चुनाव घोषणा से ठीक पहले बिहार की डेढ़ करोड़ महिलाओं के खाते में दस-दस हजार रुपए भेजने को इस बार के अपूर्व जनादेश का बड़ा कारण माना जा रहा है। ऐसा फैसला करने वाले भी यही मानकर इस योजना को ले आए और बाद में यह सफाई भी दी गई कि यह धन वापस नहीं करना और और अगर इससे शुरू हुआ धंधा ठीक लगा तो दो लाख रुपए तक की राशि और उपलब्ध कराई जाएगी। विपक्ष इसे सीधे सीधे मतदाताओं को घूस देना बता रहा है और संभवत: कई दर्जन मामले अदालतों में पहुँच भी चुके हैं। 

जब विपक्षी महागठबंधन को इस कदम के असर का अंदाजा होना शुरू हुआ तो तेजस्वी यादव ने अपनी सरकार बनाने पर अगले 14 जनवरी को हर महिला के खाते में तीस-तीस हजार अर्थात महिला सम्मान राशि को बढ़ाकर ढाई हजार करने और साल भर का पैसा एक साथ देने की घोषणा की। उन्होंने हर परिवार में एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने जैसा असंभव वायदा भी किया पर कोई फायदा नहीं हुआ। नीतीश सरकार ने ऐसी तत्काल लाभकारी दर्जन भर योजनाओं में राशि बढ़ाकर पहले से ही एक ज्यादा बड़ी जमीन तैयार कर ली थी। बल्कि कई लोग इसे नीतीश कुमार के राजनैतिक स्वभाव से अलग मानते हुए इसके लिए मोदी और शाह अर्थात भाजपा को श्रेय देते हैं। वैसे भी डबल इंजन की सरकार चल ही रही है।

अब भले इस बदलाव का श्रेय अकेले नरेंद्र मोदी और भाजपा को न दिया जाए लेकिन ‘डायरेक्ट बेनीफिट’ योजनाओं का चलन ब्राजील और अर्जेन्टीना की देखादेखी सारी दुनिया में बढ़ा है और अपने यहां यूपीए सरकार के समय ही इसकी शुरुआत हुई। पहले वृद्धावस्था पेंशन और विधवा पेंशन जैसी योजनाएं आईं और फिर अचानक सबको बहनों/माताओं से प्यार उमड़ा। मध्य प्रदेश इस मामले में आगे हुआ और उसके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो खुद को मामा कहलाकर खुश होने वाले संभवत: पहले नेता होंगे। 
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चुनाव में महिलाओं का इस्तेमाल!

धीरे धीरे हर राज्य के चुनाव में महिलाओं को सीधे नकद देने वाली योजनाओं और वायदों की लाइन लग गई। बल्कि स्थिति यह हो गई कि कई जगह सरकार बन जाने पर भी वायदे पूरे करने में दिक्कत होने लगी क्योंकि वित्तीय संसाधन जबाब देने लगे। महाराष्ट्र का उदाहरण सबसे बड़ा है जबकि कर्नाटक में भी कुछ समय तक ऐसा हुआ था। निस्संदेह ग्रामीण और गरीब महिलाओं के खाते में धन देना काफी लाभदायक रहा है-चुनाव की दृष्टि से भी। पर यह सवाल बड़ा है कि महिलाओं की यह स्थिति बनी कैसे। इसके लिए जो आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारण हैं उनको दुरुस्त करने में नेताओं, पार्टियों और सरकारों की रुचि क्यों नहीं है। ईश्वरचंद विद्यासागर, गांधी, लोहिया और जयप्रकाश सरीखे नेताओं ने औरतों की स्थिति बदलने में सफलता पाई जबकि उनके पास न सत्ता थी न संसाधन।

इस चुनाव में एनडीए को अपूर्व जीत दिलाने वाले नीतीश कुमार के भक्त मानते हैं कि यह दस हजारी योजना या चुनाव पूर्व की रेवड़ियों में उनकी बहुत आस्था हो न हो गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के विचारों और कार्यक्रमों में उनकी बहुत आस्था है। इसी चलते उन्होंने 2005 में सत्ता हाथ में आने के बाद से ही लड़कियों और औरतों के लिए एक पर एक बड़े कार्यक्रम शुरू किए थे। इसलिए उनको सिर्फ इस बार के चुनाव जिताऊ और एक हद तक अनैतिक फैसलों से नहीं जोड़ना चाहिए। 

