गुजरे साल का आखिरी दिन अयोध्या की राजनीति का भी आखिरी दिन बन गया। 31 दिसंबर 2025 को अयोध्या में रामलला की प्रतिष्ठा द्वादशी का कार्यक्रम श्रद्धा से भरपूर था, पर राजनीतिक रूप से फीका। मंच पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह थे, लेकिन दो बड़े चेहरे अनुपस्थित थे जिनके नाम पिछले एक दशक से राम मंदिर की राजनीति के साथ जुड़े थे – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह। यह कोई सामान्य अनुपस्थिति नहीं थी। यह वह ऐतिहासिक संकेत था कि जिस मंदिर आंदोलन ने देश की राजनीति को कई दशकों तक प्रभावित किया, जिसने भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुँचाया, उसकी राजनीति का अध्याय समाप्त हो गया है। भाजपा ने नारा दिया था - "जो राम को लाये हैं, हम उनको लायेंगे", लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी राम और उससे जुड़े धार्मिक आस्था की सभी सीटों पर हार गयी थी। आज राम के दरबार में मोदी की गैरहाजिरी के साथ, राम मंदिर की सत्ता की राजनीति का अध्याय समाप्त हो गया।

आंदोलन का उदय और नेतृत्व का बदलता चेहरा

आंदोलन की संगठित शुरुआत का क्रम इस प्रकार है: 1949 में विवादित स्थल पर मूर्तियों के प्रकटीकरण की घटना में निहंग सिखों की कथित भूमिका के बाद, 1981 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप-अशोक सिंघल) ने 'धर्म संसद' के माध्यम से साधु-संतों और संन्यासियों (दौड़ा स्वामी, अवैद्यनाथ और अवधेशानंद गिरि आदि) को संगठित किया; अप्रैल 1984 में विहिप ने राम मंदिर निर्माण का औपचारिक प्रस्ताव पारित किया, और तब जून 1989 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल किया, जिसकी परिणति 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा में हुई।
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आंदोलन के "पुरोधा" और उनका हाशिए पर जाना

  • अशोक सिंघल (विहिप): 1992 के बाद प्रभाव घटा। निधन (2015) से पहले कहा- "आंदोलन भटक गया।" अंतिम दिन उपेक्षा में बीते।
  • प्रवीण तोगड़िया (विहिप): आक्रामक चेहरा, 2002 के बाद दूरी। मोदी काल (2015) में हटाए गए। उद्घाटन में अनुपस्थित।
  • उमा भारती: 1992 का भाषण ऐतिहासिक। 2014 के बाद कद घटा, 2019 में मंत्रिमंडल से बाहर। शिलान्यास-उद्घाटन में गौण। कहा—"राम के लिए लड़े थे, बाजार के लिए नहीं।"
  • विनय कटियार: बाबरी विध्वंस आरोपी। 2014 में सांसद, 2019 में टिकट नहीं। नए दौर में अदृश्य।
  • साध्वी ऋतम्भरा: 1990 के दशक की तेज वक्ता। धीरे-धीरे सीमित। उद्घाटन में केवल औपचारिक उपस्थिति।
नेतृत्व का हस्तांतरण: 1990 के दशक तक नेतृत्व स्पष्ट था- धार्मिक मोर्चे पर सिंघल-तोगड़िया, राजनीतिक मोर्चे पर आडवाणी-जोशी, संगठनात्मक मोर्चे पर संघ। 2000 के दशक में, जब मामला अदालत में अटका, तो केशव राव बलिराम हेडगेवार और फिर मोहन भागवत के नेतृत्व वाले आरएसएस की भूमिका प्रमुख हो गई। भागवत ने 2015 में एक महत्वपूर्ण बयान दिया: "राम मंदिर एक भावनात्मक मुद्दा है, जो हमारे स्वाभिमान से जुड़ा है।" इसने आंदोलन को पुनर्जीवित किया, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया संघ भवन में केंद्रित हो गई।

भाजपा के भीतर का भूचाल: आडवाणी से मोदी तक

अटल बिहारी वाजपेयी ने 6 दिसंबर 1992 को घटना को "राष्ट्रीय शर्म" का दिन कहा था। लालकृष्ण आडवाणी ने 2015 में कहा, "यह (विध्वंस) मेरे जीवन की सबसे दुखद घटना थी।" ये बयान आंदोलन की उग्र छवि को नरम करने और सत्ता में वापसी की रणनीति का हिस्सा थे।
नरेंद्र मोदी का प्रवेश: 1990 के दशक में मोदी एक संगठनकर्ता थे। 2014 का चुनाव उन्होंने "विकास" के एजेंडे पर लड़ा, मंदिर पृष्ठभूमि में रहा। लेकिन सत्ता में आने के बाद, सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई तेज हुई। 2019 में फैसला आया और 5 अगस्त 2020 को शिलान्यास हुआ। कोविड-19 प्रतिबंधों के बावजूद, जिन 175 लोगों को आमंत्रित किया गया, उनमें आडवाणी-जोशी को वर्चुअल लिंक से जोड़ा गया। मंच पूरी तरह मोदी और योगी पर केंद्रित था।

