली में एक साथ सब कुछ परोस दिया जाता है—ढेर सारे विषय, तीन-तीन भाषाएं, और पंद्रह साल की उम्र से पहले मानव ज्ञान का पूरा पुलिंदा। थाली दिखने में तो बड़ी उदार लगती है, पर बच्चा उसे ख़त्म नहीं कर पाता। नतीजा? ज़्यादातर बच्चे स्कूल से बाहर निकलते हैं तो न एक साधारण पैराग्राफ़ पढ़ पाते हैं, न जोड़-घटाव कर पाते हैं।

और जब ऐसा होता है, तो कोई एक वादा टूटा हुआ नहीं दिखता—क्योंकि सारे वादे एक साथ किए गए थे! जवाबदेही को इतना फैला दिया जाता है कि वो पूरी तरह ग़ायब हो जाती है। यह भरी हुई थाली कोई ख़राब प्लानिंग नहीं है, यह एक ऐसा डिज़ाइन है जहाँ नाकामी का कोई सुराग ही न मिले, और इसलिए किसी को सज़ा न दी जा सके।
यही डिज़ाइन हमारी परीक्षाओं पर भी लागू होता है। हमने एक ही भारी-भरकम टेस्ट को वो इकलौता दरवाज़ा बना दिया है जो यह तय करता है कि कौन डॉक्टर बनेगा, कौन इंजीनियर, किसको सरकारी नौकरी मिलेगी और किसको समाज में इज़्ज़त। जब पूरे जीवन का बोझ उसी एक दरवाज़े पर टिका हो, तो तंत्र की हर सड़न उसी तरफ़ भागती है—लीक पेपर, मुन्नाभाई, कोचिंग के साम्राज्य और ख़रीदे गए रिज़ल्ट।

यह दबाव कुछ भ्रष्ट अफ़सरों की देन नहीं है। यह एक पूरी पीढ़ी के भविष्य को एक ही कमज़ोर वॉल्व पर टिका देने का नतीजा है। और जब वो वॉल्व फटता है—जैसा इस साल फिर हुआ—तो हम इस धमाके पर ऐसे हैरान होते हैं जैसे यह कोई अनहोनी हो, जबकि यह तो इसी डिज़ाइन का तयशुदा नतीजा था।

सीखने वाला राज्य बनाम 'नौटंकी' करने वाला राज्य

इसी से पता चलता है कि एक सीखने वाले राज्य (Learning State) और सिर्फ़ नौटंकी करने वाले राज्य (Performing State) में क्या फ़र्क़ है।

सीखने वाला राज्य: हर लीक हुए पेपर को एक ऐसे डेटा की तरह लेता है जो सीधे सिस्टम के केंद्र तक जाए और काम करने के तरीक़े को बदले।

नौटंकी करने वाला राज्य: उस लीक को सिर्फ़ एक 'पीआर प्रॉब्लम' मानता है: वो कमेटियों का ऐलान करता है, एजेंसी का नाम बदलता है, मंत्री को बचाता या हटाता है, और न्यूज़ साइकल के बदल जाने का इंतज़ार करता है। ढाँचा वैसा ही रहता है जैसा था।

इसके इलाज इतने मुश्किल भी नहीं हैं—साल में एक की जगह कई बार एग्ज़ाम देने की छूट ही आधे दबाव को ख़त्म कर सकती है—लेकिन ऐसा न करना ही इस तंत्र की असल नीयत को नंगा करता है।

जंतर-मंतर की गूँज और एआई का ख़तरा

जंतर-मंतर पर हो रहे ये प्रदर्शन जनता के ग़ुस्से की ताक़त भी दिखाते हैं और उसकी सीमा भी। इन नौजवानों ने यह मानने से इंकार कर दिया है कि लगातार होते पेपर लीक, छात्रों की आत्महत्याएँ और कोचिंग का धंधा बस ‘क़िस्मत का खेल’ हैं। उन्होंने सरकार को बोलने पर मजबूर किया है, यह असली दबाव है। लेकिन अगर बातचीत सिर्फ़ इस पर अटकी रही कि पेपर किसने लीक किया और किसको इस्तीफ़ा देना चाहिए, तो अंदरूनी मशीनरी को कोई हाथ भी नहीं लगाएगा।

