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खुलने लगी मोदी के “गुजरात मॉडल” की पोल!

टेस्टिंग की सुविधाओं में हुए विलम्ब, टेस्टिंग किट्स की कमी, जाँच रिपोर्ट्स में देरी, प्राइवेट प्रयोगशालाओं को कोरोना जाँच से दूर रखने या व्यापक आलोचना के बाद अनुमति देने और इलाज से जुड़े उपकरणों की ख़रीद में हो रहे भ्रष्टाचार को महामारी के अब तक के ज्ञात आँकड़ों के साथ मिलाकर देखें तो यक़ीन करना मुश्किल है कि वास्तविक सच्चाई क्या होनी चाहिए! 
श्रवण गर्ग

गुजरात उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह एक स्व-प्रेरित जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए अपने 143 पृष्ठों के ऑर्डर में तीख़ी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था, ‘राज्य की स्थिति एक डूबते हुए टाइटेनिक जहाज़ और अहमदाबाद स्थित सिविल अस्पताल एक काल कोठरी या उससे भी बदतर है’, तो यक़ीन नहीं हुआ कि यह सब उस प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को लेकर कहा गया है जिसकी अद्भुत विकास की गाथाओं ने वर्ष 2014 में राष्ट्र को उसका नया प्रधानमंत्री दिया था। 

जिस पत्र को याचिका मानकर अदालत ने उक्त टिप्पणी की, उसमें उल्लेख है कि प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में कोरोना मरीज़ों की जान बचाने की ज़िम्मेदारी केवल जूनियर डॉक्टरों के ही हवाले है।

पत्र में यह भी उल्लेख है कि अधिकांश सीनियर डॉक्टर न तो राउंड पर आते हैं और न ही आपातकालीन ज़रूरतों के लिए उपलब्ध हैं। जो डॉक्टर कोरोना मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं, उन्हें संक्रमण से बचने के लिए पीपीई किट्स, एन-95 मास्क्स और दस्ताने उपलब्ध नहीं कराए गए।

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हॉस्टल में रहने वाले सात सौ डॉक्टरों में से दस प्रतिशत की भी टेस्टिंग इसलिए नहीं करवाई गई कि उनमें से कुछ अगर कोरोना पॉज़िटिव पाए गए तो फिर मरीज़ों का इलाज कौन करेगा? राजकोट की पहचान की फ़र्म से वेंटिलेटरों के नाम पर जिन उपकरणों की ख़रीद सरकार द्वारा की गई थी, वह खबर भी इन्हीं दिनों की ही है। 

बताया जाता है कि गुजरात में हुई कुल कोरोना मौतों का पैंतालीस प्रतिशत केवल सिविल अस्पताल की देन है। राज्य के कुल कोरोना पीड़ितों में सत्तर प्रतिशत से ज़्यादा केवल अहमदाबाद से हैं।
मानवीय त्रासदी को भ्रष्टाचार के अमानवीय षड्यंत्र में बदल देने और केवल प्रचार के ज़रिए महामारी के श्रेष्ठ प्रबंधन की झूठी वाहवाही लूटने की कहानियाँ भी प्रवासी मज़दूरों के तलवों से रिसने वाले मवाद की तरह ही अब फूट-फूटकर बाहर आ रही हैं। वह इसलिए कि मामला अब केवल गुजरात तक ही सीमित नहीं रह गया है। 

पीपीई किट घोटाला

इवांका ट्रम्प अगर तेरह वर्षीय बालिका ज्योति कुमारी के अप्रतिम साहस की जानकारी रखती हैं तो फिर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी पता चल गया होगा कि भारत में सत्तारूढ़ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के गृह राज्य हिमाचल प्रदेश में पार्टी के प्रमुख को पीपीई की सरकारी ख़रीद के घोटाले में अपना नाम आने के कारण पद से त्यागपत्र देना पड़ा है। 

किट्स ख़रीद मामले में राज्य के स्वास्थ्य निदेशक की घूस की माँग के चलते पहले ही गिरफ़्तारी हो चुकी है। बताते हैं कि राज्य का चिकित्सा विभाग मुख्यमंत्री के ही पास है।

मध्य प्रदेश में भी यही हाल

गुजरात और हिमाचल ही क्यों? मध्य प्रदेश भी क्यों नहीं? कथित तौर पर राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण पीपीई किट्स की जिस ख़रीद के टेंडर अप्रैल माह में रोक दिए गए थे, वे अब जारी कर दिए गए हैं। मेडिकल तबादलों, मेडिकल ख़रीद और व्यापमं जैसे कांडों के लिए बदनाम हो चुके राज्य में अब कोरोना के इलाज को लेकर आरोप लग रहे हैं। 

सवाल किया जा रहा है कि अगर राज्य में पीपीई किट्स की कोई कमी है ही नहीं तो फिर दो महीनों के लॉकडाउन के बाद अब छह लाख किट्स क्यों ख़रीदी जा रही हैं? 

मध्य प्रदेश के अख़बारों ने भी ‘अब’ छापना शुरू कर दिया है कि कोरोना से होने वाली मौतों को प्रशासन द्वारा किस तरह से छुपाया रहा है और उसके आँकड़ों में कैसे हेरा-फेरी की जा रही है।

हम जानते हैं कि कुछ पुलिस थानों पर अपराधों को केवल इस कारण से दर्ज नहीं किया जाता है कि उससे थानेदार की अपराध-नियंत्रण क्षमता को लेकर सवाल उठने लगेंगे। यही क्रम व्यवस्था में भी फिर ऊपर तक चलता है और उसमें कोरोना भी शामिल हो जाता है। 

गुजरात में सत्तर प्रतिशत लोग पॉजिटिव! 

सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी के अनुसार, गुजरात सरकार ने हाई कोर्ट में हलफ़नामा दिया है कि अगर ज़्यादा लोगों की टेस्टिंग की गई तो आबादी के सत्तर प्रतिशत तक लोग पॉजिटिव पाये जा सकताे हैं और इससे भय का माहौल बन जाएगा। क्या यही आशंका अन्य स्थानों को लेकर नहीं व्यक्त की जा सकती?

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टेस्टिंग की सुविधाओं में हुए विलम्ब, टेस्टिंग किट्स की कमी, जाँच रिपोर्ट्स में देरी, प्राइवेट प्रयोगशालाओं को कोरोना जाँच से दूर रखने या व्यापक आलोचना के बाद अनुमति देने और इलाज से जुड़े उपकरणों की ख़रीद में हो रहे भ्रष्टाचार को महामारी के अब तक के ज्ञात आँकड़ों के साथ मिलाकर देखें तो यक़ीन करना मुश्किल है कि वास्तविक सच्चाई क्या होनी चाहिए! 

कहीं ऐसा तो नहीं कि राज्यों की जिन हुकूमतों के कोरोना प्रबंधन पर प्रधानमंत्री को सबसे ज़्यादा भरोसा होना चाहिए था, वे ही उन्हें अंधेरे में रख रही हैं! ऐसा है तो मान लिया जाना चाहिए कि अपनी चिकित्सा और भविष्य को लेकर नागरिकों का भी पूरी तरह से आश्वस्त होना अभी बाक़ी है। नागरिक अब संदेहों के लॉकडाउन में क़ैद नहीं होना चाहेंगे।

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