महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव के नतीजों के बाद से मैंने विधानसभा चुनावों के समय राजनीतिक विश्लेषण करना छोड़ दिया है, क्योंकि बदली हुई परिस्थितियों में इसका कोई अर्थ नहीं रह गया है। जाने-माने अर्थशास्त्री और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति डॉ. पराकला प्रकाश ने चुनाव आयोग की रातों-रात “नाम मिटाओ, नाम चढ़ाओ और चुनाव जिताओ परियोजना” सीआरआर को दुनिया का सबसे बड़ा अहिंसक नरसंहार करार दिया है।
यह सच है कि इस देश में आने वाले हर चुनाव का नतीजा वैसा ही होगा, जैसा ‘रिजीम’ चाहेगा। रिजीम शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि अगर तार्किक तरीके से देखें तो 2024 के तुरंत बाद करोड़ों की संख्या में मतदाता सूची से जितने नाम काटे गए हैं, उसने लोकसभा चुनाव के नतीजों और इस सरकार को भी अवैध बना दिया है। यह अलग बात है कि नैतिक शिक्षा की पोथियाँ बाँच रही न्यायपालिका अपनी प्राथमिकताओं की वजह से इन मामलों में दाखिल याचिकाओं की सुनवाई करने को तैयार नहीं है; बल्कि यह कहना चाहिए कि ऐसी याचिकाओं को कूड़ेदान में फेंक देने को विवश है।

क्या असम में सरकार बदलेगी?

असम में जिस तरह की रिकॉर्ड-तोड़ वोटिंग हुई, उसे देखते हुए कुछ लोग सरकार बदलने की संभावना जता रहे हैं। यह सुनकर मुझे हँसी आती है। मैं यह नहीं कह रहा कि सरकार नहीं बदल सकती, लेकिन असम में बीजेपी सिर्फ उसी परिस्थिति में हारेगी, जब रिजीम चाहेगा। अब सवाल यह है कि रिजीम ऐसा क्यों चाहेगा?
असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर इस समय वही श्रीमान हिमंता बिस्वा शर्मा बैठे हैं, जिन्होंने सांप्रदायिक नफरत की राजनीति के मामले में मानक प्रस्तुत करने वाले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मीलों पीछे छोड़ दिया है। हिमंता की तुलना इस समय सिर्फ भारत विभाजन के समय बंगाल के मुख्यमंत्री रहे एच.एस. सुहरावर्दी से की जा सकती है। हिमंता बीजेपी की नई शैली की राजनीति के सबसे बड़े पोस्टर बॉय हैं और बहुत से दूसरे भाजपाई मुख्यमंत्रियों के रोल मॉडल भी।

हिमंता ने मोदी के बारे में क्या कहा था?

अब थोड़ा पीछे लौटते हैं। हिमंता बिस्वा शर्मा 2014 तक कांग्रेस के एक फिक्सर किस्म के नेता थे, जिन्हें आलाकमान ने कभी पसंद नहीं किया। इन्हीं हिमंता ने 29 मार्च 2014 को असम के तेजपुर में एक रैली को संबोधित करते हुए अपने वर्तमान गुरु श्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में ये उद्गार व्यक्त किए—“गुजरात में मुसलमानों का खून पाइप में बहता है। प्रार्थना करो कि ऐसा हत्यारा किसी भी हालत में भारत का प्रधानमंत्री न बने।”
“गुजरात के उसी हत्यारे” ने चिटफंड घोटाले में सपत्नीक फँसे और एफ़आईआर प्राप्त हिमंता को अपनी वॉशिंग मशीन में धोया और रातों-रात ‘हिंदुत्व’ का पोस्टर बॉय बना दिया। हिंदुत्व, जिसकी अप्लाइड मीनिंग उग्र सांप्रदायिक विभाजन के सिवा कुछ नहीं है। आपको हिमंता के पचासों ऐसे बयान मिल जाएँगे, जब वे अत्यंत घृणा से अपनी तोतली जुबान में कह रहे हैं कि राहुल गांधी कुत्ते को बिस्कुट खिला रहे थे, लेकिन मुझे मिलने का समय नहीं दिया।
खरबों का घोटाला करने वाले व्यक्ति को खुद से दूर रखने वाला आदमी पप्पू या विलेन, और उसके भ्रष्टाचार के सारे मुकदमे धो-पोंछकर सीएम बना देने वाला ‘महामानव’ है—अच्छाई और बुराई की नई परिभाषाएँ यही हैं, क्योंकि यही न्यू इंडिया है; एक ऐसा देश, जहाँ नफरती के हाथों गोलियाँ खाकर गिरते वक्त ‘हे राम’ कहने वाला सबसे बड़ा हिंदू विरोधी है, और रिलिजियस टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए सैकड़ों ऐतिहासिक मंदिरों पर बुलडोजर चलवा देने वाला नेता राम से भी बड़ा है।

