जंतर मंतर प्रोटेस्ट और सोशल मीडिया
इस साल जंतर-मंतर पर जो हुआ, उसने शायद हम सबको कुछ न कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। वहाँ युवा इकट्ठा हुए, उनके मन में गुस्सा था, उनके पास माँगें थीं। पर बातचीत किसी और पर जा टकराई। कुछ वीडियो आए जिनमें कुछ युवा प्रधानमंत्री और उनकी दिवंगत माता के ख़िलाफ़ अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे। ये वीडियो देखते ही देखते हर दिशा में फैल गए। फिर प्रधानमंत्री का एक और वीडियो आया, जिसमें उन्होंने कहा कि इन युवाओं को सजा नहीं, मार्गदर्शन चाहिए। अब इसी दो वीडियो के आसपास पूरा देश बँट गया। एक पक्ष ने कहा देखो युवाओं का गुस्सा कितना सही है तो दूसरे ने कहा देखो कैसे संस्कार खत्म हो रहे हैं। कोई प्रधानमंत्री के जवाब को संयम की मिसाल कहने लगा तो कोई उसे नाटक करार देने लगा। और बीच में जो असली मुद्दा था—बेरोज़गारी, परीक्षा में पेपर लीक, महँगाई—वह कहीं गुम हो गया। और यह कोई नई बात नहीं है। यह तो हमारे समय का सबसे बड़ा संकट है, जिसे सूचना का युद्ध कहते हैं। और यह युद्ध अब सीमाओं पर या सड़कों पर नहीं, बल्कि हमारे मोबाइल की स्क्रीन पर लड़ा जा रहा है।
आपने गौर किया होगा कि आजकल कोई भी बड़ी घटना घटती है तो उसके पूरे विवरण के बजाय उसके दस सेकंड का एक क्लिप वायरल होता है। जिसमें सबसे ज़्यादा शोर हो, सबसे ज़्यादा गुस्सा हो, सबसे ज़्यादा भावना हो—वही क्लिप हम तक पहुँचता है। मान लीजिए किसी शहर में कोई प्रदर्शन हो रहा है। किसी ने जोर से नारा लगाया, किसी ने कुछ कहा, किसी की तरफ पत्थर उछला। अब इनमें से जो सबसे चौंकाने वाला पल होगा, वही लोगों के फोन में कैद होगा और वही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाएगा। बाकी का पूरा प्रदर्शन, जिसमें शायद घंटों शांत बैठे लोग अपनी बात कह रहे थे या पुलिस से बातचीत कर रहे थे, वह कहीं छूट जाएगा। और हम सबको लगेगा कि पूरी घटना बस इतनी सी थी।
इसका सबसे बड़ा कारण है हमारा अपना दिमाग। हम इंसान ऐसे बने हैं कि हम तर्क से ज़्यादा भावना पर जल्दी प्रतिक्रिया देते हैं। जब हमें कोई वीडियो दिखता है जिसमें कोई क्रोध में चीख रहा है, या कोई अपमानित हो रहा है, या कोई रो रहा है, तो हमारा दिमाग उसे सच मानने के लिए तैयार हो जाता है। हम रुककर नहीं सोचते कि यह क्लिप कहाँ का है, कब का है, इससे पहले क्या हुआ था, इसके बाद क्या हुआ। हम बस उसी पल के साथ बह जाते हैं। और फिर वह भावना हमें उस वीडियो को आगे शेयर करने पर मजबूर कर देती है। हमें लगता है कि हम सच फैला रहे हैं, जागरूकता फैला रहे हैं, पर असल में हम किसी और के बताए रास्ते पर चल रहे होते हैं।
