अमेरिका के USCIRF कमिश्नर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और RAW पर टारगेटेड सैंक्शन्स की सिफारिश की है– एसेट फ्रीज, अमेरिका एंट्री बैन! लेकिन मोदी सरकार ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह ‘भेदभावपूर्ण’ बताते हुए तरह खारिज कर दिया है। यह सच्चा यह है कि देश में मोदी सरकार के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़े हैं। इन पर निगरानी रखने और इन्हें रोकने के लिए बनाए गए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को पूरी तरह पंगु बना दिया गया है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) की रिपोर्ट संसद में पेश नहीं की जा रही है। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी सरकार की लापरवाही पर सवाल उठाया! क्या ये दोहरा मापदंड नहीं? विदेशी रिपोर्ट ठुकराओ, लेकिन अपनी अल्पसंख्यक संस्था को अंधेरे में रखो?
कहां है 'सबका साथ, सबका विकास?'
2014 में नरेंद्र मोदी 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा देकर सत्ता में आए। 2019 में उन्होंने इसमें 'सबका प्रयास, सबका विश्वास’ जोड़ दिया। इस नारे को मोदी सरकार की पहचान बनाने की हर मुमकिन कोशिश की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर भाषण में इसे दोहराते हैं, दावा करते हैं कि उनका शासन समावेशी है, कोई भी वर्ग पीछे नहीं छूटेगा। लेकिन जब बात राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) की वार्षिक रिपोर्टों की आती है, तो यह नारा खोखला साबित होता है। 2014 से अब तक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की एक भी वार्षिक रिपोर्ट संसद में पेश नहीं की गई। यह राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा 13 का सीधा उल्लंघन है। यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि आयोग की रिपोर्ट, उसमें दी गई सिफारिशों पर सरकार की कार्रवाई का मेमोरेंडम और अस्वीकृति के कारण- सब कुछ संसद के दोनों सदनों में रखा जाना चाहिए।
लापरवाही या अल्पसंख्यकों की अनदेखी
यह सिर्फ़ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि धार्मिक अल्पसंख्यकों मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, और पारसियों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति पूरी तरह से उदासीनता है। अत्याचारों की शिकायतें, हिंसा, पुलिस अत्याचार, सामाजिक बहिष्कार– इन सब पर NCM स्वतः संज्ञान लेता है, लेकिन रिपोर्ट सार्वजनिक न होने से न तो संसद बहस कर पाती है, न जनता को पता चलता है कि सरकार क्या कर रही है। ‘सबका साथ’ का दावा इसी बिंदु पर धराशायी हो जाता है। मोदी सरकार ने अल्पसंख्यक कल्याण की स्कीमों (PMJVK, छात्रवृत्ति) का तो खूब ढिंढोरा पीटा, लेकिन संस्थागत सुरक्षा और जवाबदेही को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। यह कटघरा है – जहां सरकार खुद खड़ी है।
कानूनी बाध्यता और उसका उल्लंघन
NCM अधिनियम की धारा 12 के तहत आयोग हर साल अपनी रिपोर्ट तैयार करता है और अल्पसंख्यक मंत्रालय को सौंपता है। धारा 13 स्पष्ट आदेश देती है – रिपोर्ट संसद में रखो, सिफारिशों पर एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) दो, जो सिफारिशें मान ली गईं और जो खारिज हुईं, उनका कारण बताओ। 2010-11 तक यह प्रक्रिया चलती रही। लेकिन 2014 के बाद? शून्य।
मंत्रालय पहुंचती है रिपोर्ट, तो संसद में क्यों नहीं?
