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पानी की बोतलें लूटते लोग।

जागो सरकार, भूख-प्यास के चलते स्टेशनों पर हो रही लूटपाट कहीं और न बढ़ जाए

रेलवे मजदूरों की वापसी तो करवा रही है लेकिन रेल यात्रियों को खाने और पानी के लिए तरसना पड़ रहा है और इस वजह से लूटमार की घटनाएं हो रही हैं। यदि हालात यही रहे तो मान लीजिए कि देश में अराजकता के फैलने की घंटियां बजने लगी हैं और हमारे हवाई अड्डों पर भी शीघ्र ही इसी तरह की लूटपाट के दृश्य दिखने लगेंगे। 
डॉ. वेद प्रताप वैदिक

देश के कई शहरों में गर्मी 50 डिग्री तक बढ़ रही है और भारत की गिनती अब दुनिया के उन पहले 10 देशों में हो गई है, जिनमें कोरोना वायरस सबसे ज्यादा फैला है। सरकार ने रेलें, बसें और जहाज तब तो नहीं चलाए, जबकि कोरोना देश में नाम-मात्र फैला था। उसे अब दो माह बाद सुधि आई है लेकिन अब हाल क्या है? 

सरकार ने जहाज और रेल-टिकट बेच दिए लेकिन हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर हजारों यात्रियों का मजमा लग गया है। उन्हें पता ही नहीं है कि उनके जहाज और रेलें चलेंगी या नहीं या कब चलेंगी। लगभग 3000 श्रमिक रेलें चली हैं, जो कि बहुत अच्छी बात है लेकिन उनका यही पता नहीं कि वे अपने गंतव्य पर कितने घंटे या कितने दिन देर से पहुंचेंगी। 

महाराष्ट्र से चलने वाली रेलें, जिन्हें 30 घंटे में बिहार पहुंचना था, वे 48 घंटों में पहुंची हैं। रेल मंत्रालय को शाबासी कि उसने अब तक 40-45 लाख लोगों की घर-वापसी करवा दी लेकिन रेल-यात्रियों को खाने और पानी के लिए जिस तरह तरसना पड़ा है, उसे देखकर आंखों में आंसू आ जाते हैं।

रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर लूटपाट

परसों महाराष्ट्र के पालघाट से बिहार शरीफ जा रही रेल प्रयागराज स्टेशन पर रुकी तो क्या हुआ? भूख के मारे दम तोड़ रहे यात्रियों ने प्लेटफ़ॉर्म पर बिक रहा सारा माल लूट लिया। जो लोग अपने रिश्तेदारों के लिए खाने के पैकेट लाए थे, वे भी लूट लिये गए। यही लूटपाट अन्य कई स्टेशनों पर भी हुई। 

पिछले हफ्ते सड़क चलते कई मजदूरों ने फलों और सब्जियों के ठेले लूट लिये। इसमें शक नहीं कि सरकार इस संकट से निपटने की भरसक कोशिश कर रही है लेकिन उसका दोष यही है कि वह कोई भी नया कदम उठाने के पहले आगे-पीछे नहीं सोचती। जो ग़लतियां, उसने नोटबंदी और जीएसटी के वक्त की थीं, उन्हें ही वह लॉकडाउन शुरू करते और अब उसे उठाते वक्त कर रही है।

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हमारे सत्तारुढ़ नेता नौकरशाहों से काम ज़रूर लें लेकिन जनता से जब तक वे सीधा संपर्क नहीं बढ़ाएंगे, ऐसी ग़लतियां बराबर होती ही रहेंगी। यदि यह संकट अपूर्व और भयंकर है तो हमारे राजनीतिक दल क्या कर रहे हैं? उनके करोड़ों कार्यकर्ताओं को स्थानीय जिम्मेदारियां क्यों नहीं सौंपी जातीं? यह ऐसा मौका है, जबकि हमारे लाखों फौजी जवानों से भी मदद ली जा सकती है। 

(डॉ. वेद प्रताप वैदिक के ब्लॉग www.drvaidik.in से साभार)

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डॉ. वेद प्रताप वैदिक
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