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'जो पैर धो रहा है, वह प्रपंच रच रहा है'

हम तुम्हें देवता बना देंगे,
पर, मनुष्य के अधिकार नहीं देंगे।

मेरी पहली प्रतिक्रिया उन तसवीरों को देखकर यही है, जिनमें प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी इलाहाबाद के कुम्भ में 5 सफ़ाई कर्मचारियों के पैर धो रहे रहे हैं। मेरा सवाल है कि मोदी जी ने 5 ही सफ़ाई कर्मियों के क्यों पैर धोए? अपनी पूरी कैबिनेट को वहाँ लेकर जाते, और वहाँ कार्यरत सभी सफ़ाई कर्मचारियों के पैर धुलवाते। हिन्दू संस्कृति में चरण पखारने के बाद चरणामृत का पान करने की भी प्रथा है। मोदी ने सफ़ाई कर्मचारियों के पैर धोने के बाद उस पानी को पिया क्यों नहीं? उन्होंने हिन्दू संस्कृति की इस मूल प्रथा को क्यों तोड़ दिया? 

एक सवाल यह भी है कि कुछ दिन पहले उसी कुम्भ में एक साधु ने सिर्फ़ बाल्टी छू जाने के कारण एक सफ़ाई कर्मी का हाथ तोड़ दिया था। उस साधु की ग़िरफ़्तारी तक नहीं हुई। मोदी जी उस सफ़ाई कर्मी से जाकर क्यों नहीं मिले? उसका हाथ तोड़ने वाले उस साधु की निंदा क्यों नहीं की?

तीसरा सवाल यह है कि अगर सफ़ाई कर्मियों के प्रति मोदी में इतनी इज़्ज़त है, तो कुम्भ में कार्यरत सफ़ाई कर्मियों के हक़ की आवाज़ उठाने वाले नेताओं को उनकी योगी सरकार ने ग़िरफ़्तार क्यों कराया? एक कवि और सामाजिक कार्यकर्ता अंशु मालवीय भी सफ़ाई कर्मियों की जायज़ माँगों के समर्थन में आवाज़ उठा रहे थे, उनको भी उठाकर बंद कर दिया गया। क्यों? कुम्भ में सफ़ाई कर्मचारियों को ठेके पर रखा गया है। उनकी दिहाड़ी का तीस प्रतिशत हिस्सा ठेकेदार और मेला अधिकारी की जेब में जाता है। वे इसी के ख़िलाफ़ आन्दोलन चला रहे थे। पर बीजेपी चाहती है कि वे सिर्फ़ उनकी व्यवस्था के अनुसार ही कुम्भ का मलमूत्र साफ़ करने का काम करें, और हक़ की बात न करें। वे अगर न्यूनतम वेतन और आवश्यक सुविधाओं की माँग करेंगे तो जेल भेज देंगे? यह कैसा दलित प्रेम है मोदी जी, आपका और आपकी सरकार का?

पैर धुलवाने वाल नादान

वास्तव में जो पैर धो रहा है, वह प्रपंच रच रहा है, और जो पैर धुलवा रहा है, वह नादान, नासमझ, अशिक्षित और अज्ञानी है, जो उसके राजनीतिक शास्त्र के बारे में कुछ नहीं जानता है, और न जानने की क्षमता रखता है। इसलिए, बकौल मीडिया, जब पैर धुलने के बाद सफ़ाई कर्मियों से पूछा गया कि कैसा लगा, तो उनका जवाब था, कि उनके लिए तो यह सपना था कि प्रधानमंत्री उनके पैर धो रहे हैं, वे बहुत ख़ुश हैं और अब वे अपना वोट बीजेपी को ही देंगे। मेरी दृष्टि में इस पूरे राजनीतिक ड्रामे का यही निहितार्थ है। 

मोदी जी ने एक तीर से दो निशाने लगा लिए-- सफ़ाई कर्मियों का वोट भी पक्का कर लिया, और उनकी समस्याओं से उनका ध्यान हटाने में सफल भी वह हो गए।
किन्तु, यह ड्रामा बीजेपी के लिए मृग-मरीचिका ही साबित होगा। वाल्मीकि समुदाय के बुद्धिजीवी नागरिक इसे असंवैधानिक और मानवीय गरिमा के विरुद्ध मान रहे हैं। सफ़ाई कर्मचारी आन्दोलन के संयोजक मेग्सेसे पुरस्कार विजेता बैजवाडा विल्सन का कहना है कि संविधान में सब को समान अधिकार प्राप्त है। इस दृष्टि से मोदी जी को सफ़ाई कर्मचारियों से हाथ मिलाना चाहिए था। पैर धोने का सन्देश साफ़ है कि दोनों समान नागरिक नहीं हैं। पैर धोने वाला अपने आप को उच्च और महान नागरिक समझ रहा है, और सफ़ाई कर्मियों को वह नीच समझ रहा है।
  • अनेक बुद्धिजीवियों का कहना है कि सफ़ाई कर्मियों के पैर धोने का यह ड्रामा उनको झाड़ू-टोकरी में ही फँसाए रखने का प्रपंच है। वे यह भी कहते हैं कि इलेक्शन से पहले का यह ड्रामा सफ़ाई कर्मचारियों का वोट लेने की कवायद के सिवा कुछ नहीं है। उनके अनुसार बीजेपी सरकार दलित हितैषी नहीं है। इसके पक्ष में उनके तर्क वाजिब हैं। उदाहरण के लिए क्या गटर में मरने वालों के घर गए थे मोदी? क्या गटर के सफ़ीई कर्मियों के लिए आवश्यक उपकरण दिए जाने की व्यवस्था की गई? क्या ठेका प्रथा ख़त्म की गई, जिसकी माँग सफ़ाई कर्मचारी सालों से कर रहे हैं, और जो उनको ग़रीब बनाए रखने की सबसे ख़तरनाक साज़िश है?

क्या ब्राह्मणवाद पर चोट है?

मोदी-भक्त कह रहे हैं कि सफ़ाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने ब्राह्मणवाद पर चोट की है। क्या चोट की है? क्या ब्राह्मण पहली से चौथी श्रेणी में आ गया और शूद्र नीचे से ऊपर की श्रेणी में आ गया? मतलब के लिए चंद दलितों के पैर धोने से कोई क्रान्ति नहीं आने वाली है। क्रान्ति आती है व्यवस्था बदलने से। क्या मोदी व्यवस्था बदलकर  ब्राह्मणवाद के विरुद्ध क्रांति करने का साहस करेंगे? वह हरगिज़ नहीं करेंगे, क्योंकि उनके अन्दर के मनुष्य का जन्म ब्राह्मणवाद की भगवा कोठरी से ही हुआ है।

गोदी मीडिया कह रहा है कि नरेंद्र मोदी दलित का पैर धोने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। सच तो यह है कि वह और भी कई कारनामों में पहले प्रधानमंत्री हैं। वह नोट बंदी करने वाले भी पहले प्रधानमंत्री हैं, और अपनी 88 साल की बूढ़ी माँ को बैंक की लाइन में लगाने वाले भी पहले प्रधानमंत्री हैं। वह संसद की चौखट को चूमने वाले भी पहले प्रधानमंत्री हैं और संविधान के विरुद्ध जाकर सवर्णों को आरक्षण देने वाले भी पहले प्रधानमंत्री हैं। वह सत्ता के इस कदर भूखे हैं कि कुछ भी कर सकते हैं।

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कँवल भारती
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