बहरहाल, लौटते हैं मूल सवाल पर, जो हिमंता बिस्वा शर्मा के एक ‘चोर’ से हिंदुओं के सबसे बड़े ‘आदर्श’ के रूप में स्थापित होने से खड़ा हुआ है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली नई बीजेपी की असली विचारधारा क्या है—चोरी, सांप्रदायिकता या फिर दोनों?
आप हज़ारों करोड़ के घोटालों में फँसे उन बीसियों राजनेताओं को ही मत देखिए, जो मोदी की वॉशिंग मशीन में धुलकर श्रेष्ठ हिंदू और अनुकरणीय हो गए। आप हज़ारों की संख्या में पार्टी में रोज भर्ती हो रहे लोगों के प्रोफाइल पर नज़र डालिए—सब कुछ पानी की तरह साफ़ हो जाएगा। मैं यहाँ सिर्फ़ दो-तीन उदाहरण दे रहा हूँ।

प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले एक पूर्व राजनयिक हैं, जिन्हें मैं बचपन में कांग्रेसी शासन में दूरदर्शन पर एंकरिंग करते और सरकार से सख्त सवाल पूछते देखा करता था। ये महानुभव अचानक घूम-घूमकर दावा करने लगे कि मैं जिस देश में जाता हूँ, वहाँ के लोग यह माँग करते हैं कि हमें कुछ समय के लिए मोदीजी उधार दे दीजिए। ये साहब अचानक घुमा-फिराकर मुसलमानों को निशाना भी बनाने लगे। मुझे कारण समझ नहीं आया।

फिर अचानक पता चला कि सूडान में पोस्टिंग के दौरान इन पर करोड़ों के वारे-न्यारे करने के इल्जाम हैं और फिलहाल जाँच चल रही है। दूसरा उदाहरण आम आदमी पार्टी के एक विधायक का है, जो सांप्रदायिकता पर बहस करता था और बीजेपी समर्थकों के छक्के छुड़ा देता था। यह वही आदमी है, जिसने मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए एक लड़की के शोषण का कच्चा-चिट्ठा बकायदा दिल्ली की विधानसभा में सबूतों के साथ खोला था।
आम आदमी पार्टी से निकाले जाने के बाद वही आदमी अचानक रातों-रात इस देश से मुसलमानों को मिटाने निकल पड़ा। दंगों का सफल नेतृत्व करने के बाद विधायक बना और अब बकायदा मंत्री है। तीसरा उदाहरण हथियारों के एक बदनाम तस्कर का है, जो अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पर अधनंगी मॉडलों के साथ तस्वीरें पोस्ट किया करता था।

उसी आदमी के फेसबुक या इंस्टाग्राम पर जाइए—अब वह हिंदुओं का सबसे बड़ा रक्षक है और नरेंद्र मोदी का अनन्य भक्त है। अगर मैं उदाहरण गिनाता जाऊँ, तो यह लेख कभी खत्म ही नहीं होगा। 

निष्कर्ष यह है कि जो जितना बड़ा चोर है, वह बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति को खाद-पानी देने के काम में उतनी ही जोर-शोर से सक्रिय है।

इन सबने मिलकर पूरे भारत को दुनिया के एक अनोखे और सबसे बड़े क्रिमिनल सिंडिकेट में बदल दिया है। एक ऐसा तंत्र, जो रातों-रात विधायक खरीदकर चुनी हुई सरकारें बदलवा सकता है, मनचाहे चुनावी नतीजे ला सकता है, मीडिया के आगे हड्डी फेंककर उसे चुप करा सकता है, जजों को ब्लैकमेल कर सकता है और विरोध करने वाली छिट-पुट आवाजों को खामोश करवा सकता है।

सांप्रदायिकता और विभाजनकारी राजनीति अब इस देश का सबसे बड़ा संगठित रोजगार है। 2014 से पहले यह अकल्पनीय था कि दुनिया की सबसे वाइब्रेंट डेमोक्रेसी एक बनाना रिपब्लिक बन जाएगी। आज के भारत की तुलना आप पाब्लो एस्कोबार कालीन कोलंबिया जैसे किसी देश से ही कर सकते हैं। बोल पाना संभव नहीं है। बोल सिर्फ वही सकता है, जिसे अगस्त क्रांति के दौरान कही गई महात्मा गांधी की वह बात याद हो—“आज़ादी कायरों को नहीं मिलती।”