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम
यहीं पर आकर खड़ा होता है सोशल मीडिया का एल्गोरिदम। यह कोई इंसान नहीं है जो यह तय करे कि आपको क्या दिखाना है और क्या नहीं। यह एक गणितीय फॉर्मूला है जो सिर्फ यह देखता है कि लोग किस पर ज़्यादा देर रुके, किस पर ज़्यादा टिप्पणी की, किसे ज़्यादा बार शेयर किया। और आपको हैरानी होगी कि शांत, संतुलित, तथ्यों से भरी सामग्री पर लोग कम रुकते हैं। जबकि ग़ुस्सा, डर, हैरानी या मज़ाक वाली सामग्री पर लोग घंटों बिताते हैं। इसका सीधा मतलब है कि एल्गोरिदम तय करता है कि जिस सामग्री पर ज़्यादा बहस हो, ज़्यादा झगड़ा हो, वही सबसे ऊपर पहुँचेगी।
इसलिए आजकल आप देखेंगे कि जो वीडियो सबसे ज़्यादा विवादास्पद होता है, वही लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँचता है। और जो सबसे सच्चा और संतुलित होता है, वह कुछ ही सौ लोगों तक सीमित रह जाता है। लेकिन क्या इतना भर है? नहीं। इस पूरे खेल में सबसे ताकतवर हथियार है 'नैरेटिव' यानी कि कहानी।
एक घटना के दो अलग-अलग नैरेटिव
एक ही घटना को अगर अलग-अलग ढंग से पेश किया जाए तो उसके बिल्कुल अलग मायने निकल सकते हैं। जंतर-मंतर की ही बात कर लें। अगर वही वीडियो किसी न्यूज़ चैनल पर यह कहकर दिखाया जाए कि देखो युवा कितना गुस्सा है, तो वह 'विरोध' बन जाता है। अगर किसी और चैनल पर यह कहकर दिखाया जाए कि देखो युवा कितनी गिरी हुई भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो वह 'पतन' बन जाता है। अब उसी घटना पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया को अगर एक पक्ष 'दया और संयम' कहे और दूसरा 'राजनीतिक चाल' कहे, तो दोनों अपनी जगह सही होंगे, पर दोनों ही अधूरे होंगे। हकीकत यह है कि जनता को पूरी कहानी नहीं मिलती, बल्कि किसी के द्वारा पहले से तय की गई कहानी मिलती है।
और इस कहानी के साथ जुड़ती है सबसे दिलचस्प चीज़—हमारी अपनी पहचान। मतलब, हम कोई घटना नहीं देखते, हम अपनी नज़र से देखते हैं। अगर हम किसी पार्टी के समर्थक हैं तो हम उसी पार्टी के खिलाफ गाली को गलत मानेंगे और अपनी तरफ से हुई गाली को माहौल का हिस्सा कहकर नज़रअंदाज़ करेंगे। अगर हम विपक्ष में हैं तो बिल्कुल उल्टा करेंगे। यह कोई जानबूझकर किया गया धोखा नहीं है, बल्कि हमारा दिमाग हमें उस पक्ष की तरफ झुकाने के लिए बना है। इसलिए आजकल एक ही व्यक्ति किसी के लिए 'क्रांतिकारी' है तो किसी के लिए 'उपद्रवी'। एक ही भाषण किसी के लिए 'साहस' है तो किसी के लिए 'बदतमीज़ी'। और यही दोहरा मापदंड नैतिकता को खत्म कर रहा है। अब सही या गलत नहीं रहा, अब सिर्फ 'हमारा' और 'उनका' रह गया है।पेपर लीक, बेरोजगारी मुद्दा
