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मोदी और राहुल की नक़ली लड़ाई, असली अभी बाक़ी है

बीजेपी यह बताने की कोशिश कर रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है। भारतीय राजनीति में ऐसी कोशिशें पहले भी हुई हैं। 70 के दशक में कांग्रेसियों का नारा था कि इंदिरा गाँधी का कोई विकल्प नहीं है। 1971 के युद्ध की महाविजेता और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे साहसी आर्थिक सुधारों की हीरो इंदिरा गाँधी को भी 1977 में मतदाताओं ने धूल चटा दी।
शैलेश

भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से एक छद्म या नक़ली युद्ध लड़ रहे हैं? मोदी उनके भक्त समर्थक और पार्टी के लोग यह साबित करने में लगे हैं कि 2019 का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गाँधी है और आम मतदाताओं को समझाने की कोशिश की जा रही है कि राहुल गाँधी किसी भी तरह से प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प नहीं हो सकते। इस नक़ली युद्ध के शंखनाद से बीजेपी विरोधी पार्टियों के कई नेता भी भ्रम के शिकार हो रहे हैं और अभी से ही यह तय करने की कोशिश की जा रही है कि मोदी की जगह प्रधानमंत्री कौन हो सकता है। बहुजन समाज पार्टी की मायावती या फिर तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी या कोई और ग़ैर-कांग्रेसी ग़ैर-भाजपाई नेता। प्रधानमंत्री पद के विकल्प पर बयानबाज़ी के साथ ही 2019 के चुनावों के लिए ख़ेमाबंदी शुरू हो गई है।

बीजेपी की रणनीति तो नहीं?

बीजेपी के लिए मोदी बनाम राहुल को चुनावी मुद्दा बनाना एक आसान रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि 2014 में जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ कर बीजेपी विजेता के रूप में उभरी, उन पर बहस अब आसान नहीं है। 2014 में बीजेपी विकास का सपना बेच रही थी। युवा वर्ग को रोज़गार की उम्मीद दिलाई गई। किसानों को भी फ़सल की अच्छी क़ीमत मिलने की आशा जगाई गई। और जब मोदी ने देवालय से पहले शौचालय का नारा दिया तो लोगों को लगा कि बीजेपी अपने सांप्रदायिक अजेंडे से दूर हट रही है। 2014 के बाद विधानसभा चुनावों में भी आम मतदाता बीजेपी के पीछे लामबंद दिखाई दिया।
  • देश में बीस से ज़्यादा राज्यों में बीजेपी की सरकार बन गई। लेकिन पिछले साढ़े चार सालों में बीजेपी आर्थिक मोर्चे पर अपने दावों के मुताबिक़ कारगर साबित नहीं हो पाई। नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक सुधार के कार्यक्रम अभी तक सफलता की कोई उम्मीद नहीं दिला पा रहे हैं।
  • बैंकों से हज़ारों करोड़ कर्ज़ के नाम पर लूटने वाले माल्या नीरव मोदी और चोकसी जैसे लोग विदेश फुर्र होने लगे तो मोदी का ‘न खाऊंगा और न खाने दूँगा’ जैसा उद्घोष भी असफल साबित होने लगा। मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रम भी महज जुमला साबित हो रहे हैं।

असफलता को ढँकने की कोशिश?

आर्थिक मोर्चे पर असफलता को गाय-राम मंदिर और अंधराष्ट्रवाद से ढँकने की कोशिश भी नाकामयाब साबित हो रही है। अब राहुल गाँधी और उनके परिवार पर हल्ला बोल कर बीजेपी यह बताने की कोशिश कर रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है। भारतीय राजनीति में ऐसी कोशिशें पहले भी हुई हैं। 70 के दशक में कांग्रेसियों का नारा था कि इंदिरा गाँधी का कोई विकल्प नहीं है। 1971 के युद्ध की महा विजेता और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे साहसी आर्थिक सुधारों की हीरो इंदिरा गाँधी को भी 1977 में मतदाताओं ने धूल चटा दी।

इतिहास से सबक़ लेना सबके लिए आसान नहीं है। बीजेपी आज इसी दुविधा में दिखाई देती है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा कई बार हुआ जब लोगों ने महानायक प्रधानमंत्रियों और उनकी पार्टियों को शिखर से उतार कर इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। 1977 में मतदाताओं ने जब इंदिरा गाँधी और कांग्रेस को महापराजय के लिए मजबूर किया तब चुनाव के बाद प्रधानमंत्री कौन होगा, इसकी चिंता शायद किसी मतदाता ने नहीं की थी। 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी और बीजेपी को पराजय का मुँह देखना पड़ा तब भी मनमोहन सिंह कोई वैकल्पिक प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं थे। मनमोहन सिंह की सरकार इंदिरा गाँधी के बाद सबसे लंबी यानी 10 साल तक चली।

