संघ प्रमुख मोहन भागवत की अमेरिका और कनाडा यात्रा के समर्थन और विरोध के हंगामे को देखें तो यह लगेगा कि वहां वे जिन बातों को उठा रहे हैं उन पर भी चर्चा हो रही है। अपने काबिल टीवी डिबेट वालों द्वारा भागवत बनाम जोहरान ममदानी का मुद्दा तलाशने और उसमें भागवत की जीत का परचम लहराने जैसी बात को छोड़ दें तो इस यात्रा और वहाँ कही बातों की कोई खास चर्चा यहां नहीं है। यहां से मतलब खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीजेपी, संघ परिवार या राजनैतिक हलका से है।
संघ के अंदर क्या चर्चा होती है वह आम तौर पर वैसे भी सुनाई नहीं देता लेकिन इधर संघ भी ऐसा हो गया है जिसके लोग संघ प्रमुख की बातों पर टिप्पणी करने से परहेज नहीं करते- काम या करनी से संघ प्रमुख की बातों को नजरअंदाज करना तो आम ही है। पिछले दिनों जब जंतर मंतर आंदोलन के बाद अचानक संघ प्रमुख जेन-जी से चर्चा करने पहुंचे और कई बातें संघ के पुराने नज़रिए से अलग कही तो संघ के ही एक लिमये नामक पदाधिकारी ने बाजाप्ता खिलाफ टिप्पणी भी कर दी। मजे की बात यह है कि ऐसी अनुशासनहीनता के बाद भी वे सज्जन संघ का पदाधिकारी बने हुए हैं। एक पूर्व पदाधिकारी ने तो जेन-जी को गोली से उड़ाने की बात की थी।
RSS का वजूद संघ प्रमुख से?
जो लोग संघ के कामकाज को लंबे समय से देख-जान रहे हैं उनके लिए यह स्थिति अकल्पनीय है क्योंकि संघ असल में एक नेता के सहारे या उसकी अगुआई में चलने वाला संगठन है और उसके ‘काबिल’ नेताओं ने ही संघ को यहां तक पहुंचाया है। गुरु गोलवलकर से लेकर देवरस तक की नेतृत्व क्षमताओं के किस्से भरे हुए हैं और इन्हीं लोगों ने हाल तक हाशिये की एक विचारधारा को मुख्य धारा बना दिया और संघ परिवार सत्ता पर कब्जा समेत हिंदुस्तान के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करने की स्थिति में आ गया है।
विचारधारा न हो, यह कहना तो गलत होगा लेकिन बहुत साफ विचारधारा संघ ने नहीं रखी- स्थितियों के अनुरूप संघ प्रमुख ने जो दिशा अपनाई, संघ के सारे लोगों ने उसके अनुरूप काम किया है। कभी राष्ट्र ऊपर रहा तो कभी हिन्दुत्व। इसका सबसे बड़ा और साफ उदाहरण गुरु गोलवलकर की किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ का हर नए संस्करण में बदलाव है। इसके पहले संस्करण में ऐसी अनेक बातें हैं जिन्हें आज संघ ही नहीं सामान्य बुद्धि का कोई आदमी आगे नहीं कर सकता। चितपावन ब्राह्मण पुरुषों के सहारे देश का नस्ल सुधारना जैसी बातें इसमें शामिल हैं।
इसलिए जब भी किताब का नया संस्करण छपता है तो कुछ चीजें छुपानी पड़ती हैं। और भारतीय संविधान, तिरंगा फहराने से लेकर आरक्षण तक के सवाल पर संघ और संघ परिवार ने हमारे देखते कितनी लाइन बदली है, यह गिनवाना बहुत बड़ा हो जाएगा।
क्या संघ के नेता के कहे का विरोध हुआ?