अमित शाह का रहस्यमय अलगाव

अमित शाह कभी मंदिर आंदोलन के "अग्रणी योद्धा" नहीं माने गये। मंदिर के प्रमुख कार्यक्रमों में उनकी नियमित अनुपस्थिति इसे रेखांकित करती है।
  • शिलान्यास (5 अगस्त 2020) के समय कोविड-19 पॉजिटिव के कारण स्व-अलगाव बताया। उद्घाटन (22 जनवरी 2024) में भी शामिल नहीं। दिल्ली में थे, कोई सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं।
  • ध्वजारोहण (25 नवंबर 2024) में भी अनुपस्थित। मोदी ने ध्वजारोहण किया। योगी मौजूद। प्रतिष्ठा द्वादशी (31 दिसंबर 2025) के अनुष्ठान के दिन वे पश्चिम बंगाल में थे।
  • अमित शाह मंदिर निर्माण स्थल का दौरा करने अलग से गए थे। एक बार और निजी दौरे पर गए। सार्वजनिक मीडिया केंद्रित कार्यक्रमों से उन्हें दूर देखा गया है। शाह का राजनीतिक ब्रांड "चुनावी रणनीतिकार और सख्त गृहमंत्री" का रहा है, "रामभक्त" का नहीं। आंतरिक समीकरणों में संघ का एक वर्ग शाह को "अति-महत्वाकांक्षी" मानता है।

योगी-राजनाथ की बढ़ती भूमिका

मंदिर का स्थानीय प्रबंधन और धार्मिक प्रचार अब योगी के हाथ में है। राजनाथ सिंह, संघ के पुराने सिपाही और आडवाणी युग के नेता के रूप में, पुराने और नए के बीच पुल की तरह हैं। शाह इनमें से किसी श्रेणी में नहीं आते।

उद्घाटन में मोहन भागवत एक महत्वपूर्ण अतिथि के रूप में मौजूद थे, मुख्य भूमिका नहीं। उन्होंने कहा कि मंदिर का उद्घाटन हो गया, अब राम की मर्यादा का पालन होना चाहिए। मंदिर का राजनीतिक श्रेय भाजपा (विशेषकर मोदी) ने लिया, संघ को पृष्ठभूमि में डाल दिया।

घोटाले के आरोप

जमीन खरीद घोटाला: 2021-22 में ट्रस्ट ने अयोध्या में मंदिर परिसर के लिए लगभग 55 एकड़ जमीन खरीदी। विवाद तब खड़ा हुआ जब पता चला कि कुछ जमीन के प्लॉट बेहद ऊँची कीमत पर खरीदे गए थे। उदाहरण के लिए, एक प्लॉट जिसका रजिस्ट्री मूल्य 2 करोड़ रुपये था, उसे 18.5 करोड़ रुपये में खरीदा गया। विपक्ष ने इसमें भ्रष्टाचार के आरोप लगाये। ट्रस्ट ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कीमत भूमि की स्थिति और भावी योजनाओं के आधार पर तय करने की दलील दी।

नारे भावनाओं के हथियार थे, सत्य नहीं

“"500 साल से टेंट में" — यह एक ऐतिहासिक अतिशयोक्ति थी। इसका संदर्भ बाबरी ढांचे के निर्माण (लगभग 1528 ई.) से जोड़ा जाता है, पर 1949 से पहले वे उस स्थल पर मूर्ति-रूप में सार्वजनिक रूप से स्थापित भी नहीं थे। यह नारा इतिहास को नाटकीय बनाने का राजनीतिक प्रयास था—सत्य नहीं। राम अनादि हैं, सनातन हैं, ब्रह्मांडीय चेतना के प्रतीक हैं—जिनकी पूजा वैदिक परंपरा, पुराणों और लोक-स्मृति में सहस्राब्दियों से होती आई है। रामचरितमानस की रचना तुलसीदास ने मुगल शासक अकबर के काल में की। यह इस बात का प्रमाण है कि राम की उपासना किसी राजनीतिक सत्ता की मोहताज नहीं रही। उन्हें “500 साल” के दायरे में बाँधना, राम को एक ऐतिहासिक विवाद तक सीमित कर देता है—जबकि उनकी उपस्थिति कालातीत है।
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वह गीत जिसने भावनाओं को तोड़ा

पर असली चोट उस विजय-गीत ने पहुँचाई: "जो राम को लाये हैं..."। इसे राजनीतिक दंभ का नारा बना दिया गया। इसने सत्ता को राम का 'उद्धारक' सिद्ध कर दिया, जबकि राम सनातन हैं — किसी के लाए या लौटाए जाने वाले नहीं।

विडंबना यह रही: जिन 'लाने वालों' का बखान था, वे ही उद्घाटन के मंच से गायब थे। वहाँ स्थान कॉरपोरेट्स और सेलेब्रिटीज़ के लिए सुरक्षित था। गीतकार और गायक भी विस्मृत कर दिए गए। यह उन अनाम कारसेवकों के बलिदान के साथ विश्वासघात था।

एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कटु सत्य कहा: "हम रामराज्य लाना चाहते थे, पर एक कॉरपोरेट राज्य ले आए।"

एक नारे ने इतिहास को तोड़ा, दूसरे ने आस्था का राजनीतिकरण किया। राम को कैदी या 'लाई गई संपत्ति' बताना, उनकी कालातीत सत्ता का अपमान था। सच्ची भक्ति अतिशयोक्ति और अहंकार में नहीं, तथ्य और श्रद्धा की निर्मलता में है।

ध्वजारोहण और काँपते हाथ

25 नवंबर 2025 को मोदी ने मंदिर पर ध्वजारोहण किया। कई टीवी चैनलों और 'हिंदुस्तान' अखबार (26 नवंबर 2025, पेज 1) ने उनके हाथों में कंपन दर्ज किया। अखबार ने शीर्षक दिया: "साथ चलने का वक्त" – मोदी। यह शीर्षक उनके भाषण के उद्धरण पर आधारित था, जहाँ मोदी ने कहा था कि "अब देश को साथ लेकर चलने का वक्त है।" लेकिन संदर्भ विचारणीय था। क्या यह केवल एक सामान्य उद्घोषणा थी, या उस कंपन की पृष्ठभूमि में एक गहरा अर्थ था? क्या यह 2024 के चुनावी झटके (240 सीटें), पार्टी के भीतर असंतोष, और संघ के साथ बढ़ती दूरी का संकेत था? राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि मोदी को इस बात का अहसास हो गया था कि मंदिर जैसा प्रतीक अब चुनाव नहीं जिता सकता। "साथ चलने" का आह्वान शायद उनकी अपनी पार्टी और सहयोगियों के लिए भी था।

पीएम मोदी ने राम मंदिर पर धव्जारोहण किया।

6 दिसंबर 1992 ने न सिर्फ एक ढाँचे को गिराया, बल्कि भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ढाँचे की नींव को भी हिला दिया। इसके बाद गोधरा (2002), मुजफ्फरनगर (2013) जैसी घटनाओं ने साम्प्रदायिक विभाजन को गहरा किया। लेकिन 2024 के चुनाव परिणामों ने एक नया सबक दिया: राम के नाम पर भी, जनता ने अयोध्या सीट भाजपा को नहीं दी। जिस राम ने ब्रह्मांड बनाया, उन्हीं के नाम पर बने मंदिर ने सत्ता की राजनीति का घमंड तोड़ दिया। अयोध्या समेत धर्मिक आस्था से जुड़े लगभग सभी लोकसभा क्षेत्रों के मतदाताओं ने रोजगार, कीमतों और स्थानीय विकास के मुद्दे को मंदिर से ऊपर रखा और भाजपा को हरा दिया।

प्रतीक का अंत और नए संघर्ष की तलाश

31 दिसंबर 2025 की अनुपस्थिति आकस्मिक नहीं थी। यह एक सोची-समझी राजनीतिक समापन रेखा थी। मोदी और शाह ने संकेत दे दिया कि राम मंदिर का राजनीतिक उपयोगी जीवनचक्र पूरा हो चुका है। अब यह केवल एक तीर्थस्थल है, जिसका प्रबंधन योगी आदित्यनाथ और धार्मिक नेतृत्व करेंगे।
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भाजपा ने राम मंदिर बनाया, पर राम की मर्यादा और "रामराज्य" से दूर हो गयी। चुनाव जीतने के लिए उसे चुनाव आयोग का सहारा लेना पड़ रहा है, जिसको राहुल गांधी ने दो-दो बड़ी प्रेस कांफ्रेंस और बिहार के हर जिले में रैली कर उजागर कर दिया है। आयोग किसी बात का जवाब नहीं दे पाया। भाजपा के नए लक्ष्य काशी और मथुरा हैं, लेकिन उन पर भी अब सावधानीपूर्वक चलना होगा।

अंतिम सत्य!

तो राम नाम सत्य है। यही सबसे बड़ा सत्य है। राम मंदिर आंदोलन लाखों लोगों की श्रद्धा और त्याग की असली कहानी थी। राजनीति के शिखर पर पहुंच भाजपा ने सत्ता प्राप्ति के इस शक्तिशाली उपकरण को अब शक्तिहीन मान लिया है। राम को महल मिल गया। लेकिन भक्तों को क्या। राम का नाम भजकर सत्तासुख भोगने वाले नेता अब "वनवास" के भय से ग्रसित हैं। क्योंकि उस वनवास में असत्य काम नहीं करता और सत्य स्वभाव के विपरीत हो चुका है। तो अयोध्या मंदिर के राजनीतिक मुद्दे का पटाक्षेप मानिये। य़ह मुद्दा आखिरकार इतिहास के पन्नों में दफन हो गया, जिसने भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुँचाया। राजनीति का चक्र धम्मचक्र की तरह अगले प्रतीक की खोज में घूम गया है।