कांग्रेस के लिए मौक़ा 

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावी नतीजों से पहले किसी मुख्यमंत्री का नाम तय नहीं था। मतदाताओं ने बीजेपी की जमी-जमाई सरकारों को उखाड़कर कांग्रेस को मौक़ा दे दिया। विधानसभा के चुनावों में भी आर्थिक मुद्दे सबसे ऊपर आ गए थे। छत्तीसगढ़ में सब्सिडी की राजनीति चलाकर 15 सालों तक मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह को अलविदा कहने में भी मतदाता हिचकिचाए नहीं। अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि विधानसभाओं में पराजय से सबक़ लेने के लिए बीजेपी ख़ुद को तैयार कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के ताज़ा भाषणों और बयानों में अब भी वही पुरानी जुमलेबाजी दिखाई दे रही है।

बीजेपी-कांग्रस नहीं, क्षत्रपों का दौर

एक बात बहुत साफ़ है कि 2019 का लोकसभा चुनाव सीधे तौर पर बीजेपी बनाम कांग्रेस या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गाँधी नहीं है। यह दौर क्षत्रपों का है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्षत्रप पूरी ताक़त के साथ मौजूद हैं। बंगाल में बीजेपी को ममता बनर्जी के साथ-साथ सीपीएम और कांग्रेस का मुक़ाबला करना है। बिहार में बीजेपी गठबंधन के ख़िलाफ़ तेजस्वी यादव और कांग्रेस खड़े हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव की पार्टियाँ हैं। उड़ीसा में नवीन पटनायक, तमिलनाडु में स्टालिन, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना में केसीआर की पार्टियाँ अपने पूरे दमख़म के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। इनमें से कुछ के साथ कांग्रेस का अच्छा-ख़ासा तालमेल चल रहा है और कुछ राज्यों में विवाद भी है। इन सबके बीच एक महत्वपूर्ण बात यह है कि बीजेपी की तरह कांग्रेस ही पूरे देश में एक पार्टी के रूप में मौजूद है और बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस ही है। लेकिन 2019 में सरकार की होड़ में शामिल होने के लिए कांग्रेस को लंबी छलांग लगानी पड़ेगी। 

2014 में कांग्रेस लोकसभा की महज़ 44 सीटों तक सिमट गई थी। 44 सीटों से बहुमत के लिए ज़रूरी 271 सीटों तक की उड़ान आसान नहीं है। लेकिन आम लोगों के भीतर असंतोष का जो ज्वालामुखी धधक रहा है, उसका बड़ा फ़ायदा कांग्रेस को मिल सकता है।

दावेदार कई

ग़ैर-कांग्रेसी दलों में प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन होगा, इसका फ़ैसला चुनाव के नतीजों के बाद ही हो सकता है। कुछ लोग अभी से मायावती या ममता बनर्जी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में उछालने की अधकचरी राजनीति कर रहे हैं। दावेदार तो और भी हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश से मुलायम सिंह यादव, महाराष्ट्र से शरद पवार और कर्नाटक से देवेगौड़ा को क्यों छोड़ दिया जाए? इतिहास में ऐसा भी हुआ है कि जिनको प्रधानमंत्री पद का सबसे बड़ा दावेदार माना गया, वे प्रधानमंत्री बन ही नहीं सके। पूरी तैयारी के बाद भी 2004 में सोनिया गाँधी और 1996 में ज्योति बसु प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। साल 1996 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवेगौड़ा को ससम्मान दिल्ली बुलाकर प्रधानमंत्री बना दिया गया। क़रीब एक साल बाद इंद्रकुमार गुजराल भी ऐसे ही प्रधानमंत्री बन गए। 1998-2004 के बीच कई बार कोशिशों के बाद भी लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं मिली। 

पीएम कुर्सी रणनीति का हिस्सा?

  • मोदी बनाम राहुल का छद्म युद्ध भी बीजेपी कैंप के लिए चुनाव जीतने की आसान रणनीति तो हो सकती है लेकिन ग़ैर-भाजपाई पार्टियों में अगले प्रधानमंत्री पद के लिए तर्क-वितर्क बेमानी है। 
बीएसपी, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के लिए अभी से भावी प्रधानमंत्री के मुद्दे पर उलझना लोकसभा में ज़्यादा बड़ा हिस्सा पाने की रणनीति हो सकता है लेकिन यह तय है कि कांग्रेस को केंद्र में रखे बिना बीजेपी को केन्द्रीय सत्ता से बाहर रखना आसान नहीं होगा। मोदी और बीजेपी के हमलों के बीच राहुल गाँधी का क़द लगातार बड़ा होता जा रहा है। छद्मयुद्ध से बीजेपी को कोई भी बड़ा राजनीतिक फ़ायदा मिलना आसान नहीं लगता। धीरे-धीरे 2019 का चुनाव रोज़ी-रोटी के इर्द-गिर्द सिमटता दिखाई दे रहा है। बीजेपी को अपनी रणनीति इसी के आसपास बनानी होगी। और ग़ैर-भाजपाई पार्टियों को भी आर्थिक मुद्दों पर अपना रुख़ साफ़ करना होगा।

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