इस पूरे शोर में सबसे बड़ी क्षति यह होती है कि बातचीत का असली विषय कहीं गुम हो जाता है। अगर युवा बेरोज़गारी और पेपर लीक के खिलाफ आए थे, तो बहस वहाँ होनी चाहिए थी। पर जैसे ही गाली-गलौज का वीडियो वायरल हुआ, सारी बहस गाली पर आ गई। फिर जैसे ही प्रधानमंत्री का जवाब आया, सारी बहस संयम बनाम नाटक पर आ गई। और बीच की पूरी बात—जो सबसे ज़रूरी थी—कि आखिर युवा क्यों सड़कों पर आए, क्या उनकी माँगें सही थीं, क्या किए जाने की ज़रूरत है—वह सारी बातें कहीं धीरे-धीरे खत्म हो गईं। इसीलिए कहा जाता है कि सूचना युद्ध की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह आपको किसी मुद्दे पर बहस करने से रोक देता है और आपको किसी दूसरे झगड़े में उलझा देता है।
यह सब सिर्फ भारत में नहीं हो रहा। अमेरिका का चुनाव हो या यूरोप का जनमत संग्रह, यूक्रेन-रूस युद्ध हो या गाजा में संघर्ष—हर जगह यही हो रहा है। छोटे-छोटे क्लिप, तस्वीरें, मीम्स, लोगों के पुराने बयानों के अलग-अलग टुकड़े—इन सबके ज़रिए जनता की सोच को एक दिशा देने की कोशिश होती है। अब कोई भी बड़ी ताकत इतनी मूर्ख नहीं है कि सीधे लोगों से कहे कि यह सोचो। वह बस कुछ वीडियो छोड़ देती है, कुछ हैशटैग वायरल कर देती है, और लोग खुद ही उस दिशा में सोचने लगते हैं। यही असली ताकत है सूचना युद्ध की—लोगों को ऐसा भरोसा दिलाना कि यह उनका अपना विचार है, जबकि असल में वह किसी और के द्वारा बनाया गया विचार है।लेकिन क्या हर वायरल चीज़ झूठ होती है? बिल्कुल नहीं। कई बार कैमरे ने सच को उजागर किया है। कई बार वायरल वीडियो ने सरकारों को हिला दिया है, भ्रष्टाचार को उजागर किया है, निर्दोषों को बचाया है। पर सच यह भी है कि हर वायरल चीज़ अंतिम सच्चाई नहीं होती।
एक वीडियो को काट-छाँट कर, उसे अलग संदर्भ में, अलग समय के साथ, अलग कैप्शन के साथ पेश किया जा सकता है। जो पहले 'भ्रष्टाचार का सबूत' लग रहा था, वही बाद में 'गलतफहमी' साबित हो सकता है। और जब तक पूरी जाँच होती है, तब तक वह वीडियो लाखों लोगों के दिमाग में बैठ चुका होता है। जो बात लाखों ने देखी और विश्वास की, उसे बाद में वापस लेना असंभव होता है। इसलिए कहा जाता है कि डिजिटल युग में सबसे बड़ा खतरा झूठ नहीं, बल्कि आधा सच होता है।
भावना में बहने से कैसे बचें?
तो अब सवाल यह है कि इस सब के बीच हम आम लोग क्या कर सकते हैं? यह सोचना कि हम इस युद्ध से बाहर निकल सकते हैं, गलत है। हम सब इसके अंदर हैं। हर दिन हम स्क्रीन देखते हैं, हर दिन हमें कोई न कोई वीडियो मिलता है जो हमें उत्तेजित करता है। पर फर्क इस बात का है कि हम उस उत्तेजना पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। क्या हम तुरंत उस पर भरोसा कर लेते हैं और आगे भेज देते हैं, या हम एक पल रुकते हैं?