अल्पसंख्यक मंत्रालय ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट 2021-22 और 2020-21 में लिखा है कि NCM ने 2020-21 तक की रिपोर्टें सौंपी हैं, लेकिन इसमें संसद में रखने का जिक्र तक नहीं। 15 दिसंबर 2025 को राज्यसभा में अनस्टार्ड प्रश्न संख्या 1725 का जवाब और भी चौंकाने वाला था– मंत्रालय ने स्वीकार किया कि 2014 के बाद कोई रिपोर्ट संसद में नहीं रखी गई। RTI जवाबों से पता चलता है कि 2015-16 से 2024-25 तक NCM ने कुल 1495 सिफारिशें केंद्र सरकार को भेजीं। साल-वार: 2015-16 में 127, 2017-18 में 246, 2022-23 में 226, 2023-24 में 245। हर सिफारिश का जवाब? “विचाराधीन”। कोई कार्रवाई नहीं, कोई खारिजी नहीं, कोई ATR नहीं। NCM की वेबसाइट पर भी सिर्फ 2010-11 तक की रिपोर्ट और ATR उपलब्ध हैं। 12 साल से ज्यादा समय तक कानूनी प्रक्रिया ठप!यह उदासीनता सिर्फ कागजी नहीं
अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के मामलों में NCM स्वतः संज्ञान लेता है – गिरजाघरों पर हमले, लिंचिंग, पुलिस कस्टडी में मौत, संपत्ति अतिक्रमण। लेकिन रिपोर्ट न पेश होने से कोई संसदीय बहस नहीं, कोई जवाबदेही नहीं। ‘सबका विकास’ का नारा तब अर्थहीन हो जाता है जब अल्पसंख्यक विकास की बजाय सुरक्षा की मांग करते हैं और सरकार संस्थागत तंत्र को ही बेकार कर देती है।
सिफारिशों में क्या, कैसे पता चले?
1,495 सिफारिशें – इनमें क्या था? अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में पुलिस अत्याचार रोकने के उपाय, कम्यूनल वायलेंस कानून का सख्ती से अमल, स्कूलों में अल्पसंख्यक बच्चों की सुरक्षा, धार्मिक स्थलों की रक्षा। हर साल सैकड़ों शिकायतें आती हैं, NCM जांच करता है, सिफारिश भेजता है। लेकिन मोदी सरकार का जवाब हमेशा एक: “अल्पसंख्यक मंत्रालय में विचाराधीन”। 2015-16 से लेकर 2024-25 तक कोई भी सिफारिश लागू हुई या ख़ारिज हुई – इसका कोई आंकड़ा नहीं। कोई मेमोरेंडम नहीं। यह ‘सबका साथ’ नहीं, बल्कि ‘अल्पसंख्यकों को नज़रअंदाज़’ है। पूर्ववर्ती सरकारों (यूपीए) में भी देरी होती थी, लेकिन रिपोर्टें पेश होती थीं, ATR आता था। मोदी काल में तो पूरी प्रक्रिया ही समाप्त कर दी गई है। आयोग खुद अक्सर अध्यक्ष-विहीन रहा– 2020 में पांच पद खाली, 2025 में भी लंबे समय तक रिक्तियां। जब आयोग ही कमजोर, तो अत्याचार कैसे रोके जाएंगे?
‘सबका विकास’ बनाम वास्तविकता: अत्याचारों की अनदेखी
मोदी सरकार दावा करती है कि PMJVK, नई मंजिल, स्कॉलरशिप जैसी स्कीमों से अल्पसंख्यक विकास हो रहा है। आंकड़े दिखाए जाते हैं– करोड़ों रुपये खर्च, लाखों लाभार्थी। लेकिन सवाल है – विकास बिना सुरक्षा के? जब NCM की रिपोर्टें ही संसद तक नहीं पहुंचतीं, तो अत्याचारों पर कोई राष्ट्रीय चर्चा नहीं होती।
उदाहरण के तौर पर ईसाई पादरियों पर हमले, मुस्लिम युवकों पर लिंचिंग के आरोप, सिखों की बेदखली, दलित-अल्पसंख्यक संयुक्त मामलों में पुलिस पक्षपात। NCM इन पर स्वतः संज्ञान लेता है, राज्य सरकारों को नोटिस भेजता है, मुआवज़े की सिफारिश करता है। लेकिन रिपोर्ट न होने से केंद्र स्तर पर कोई फॉलो-अप नहीं। NHRC भी सैकड़ों केस देखता है, लेकिन NCM का विशेष फोकस अल्पसंख्यकों पर है। फिर भी, 12 साल से रिपोर्ट ठप – इसका मतलब है कि संसद, विपक्ष, मीडिया, जनता सब अंधेरे में हैं।
मज़ाक है 'सबका विश्वास' का नारा!