लेकिन संघ का अनुशासन और उसके कार्यकर्त्ताओं की अपने नेता के प्रति निष्ठा ऐसी रही है कि वह जो कुछ कहें या जिस बदलाव को उचित मानें उसे अपनाने में अंदर से कभी विरोध नहीं हुआ है। यह स्थिति लगातार रही है। चालाक स्वयंसेवक वाजपेयी हों या भाजपा संगठन दमदार बनाने वाले आडवाणी, उन्होंने भी कभी संघी अनुशासन की खुली अवहेलना नहीं की। आर्थिक नीतियों या शासन की जरूरतों के लिए अगर कुछ अलग लाइन लेनी पड़ी हो तो संघ भी आँख मूँद लिया करता था। संघ के स्वदेशी और अटल सरकार के भूमंडलीकरण अभियान के संदर्भ में यह बात ज्यादा साफ दिखाई देती है। लेकिन एक परदादारी रही। भारतीय मजदूर संघ के ठेंगड़ी जी ने संगठन को सबसे बड़ा बना लिया, लेकिन सिद्धांतों को उठाकर संघ परिवार में ही हाशिए पर आ गए। विद्यार्थी परिषद सबसे बड़ा छात्र संगठन बन गई, लेकिन आंदोलन करना भूल गई।पर मोदी युग या गुजरात दंगों के बाद के समय में संघ और भाजपा के रिश्ते अलग स्तर पर आये और एक बार यह भ्रम भी बना कि संघ भाजपा को सबक सिखाने के लिए कांग्रेस तक को समर्थन देने तक गया। लेकिन आज स्थिति एकदम अलग है और कई बार की बदलाव की चर्चा के बाद भी मोहन भागवत संघ प्रमुख बने हुए हैं और अपनी तरफ से नई स्थितियों में संघ को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।
मुद्दों पर संघ की स्थिति
इसमें एक बार आरक्षण के मुद्दे पर जुबान फिसलने के मामले को छोड़ दें तो वे हिन्दू-मुसलमान सवाल, दलितों की स्थिति, औरतों की स्थिति और जेन-जी अर्थात नई पीढ़ी के बरक्श संघ की स्थिति में बदलाव लाने की कोशिश भी कर रहे हैं-संघ का विस्तार भी हुआ है। उसमें बीजेपी के सत्ता में आने से लाभ भी हुआ है। खुद को संघ का बताकर बड़े पद पाने वाले कैरियरिष्ट लोगों का रेला उमड़ पड़ा है। हर मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष क्यों खोजें और हिंदुस्तान में रहने वाला हर आदमी बराबर से लेकर आज विविधता में एकता (कनाडा का भाषण) और मुसलमानों को बाहर करने की बात करने वाले के हिन्दू न होने तक के बयान उनकी सोच के बदलाव को बताते हैं। और आम तौर पर इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
संघ बनाम बीजेपी
लेकिन जहां संघ प्रमुख दुनिया और देश की नई जरूरतों के लिए अपने और संघ के विचारों और कार्यपद्धति में बदलाव की बात सोच ले रहे हैं वहीं वे अपनी बातों पर अमल के मामले में संघ, बीजेपी और संघ परिवार की तरफ़ से की जा रही मनमानी और अनदेखी को नहीं देख पा रहे हैं तो यह उनके नेतृत्व पर सवाल उठाता है। आखिर यह बात कुछ छुपी नहीं रह गई है कि बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष नड्डा ने सीधे कह ही दिया कि अब बीजेपी को चुनाव में संघ की मदद की ज़रूरत नहीं रह गई। और बहुत अंदरूनी तथा सार्वजनिक चर्चा के बाद जब बीजेपी ने नया अध्यक्ष चुना तो उसे संघ को चिढ़ाने वाला ही माना गया।
उनके बयान पर संघ के लोग कैसा दलित और महिला प्रेम दिखा रहे हैं, कैसा मुसलमान प्रेम दिखा रहे हैं यह प्रमाणपत्र दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों से लेना ज्यादा उपयोगी होगा। कई बार ऐसा लगता है कि संघ प्रमुख को बीजेपी और उसकी सरकारों के अंदर ही नहीं, खुद संघ के अंदर और उसके पदाधिकारियों तक के अंदर चल रही चर्चाओं का पता नहीं होता। कई संगठन ऐसे चल रहे हैं जो उनके द्वारा घोषित बातों से ठीक उल्टा आचरण करते हैं। इसलिए संघ प्रमुख को देश और दुनिया के सामने बात रखने के पहले अपने संगठन, समर्थकों और अपनी मदद से बनी सरकार को अपनी बातें सुनानी चाहिए।