यह रुकना बहुत ज़रूरी है। जब भी कोई वीडियो हमें बहुत ज्यादा गुस्सा दिलाए, या बहुत ज्यादा दुखी करे, या बहुत ज्यादा उत्साहित करे—तब हमें रुक जाना चाहिए। और खुद से तीन सवाल पूछने चाहिए। पहला, यह वीडियो मुझमें कौन सी भावना पैदा कर रहा है और क्यों? दूसरा, अगर यह वीडियो पूरा न होकर सिर्फ एक हिस्सा है, तो बाकी का हिस्सा क्या हो सकता है? और तीसरा, इस पूरे झगड़े के बीच क्या कोई ऐसा मुद्दा है जो हमसे छिप रहा है? इन तीन सवालों के बिना अगर हम कोई भी सामग्री देखते या शेयर करते हैं, तो हम अनजाने में किसी की कहानी को फैलाने का काम कर रहे होते हैं।इसके अलावा कुछ आदतें भी डालनी चाहिए। कोई भी वीडियो शेयर करने से पहले उसकी सच्चाई की जाँच करने की आदत। यह मुश्किल नहीं है। आजकल कई वेबसाइट्स और टूल्स हैं जो बताते हैं कि कोई वीडियो पुराना तो नहीं, किसी और देश का तो नहीं, किसी के साथ छेड़छाड़ तो नहीं हुई। दूसरी आदत, उस सामग्री को कम से कम एक अलग दृष्टिकोण वाले सोर्स से देखने की। अगर एक चैनल कुछ कह रहा है, तो दूसरे को भी देखें। अगर कोई बात बहुत एकतरफा लग रही है, तो शायद वह सच नहीं है। तीसरी और सबसे बड़ी आदत—धैर्य। सोशल मीडिया हमें तुरंत रिएक्शन देना सिखाता है। पर जो लोग रुककर सोचते हैं, वे ही इस युद्ध में हारते नहीं हैं।
बिना सबूत समर्थन या विरोध न करें
यह सोचना भूल है कि यह संघर्ष सिर्फ सरकारों, पार्टियों या बड़ी कंपनियों के बीच है। यह संघर्ष हमारे मन में है। हर बार जब हम बिना सोचे-समझे किसी पर भरोसा कर लेते हैं, हर बार जब हम बिना सबूत के किसी का विरोध करने लगते हैं, हर बार जब हम विरोधी पक्ष को 'गलत' और अपने पक्ष को 'सही' मान लेते हैं—तब हम यह युद्ध हार रहे होते हैं। और हर बार जब हम रुकते हैं, प्रश्न पूछते हैं, विरोधी राय को सुनते हैं और फिर अपनी राय बनाते हैं—तब हम जीत रहे होते हैं।शायद इसीलिए आज के समय में सबसे बड़ा साहस गाली देने का नहीं, बल्कि सुनने का है। सबसे बड़ी ताकत नारे लगाने की नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की है। सबसे बड़ा अधिकार जानकारी फैलाने का नहीं, बल्कि उसे परखने का है। दुनिया अब ऐसी है कि हम सच और झूठ के बीच आसानी से फर्क नहीं कर सकते, क्योंकि दोनों एक जैसे दिखते हैं, एक जैसी भाषा में आते हैं, एक जैसे वीडियो में आते हैं। पर जो लोग रुककर सोचते हैं, वे इस अंधेरे में रोशनी पा लेते हैं।
जंतर-मंतर का वह वीडियो आज शायद भुला दिया गया होगा। और अगले दिन कोई और वीडियो आएगा, और हम फिर बँटेंगे, फिर बहस करेंगे। इस चक्र को रोकना हम में से किसी के बस में नहीं है। पर इसमें चेतना बनाए रखना, अपनी सोच को स्वतंत्र रखना—यह हर एक व्यक्ति के बस में है। और अगर हम में से एक-एक व्यक्ति यह कर ले, तो शायद यह सूचना का युद्ध अपनी सबसे बड़ी हार देखे—वह हार जब कोई भी व्यक्ति किसी के बनाए नैरेटिव का मोहरा बनने को तैयार न हो। तब हम असली लोकतंत्र की तरफ वापस लौटेंगे, जहाँ बहस होती है, दिखावे नहीं; जहाँ नीति होती है, नारे नहीं; जहाँ सोच होती है, शोर नहीं। और यही एकमात्र रास्ता है, इंटरनेट के इस जंगल में अपनी चेतना को बचाए रखने का।