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महात्मा गाँधी की मजबूती, मोदी की मज़बूरी

यह समझना ज़रूरी है कि गोडसे ने बापू की हत्या किसी आवेश में नहीं, ठंडे दिमाग से, साज़िश रच कर की थी। साज़िश रचने वाली मानसिकता असल में भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध हिंदू राष्ट्रवाद या हिंदुत्व को स्थापित करने वाली मानसिकता थी। यह मानसिकता हमारे समाज में लगातार बनी रही है और मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, ज़ाहिर है कि इसके हौसले और भी बुलंद हुए हैं। इसीलिए तो साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का बयान आते ही सीधे या घुमा-फिरा कर उसका समर्थन करने वाले बयानों की झड़ी लग गयी।
पुरुषोत्तम अग्रवाल

भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर मोदीजी की प्रतिक्रिया ने उनके आलोचकों ही नहीं, समर्थकों और भक्तों तक को चौंका दिया है। प्रज्ञा ठाकुर का बयान आते ही साफ़-साफ़ या घुमा-फिरा कर समर्थन में बयान केवल उन नेताओं के ही नहीं आए, जिनके विरुद्ध कार्रवाई की गयी बल्कि दो प्रोफ़ेसरों ने भी महीन ढंग से प्रज्ञा ठाकुर के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।
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एक प्रोफ़ेसर ने फरमाया कि हम सबमें गाँधी और गोडसे दोनों विद्यमान हैं, दूसरे ने कहा कि हत्या करके तो ठीक नहीं किया, लेकिन अपने ढंग का सच्चा देशभक्त वह (गोडसे) ज़रूर था। प्रोफ़ेसर साहब के मन में गोडसे ज़रूर विद्यमान होगा, लेकिन अपने मन की बात वह दूसरों पर क्यों थोप रहे हैं? अपने ढंग की देशभक्ति का दावा भी हर अपराधी कर ही सकता है। बीजेपी के कुछ नेताओं ने तो खुले तौर पर प्रज्ञा ठाकुर के बहाने गोडसे को जायज ठहरा दिया।

हिंदू राष्ट्रवाद को स्थापित करने की मानसिकता

यह समझना ज़रूरी है कि गोडसे ने बापू की हत्या किसी आवेश में नहीं, ठंडे दिमाग से, साज़िश रच कर की थी। साज़िश रचने वाली मानसिकता असल में भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध हिंदू राष्ट्रवाद या हिंदुत्व को स्थापित करने वाली मानसिकता थी। यह मानसिकता हमारे समाज में लगातार बनी रही है और मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, ज़ाहिर है कि इसके हौसले और भी बुलंद हुए हैं। इसीलिए तो साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का बयान आते ही सीधे या घुमा-फिरा कर समर्थन करने वाले बयानों की झड़ी लग गयी। लेकिन दूसरी तरफ़ केवल राजनैतिक दलों और सिविल सोसायटी में ही नहीं, कॉरपोरेट जगत में भी बेचैनी देखी गयी। आनंद महिन्द्रा ने तो ट्विटर पर साफ़ लिख दिया कि महात्मा गाँधी की पावन स्मृति का अपमान हमें तालिबान बनाकर छोड़ेगा।
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एक तरफ़ यह, दूसरी तरफ़ बंगाल में विद्यासागर की प्रतिमा पर राष्ट्रवादी जोश का उतरना, ये दोनों चीजें चुनावी माहौल में कुछ ज़्यादा ही भारी पड़ सकती हैं। इसीलिए प्रधानमंत्रीजी तिलमिलाए और उनके तिलमिलाने से भक्तगण सकपकाए। आईटी सेल के कर्ता-धर्ता के वे ट्वीट्स गायब हो गये जिनमें गोडसे का अध्ययन करने की सलाह दी जा रही थी, हत्या के पक्ष में केस लॉ याद दिलाये जा रहे थे।

मोदी सरकार के मंत्रीजी कहने लगे कि उनका हैंडल फिर से हैक हो गया था। मीडिया में विराजमान भक्तगण गद्-गद् होने की कोशिश करने लगे, यह भूल कर कि प्रधानमंत्रीजी को ऐसे बयानों से अगर सचमुच घिन आती होती तो वे उन लोगों को ट्विटर पर फ़ॉलो करने से बचते जिनके यहाँ ऐसी गंद भरी पड़ी है।

प्रज्ञा ठाकुर को सोच-समझ कर टिकट दिया गया था, वह भी यह जाँचने के लिए कि हिंदुत्व की स्वीकृति समाज में किस हद तक हो चुकी है। इसलिए उनके ख़िलाफ़ किसी गंभीर कार्रवाई की तो बात ही मत सोचिए।
बस इतना है कि प्रज्ञा ठाकुर को डाँट पड़ गयी, उन्होंने गाँधीजी के प्रति सम्मान जताने का नाटक कर दिया और बात ख़त्म हो गई। अब उनकी हार या जीत तय करेगी कि भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध हिंदुत्व किस हद तक कामयाबी पा सका है। चौदह साल पहले मैंने एक व्याख्यान दिया था, जिसमें कुछ लोगों द्वारा फैलाई गयी बेतुकी बात “मज़बूरी का नाम महात्मा गाँधी” के बरक्स बल देकर कहा गया था कि मज़बूरी का नहीं, “मजबूती का नाम महात्मा गाँधी।” यही मजबूती मोदी की मज़बूरी बन गयी कि प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर घिन आने का बयान दें, उन्हें मन से कभी माफ़ न कर पाने का दावा करें। मेरा बूथ सबसे मजबूत हो या न हो, गाँधीजी की तरफ़ से कहा जा सकता है, “मेरा भूत अब भी मजबूत।”
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