‘सबका विश्वास’ का नारा तब मजाक बन जाता है जब अल्पसंख्यक समुदाय कहते हैं कि उनकी शिकायतें कागजों में दब गई हैं। RTI से पता चला कि 2020-2025 में NCM को 9,824 शिकायतें मिलीं, 8,586 निपटाई गईं, लेकिन सिफारिशें कहां गईं? विचाराधीन। यह संवेदनहीनता है – जहां सरकार स्कीमों का प्रचार करती है, लेकिन मूल समस्या (अत्याचार और सुरक्षा) को संस्थागत रूप से दबा देती है।
राजनीतिक मंशा
2014 से पहले NCM रिपोर्टें नियमित पेश होती थीं। संसद में बहस होती थी, सिफारिशें अमल में आती थीं या कारण बताए जाते थे। मोदी सरकार ने इसे पूरी तरह बंद कर दिया। क्यों? क्योंकि रिपोर्टें अत्याचारों की सच्चाई उजागर करतीं – चाहे वह दादरी, हाथरस, दिल्ली दंगे या हालिया घटनाएं। रिपोर्ट पेश होने पर विपक्ष सवाल पूछता, मीडिया छापता, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रभावित होती। सरकार ने आसान रास्ता चुना – रिपोर्ट ही मत पेश करो।यह ‘सबका साथ’ नहीं, बल्कि बहुसंख्यकवाद की छाया है। जहां अल्पसंख्यक विकास के नाम पर स्कीमें चलती हैं, लेकिन उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक संस्था को कमजोर कर दिया जाता है। NCM की सिफारिशें अक्सर राज्य सरकारों को भी भेजी जाती हैं, लेकिन केंद्र की उदासीनता से राज्य भी ढीले पड़ जाते हैं। परिणाम? अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है, विकास के दावे खोखले लगते हैं।
कटघरे में मोदी सरकार
‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा अल्पसंख्यक अत्याचारों के मुद्दे पर पूरी तरह फेल हो चुका है। 2014 से 2026 तक NCM की कोई रिपोर्ट संसद में नहीं, 1,495 सिफारिशें विचाराधीन, कानून का उल्लंघन, आयोग अक्सर लंगड़ा – यह सब मोदी सरकार की संवेदनहीनता का प्रमाण है। सरकार अगर सच में समावेशी होती, तो रिपोर्टें पेश करती, ATR देती, सिफारिशें लागू करती। लेकिन किया क्या? चुप्पी और ‘विचाराधीन’ का खेल।
यह सिर्फ NCM का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे शासन की मानसिकता है – जहां अल्पसंख्यक दिखावे की स्कीमों तक सीमित हैं, लेकिन उनकी आवाज़ दबा दी जाती है। संसद को जवाबदेह बनाने का दावा करने वाली सरकार ने खुद अपने कानून को ठुकराया। अल्पसंख्यक समुदाय पूछते हैं – हमारा साथ कब? हमारा विकास कब? विश्वास तो टूट चुका है।
मोदी सरकार आज कटघरे में खड़ी है। अगर ‘सबका साथ’ सच्चा है, तो तो सरकार तुरंत NCM की पिछले 12 सलों की रिपोर्टें एक्शन टेकनरपोर्ट के साथ संसद में पेश करे। सिफारिशों पर क्या कार्रवाई की, ये बताए, अत्याचारों पर जवाबदेही तय करे। वरना यह नारा सिर्फ चुनावी जुमला साबित होगा। अल्पसंख्यक भारत के नागरिक हैं – उन्हें सिर्फ स्कीम नहीं, सुरक्षा और सम्मान चाहिए। मोदी सरकार को अब चुप्पी तोड़नी होगी, वरना इतिहास इसे संवेदनहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण कहेगा।