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आंदोलित किसान एक गलती कर रहे हैं! 

दिल्ली के निवासी खाद्यान्नों, सब्जियों, दूध, ईंधन आदि के लिए बाहरी राज्यों पर निर्भर हैं। ये सभी चीजें बाहर से आती हैं, क्योंकि दिल्ली के भीतर कुछ भी उत्पादित नहीं होता है। यदि ये दिक्कत बनी रहती है तो इससे दिल्ली में रहने वाले लगभग 2 करोड़ लोगों को भारी कष्ट होगा और साथ ही उन दूसरे लोगों को जिन्हें अपने दैनिक काम के लिए इन सड़कों का उपयोग करना पड़ता है।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

मैं वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन का समर्थक रहा हूं। मैंने इसे एक ऐतिहासिक घटना कहा है, क्योंकि इसने हमें विभाजित कर रहे जाति और धर्म की बाधाओं को तोड़ दिया है और भारतीयों को एकजुट कर दिया है। इस प्रकार इसने हमारे सबसे बड़े अवरोध को दूर किया है, जो हमारे राष्ट्र की प्रगति में मुख्य बाधा थी। फिर भी  मुझे एक गलती बतानी होगी। किसानों की दिल्ली से आने-जाने के लिए सड़कों को अवरुद्ध करने की रणनीति ठीक नहीं है।  

किसान नेताओं को महसूस करना चाहिए कि इस रणनीति से जनता की किसानों के प्रति सहानुभूति खत्म हो जाएगी, क्योंकि इससे दिल्ली में रहने वाले लोगों और अन्य लोगों को, जो दिल्ली आते-जाते हैं, को काफी मुश्किल हो रही है।

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दिल्ली के निवासी खाद्यान्नों, सब्जियों, दूध, ईंधन आदि के लिए बाहरी राज्यों पर निर्भर हैं। ये सभी चीजें बाहर से आती हैं, क्योंकि दिल्ली के भीतर कुछ भी उत्पादित नहीं होता है। यदि ये दिक्कत बनी रहती है तो इससे दिल्ली में रहने वाले लगभग 2 करोड़ लोगों को भारी कष्ट होगा और साथ ही उन दूसरे लोगों को जिन्हें अपने दैनिक काम के लिए इन सड़कों का उपयोग करना पड़ता है।

किसान आंदोलन पर देखिए चर्चा-
ऐसे समय में किसानों को क्या करना चाहिए जबकि उनके और सरकार के बीच गतिरोध है? मेरी राय में सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के उस सुझाव को स्वीकार करना चाहिए जिसमें सरकार को उन 3 कानूनों को जिन पर किसान आपत्ति कर रहे हैं, कार्यान्वित न करने की राय दी है। दूसरा किसानों को अपना आंदोलन स्थगित (रद्द नहीं) करना चाहिए। किसान दिल्ली के पास रह सकते हैं, लेकिन सड़कों को अवरुद्ध नहीं करें। 
Kisan protest in delhi trouble for common man  - Satya Hindi

किसान आयोग का गठन

सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को स्वीकार करने के बाद, किसानों की समस्याओं के सभी पहलुओं पर विचार करने के लिए एक किसान आयोग का गठन होना चाहिए जिसमें किसान संगठनों के प्रतिनिधि, सरकार के प्रतिनिधि और कृषि विशेषज्ञ हों और आम सहमति से जो राय निकलती है उसे एक कानून द्वारा कार्यान्वित किया जाना चाहिए। हालाँकि आयोग से नतीजा आने में महीनों लग सकते हैं। 

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यदि किसान सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव को मान लेते हैं तो सरकार बैकफुट पर चली जायेगी और अगर सरकार फिर क़ानूनों को सस्पेंड नहीं करती है तो उस पर तोहमत लगेगी कि वो जानबूझकर किसानों की समस्या का समाधान नहीं करना चाहती। 

इबादतखाना नामक एक अंतरराष्ट्रीय संगठन द्वारा हाल ही में आयोजित एक वेबिनार में, जिसमें किसान नेता राकेश टिकैत और मैंने भाग लिया। मैंने टिकैत से इस सुझाव को मानने की बात की थी। उन्होंने कहा कि वो इस सुझाव को किसानों की समन्वय समिति जिसमें 40 किसान संगठन शामिल हैं, के सामने रखेंगे। आशा है कि किसान इस प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे और अपनी गलती को सुधारेंगे। 

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जस्टिस मार्कंडेय काटजू
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