नरेंद्र मोदी के लगातार 4399 दिनों से अधिक समय तक प्रधानमंत्री रहने के साथ जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ने का दावा किया जा रहा है। लेकिन यह अवसर उत्सव का नहीं, बल्कि गंभीर समीक्षा का है। केवल लंबे समय तक सत्ता में बने रहना किसी नेतृत्व की सफलता का प्रमाण नहीं होता। मोदी के मामले में यह लंबा कार्यकाल लोकतांत्रिक उपलब्धि से अधिक संस्थागत प्रक्रियाओं, मतदाता सूचियों में संशोधन और चुनावी रणनीतियों का परिणाम दिखाई देता है, जिन पर निष्पक्षता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

यह रिकॉर्ड मोदी सरकार की उपलब्धियों की पुष्टि नहीं करता, बल्कि यह दिखाता है कि बारह वर्षों के शासन ने भारत को अधिक विभाजित, आर्थिक रूप से असुरक्षित और कूटनीतिक रूप से कमज़ोर बनाया है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 2014 में कहा था कि मोदी का प्रधानमंत्री बनना “देश के लिए विनाशकारी” साबित होगा। आज यह चेतावनी काफ़ी हद तक सच होती दिखाई देती है।
ताज़ा ख़बरें

चुनावी मशीनरी और सत्ता की लंबी उम्र

मोदी सरकार की लंबी सत्ता के पीछे भाजपा की लगातार चुनावी बढ़त है, जिसे चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रियाओं ने भी मजबूत किया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में शुरू की गई इस प्रक्रिया के तहत घर-घर जाकर सत्यापन किया गया और लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए। सरकार ने इसे मृत, डुप्लीकेट और अयोग्य मतदाताओं को हटाने की कवायद बताया, लेकिन आलोचकों का आरोप है कि इसका असर विपक्षी क्षेत्रों पर अधिक पड़ा।

राहुल गांधी ने “वोट चोरी” के आरोप लगाते हुए कई प्रेस कॉन्फ्रेंस में हरियाणा और बेंगलुरु जैसे राज्यों में कथित अनियमितताओं, डुप्लीकेट नामों और संदिग्ध पैटर्न का मुद्दा उठाया। विपक्ष का कहना है कि संस्थागत पक्षपात और मतदाता प्रबंधन ने भाजपा की चुनावी बढ़त बनाए रखने में मदद की।

अगर सत्ता बनाए रखने के लिए चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठें, तो केवल लंबा कार्यकाल लोकतांत्रिक वैधता का प्रमाण नहीं बन सकता। असली कसौटी शासन के परिणाम होते हैं।

आर्थिक वादों से असुरक्षा तक

2014 में मोदी सरकार को एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी। लेकिन इसके बाद कई ऐसे फ़ैसले हुए जिन्होंने अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया। 2016 की नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि काले धन पर इसका असर सीमित रहा। जीएसटी जैसी आवश्यक कर व्यवस्था भी जल्दबाज़ी और ख़राब तैयारी के कारण छोटे व्यापारियों के लिए भारी बोझ बन गई।

सरकार करोड़ों लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालने का दावा करती है, लेकिन दूसरी ओर 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन देना पड़ रहा है। युवाओं में बेरोज़गारी लगातार ऊँचे स्तर पर बनी हुई है।
पश्चिम एशिया के संघर्ष और तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी ने महँगाई को और बढ़ाया है। आम परिवारों का घरेलू बजट बुरी तरह प्रभावित हुआ है। शिक्षा क्षेत्र में भी संकट गहराया है। हाल के वर्षों में बार-बार नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने, परीक्षाएं रद्द होने और दोबारा आयोजित करने की घटनाओं ने लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित किया। सीबीएसई के “OSM” विवाद ने भी शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया।

आलोचकों का आरोप है कि राजनीतिक सत्ता और बड़े उद्योगपतियों के गठजोड़ ने असमानता को और बढ़ाया है। विशेष रूप से कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों को बुनियादी ढांचे, मीडिया और संसाधनों में अधिक लाभ मिलने के आरोप लगे। “गुजरात मॉडल” को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने के बावजूद व्यापक आर्थिक समानता के बजाय सामाजिक विभाजन और अभिजात्य व्यवस्था अधिक स्पष्ट दिखाई दी।

सामाजिक तनाव और संस्थाओं का क्षरण

मोदी शासन में सामाजिक सौहार्द भी कमज़ोर हुआ है। सांप्रदायिक घटनाएँ, मॉब लिंचिंग और नफ़रत भरी बयानबाजी में वृद्धि देखी गई। कई मामलों में राज्य की भूमिका निष्पक्ष के बजाय पक्षपातपूर्ण मानी गई।