नौटंकी करने वाला राज्य जनता के ग़ुस्से को पी जाने और उसे इवेंट में बदल देने में माहिर है—ऐसे विरोध प्रदर्शन जो समय के साथ ख़त्म हो जाते हैं, ऐसी जाँच जो पूरी होकर ठंडे बस्ते में चली जाती है, और ऐसी सुर्ख़ियाँ जो धीरे-धीरे धुँधली पड़ जाती हैं।

यह सब सिर्फ़ भारत में नहीं हो रहा। दुनिया का हर बड़ा अफ़सरशाही ढाँचा आख़िरकार यह सीख ही लेता है कि लोगों को जो दिख रहा है उसे संभालना, उस चीज़ को ठीक करने से बहुत सस्ता है जो सचमुच वजूद में है। सरकारें योजनाएँ घोषित करती हैं, यह नापने के बजाय कि बच्चे पढ़ पा रहे हैं या नहीं। यूनिवर्सिटी डिग्री बाँटती हैं, यह देखे बिना कि ग्रेजुएट सोच भी सकते हैं या नहीं। तकनीक बदल जाती है, पर मौजूदा ढाँचे को बचाने की हसरत नहीं बदलती।
विचार से और
आज का दौर इसलिए ख़तरनाक है क्योंकि वो पुरानी रियायतें अब ख़त्म हो चुकी हैं। दशकों तक भारत के औसत शिक्षा तंत्र के पास एक अनजाना सहारा था: अर्थव्यवस्था भी धीमी गति से बदलती थी, और एक कम पढ़ा-लिखा नौजवान भी कहीं न कहीं खप जाता था।

अब वो सहारा भी छीना जा रहा है। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) औसतन प्रदर्शन करने वालों पर तरस नहीं खाती; यह हुनरमंदों को आसमान पर पहुँचाती है और बेहुनर लोगों को मशीन की रफ़्तार से पीछे धकेलती है। एक बच्चा जो इन साधनों का इस्तेमाल सीख जाता है, वो उस बच्चे से कोसों आगे निकल जाएगा जो सिर्फ़ काग़ज़ की डिग्री लेकर घूमेगा। यह फ़ासला अब धीरे-धीरे नहीं बढ़ रहा, यह एक बहुत बड़ा गड्ढा बनता जा रहा है।

आख़िरी बात

इसलिए जंतर-मंतर के ये प्रदर्शन किसी एक परीक्षा या एक मंत्री के बारे में नहीं हैं। यह इस बात का पहला बड़ा सामाजिक इशारा है कि इस पीढ़ी ने अपने पैरों के नीचे खिसकती ज़मीन को देख लिया है।
छात्रों का जवाबदेही माँगना बिल्कुल वाजिब है। उनका यह कहना सही है कि बार-बार होते लीक कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं हैं। लेकिन अगर इसका नतीजा सिर्फ़ चकाचौंध करने वाले विश्लेषणों का एक और दौर रहा—जिसके बाद वही पुराना ढाँचा लौट आए—तो फ़िलहाल का यह शोर फिर जीत जाएगा और भविष्य हार जाएगा।

धुआँ कोई इमरजेंसी नहीं है। असली इमरजेंसी तो उस धुएँ के पीछे चलती वो ख़ामोश मशीन है—वो भरी हुई थाली, वो इकलौता दरवाज़ा, वो नौटंकीबाज़ राज्य, और हमारा वो बुद्धिजीवी वर्ग जो एक स्थायी नाकामी को भी एक मामूली विवाद की तरह पेश करके पेशा चमका लेता है।

हम इस मशीन का बखान छह अलग-अलग तरीक़ों से करना जानते हैं। और शायद इतनी सफ़ाई से, इतनी बार इसका बखान कर पाना ही वो तरीक़ा है जिससे हमने इसे कभी न उखाड़ने का हुनर सीख लिया है।