जब वे सत्ता में आये थे तब बिहार में स्कूल से बाहर रह गए बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा थी। सत्ता में आते ही उन्होंने मदन मोहन झा जैसे जूनूनी अधिकारी और शांता सिन्हा के एनजीओ की सहायता से जो बिहार शिक्षा परियोजना शुरू की उसमें हर टोले में लड़कियों को पढ़ाना शुरू हुआ और फिर स्कूलों में दाखिले का अभियान चला। इस क्रम में बिहार में निरक्षरों की संख्या तो लगभग समाप्त हो गई और स्कूली बच्चों की संख्या पौने तीन करोड़ तक पहुँच गई। दोपहर का भोजन योजना चलाने में भी दिक्कत आई पर अंतत: यह सब बच्चों को खाना देने और करीब दो लाख ग्रामीण महिलाओं को रसोइया का काम दिलाने वाला साबित हुआ।

नीतीश कुमार की ज्यादा चर्चित मुख्यमंत्री साइकिल और वर्दी योजना हुई और इसे क्रांति जैसा माना गया। फिर उन्होंने पंचायतों में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया जिससे बिहार की पंचायतों में औरत प्रमुखों का अनुपात पचास फीसदी से ज्यादा हो गया।

और फिर इसी क्रम में उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में महिलाओं से किया यह वायदा भी पूरा कर दिया कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी रहेगी। तभी महिलाओं की चुनावी भागीदारी बढ़ने लगी और पहली बार वोट देने वाली महिलाओं का अनुपात पुरुषों से ऊपर हुआ। इस क्रम में नरेंद्र मोदी का चुनाव भागीदार बनने का लाभ भी हुआ जो बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ जैसे नारे के साथ शौचालय निर्माण और रसोई गैस के सिलेंडर बांटने जैसे प्रयोग करने लगे थे। लोहिया के एक अन्य शिष्य रघुवंश प्रसाद सिंह ने ग्रामीण विकास मंत्री होने के बाद ऐसी योजनाओं की पहल की जिनकी लोहिया के भाषणों में प्रमुखता थी। मोदी जी के पहले तक बीजेपी को दंगा-फसाद की पार्टी मानकर एक फीसदी कम महिलाएँ वोट देती थीं। अब भाजपा और एनडीए को ज्यादा वोट मिलने लगा है।
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महिला शिक्षा का हाल

पर जिस मौके पर आकार लड़कियों की पढ़ाई, लोकतान्त्रिक भागीदारी बढ़ाने और कुछ मदद से उनके आगे आने की शुरुआत होनी चाहिए थी वह प्रगति रुक गई है। लंबे नीतीश राज में बिहार में उच्चतर शिक्षा व्यवस्था चौपट हुई है। अच्छे घरों की लड़कियां तो दिल्ली, पुणे और कर्नाटक पहुंचकर पढ़ाई कर लेती हैं पर गरीब लड़कियों के लिए सिपाही भर्ती के अलावा कम ही विकल्प होते हैं। और जदयू समेत किसी भी दल ने महिला नेतृत्व को बढ़ावा नहीं दिया है। सुषमा स्वराज और सुमित्रा महाजन के बाद भाजपा को भी कोई ढंग की महिला नेता नहीं मिली है और वसुंधरा राजे केन्द्रीय नेतृत्व को पसंद नहीं आतीं। 

बिहार में बीस साल में एक भी ढंग की महिला नेता को आगे आने का अवसर नहीं दिया गया। यहां बार बार गांधी याद आते हैं जिनको चंपारण पहुँचने पर महिलाओं के बीच काम करने में दिक्कत हुई तो कस्तूरबा के अलावा कोई न मिला। विज्ञापन देकर दो तीन महिलाओं को बुलाया गया और सहयोगी लोगों की पत्नियों को जिम्मा देकर आगे किया गया। लेकिन मात्र तेरह साल बाद जब गांधी ने नमक सत्याग्रह किया तो जेल जाने वाली औरतों की संख्या पच्चीस हजार थी। इतनी महिलाएँ आज तक किसी क्रांति, किसी आंदोलन में जेल नहीं गई हैं। बयालीस में तो कमलदेवी, अरुणा आसफ अली, उषा मेहता और सुचेता कृपलानी जैसी लड़कियों ने नेतृत्व ही किया। नोआखाली में गांधी का साथ ज्यादा महिलाओं ने दिया। इसलिए बिहार और नीतीश कुमार की महिला क्रांति पर यह शक होता है कि यह महिलाओं को आगे बढ़ा रही है या सिर्फ उनके वोट का इंतजाम है।