राम मंदिर और अनुच्छेद 370 जैसे फैसलों ने भाजपा समर्थकों को प्रतीकात्मक जीत दी, लेकिन इससे अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी और संघीय ढांचे पर दबाव पड़ा। मणिपुर की हिंसा, लंबित जांच और यूएपीए जैसे क़ानून का विरोधियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल लोकतांत्रिक असहमति के लिए सीमित होती जगह की ओर इशारा करता है।

हाल ही में जंतर-मंतर पर “कॉकरोच जनता पार्टी” के नाम से हुए विरोध प्रदर्शन ने युवाओं की बढ़ती नाराज़गी को सामने लाया। यह आंदोलन मुख्य न्यायाधीश की उस टिप्पणी के बाद शुरू हुआ जिसमें कुछ युवा आलोचकों की तुलना “कॉकरोच और परजीवी” से की गई थी। व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ यह अभियान शिक्षा और रोज़गार संकट के ख़िलाफ़ व्यापक ग़ुस्से का प्रतीक बन गया।

इस दौरान संस्थाओं की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठे। मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार समर्थक दिखाई दिया, जांच एजेंसियों के चयनात्मक इस्तेमाल के आरोप लगे, बेरोज़गारी और उपभोग जैसे आंकड़ों को दबाने की बात कही गई और पीएम केयर्स जैसे फ़ंड की पारदर्शिता पर भी प्रश्न उठे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए गए चुनावी बॉन्ड इस अपारदर्शिता का बड़ा उदाहरण बने।

विदेश नीति: छवि अधिक, परिणाम कम

मोदी की विदेश नीति को अक्सर व्यक्तिगत शैली और बड़े आयोजनों के लिए याद किया जाता है। लेकिन आलोचकों के अनुसार इसमें ठोस रणनीतिक गहराई की कमी रही। सार्क लगभग निष्क्रिय हो चुका है, जबकि ब्रिक्स भी आंतरिक मतभेदों से जूझ रहा है। वैश्विक दक्षिण के कई हिस्सों में भारत की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही।
विचार से और
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर सरकार पर “झुकने” के आरोप लगे और किसानों ने विरोध प्रदर्शन किए। विपक्ष ने इसे बाज़ार पहुंच के बदले संप्रभुता से समझौता बताया।

2026 की शुरुआत में अमेरिका-इसराइल द्वारा ईरान पर हमलों से कुछ दिन पहले मोदी की इसराइल यात्रा ने भी विवाद खड़ा किया। आलोचकों का कहना था कि इससे भारत की पारंपरिक संतुलित विदेश नीति और ऊर्जा हित प्रभावित हुए।

पहलगाम आतंकी हमले और “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद सैन्य कार्रवाई ज़रूर हुई, लेकिन पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और सीमा तनाव जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान अब भी दूर है। राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा कई बार दीर्घकालिक रणनीति से अधिक चुनावी राजनीति का हिस्सा दिखाई देता है।

एक चेतावनी जो सच साबित हुई

डॉ. मनमोहन सिंह की चेतावनी आज कई मोर्चों पर सही साबित होती दिखती है। भूख, प्रेस स्वतंत्रता और लोकतंत्र जैसे वैश्विक सूचकांकों में भारत की स्थिति कमजोर हुई है। कोविड प्रबंधन, अत्यधिक केंद्रीकरण और आक्रामक राष्ट्रवाद के बावजूद मजबूत संस्थाएं और समावेशी विकास नहीं बन पाया।

आज का भारत अधिक ध्रुवीकृत, असमान और कम बहुलतावादी दिखाई देता है। केवल लंबे समय तक सत्ता में बने रहना उपलब्धि नहीं होता, यदि उसके साथ जवाबदेही और परिणाम न हों।

भारत एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। ज़रूरत इस बात की है कि संवैधानिक मूल्यों को पुनर्स्थापित किया जाए, संस्थाओं की स्वतंत्रता बहाल हो और 140 करोड़ लोगों की वास्तविक समस्याओं को राजनीतिक छवियों और आयोजनों से ऊपर रखा जाए। बारह वर्षों ने यह साबित कर दिया है कि समानता और न्याय के बिना लंबी सत्ता नेतृत्व नहीं, बल्कि भटकाव बन जाती है। देश इससे बेहतर का हक़दार है।