लगता है हमारी संसद बूढ़ी हो गई है या सत्तापक्ष का नेतृत्व बूढ़ा हो चला है। वरना जब लोकसभा में नारी वंदन अधिनियम 2026 और परिसीमन अधिनियम 2026 पर बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने व्यंग्य में एक बात कही—जादूगर पकड़ा गया तो उस पर सत्तापक्ष आक्रामक हो गया। यहां तक कि लोकसभा अध्यक्ष ने हमेशा की तरह विपक्ष की ओर अपना कुपित रुख प्रकट करते हुए कहा कि ‘जादूगर’ संसदीय शब्द नहीं है। भारतीय सीमाओं की रक्षा के लिए निरंतर बूढ़े और शासक की रक्षा के लिए जवान होते जा रहे हमारे रक्षामंत्री ने इसे भारतीय सेना का अपमान बताया। अगर हंसी मजाक से रहित हो चुके और कटुता और पक्षपात से पूरी तरह भर चुके चैनलों के एंकरों की टिप्पणियों को छोड़ दिया जाए तो यह बात सच है कि आम नागरिक और दर्शक राहुल गांधी के उस वर्णन का खूब मजा ले रहे थे। या तो हमारी हिंदुत्ववादी राजनीति हमारी हिंदी फिल्मों से इतनी कट चुकी है कि उसके भाषणों में हल्की फुल्की रोमांटिक बातें एकदम नदारद हो चुकी हैं या फिर हम स्मृतिभ्रंश के शिकार हो गए हैं।

‘जादूगर सइयां छोड़ो मोरी बइयां...'

हिंदी सिनेमा जादू, जादूगरी और बाजीगरी के गानों से इतना भरा पड़ा है कि उनको गुनगुनाते ही कोई भी नेता अपने को युवा महसूस कर सकता है और तनाव से रहित हो सकता है। अगर आज सत्तर अस्सी के दशक के बाद के गानों को छोड़ दें तो भी पुरानी ‘नागिन’ फिल्म का वैजयंती माला पर फिल्माया गया गाना किसे नहीं याद होगा। ‘जादूगर सइयां छोड़ो मोरी बइयां, हो गई आधी रात, कि अब घर जाने दो’। पचहत्तर पार के नेताओं को शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर को लेकर बनाई गई फिल्म ‘कश्मीर की कली’ का वह गाना याद दिलाना चाहिए जिसे मोहम्मद रफी और हाल में दुनिया से विदा हुईं आशा भोसले ने गाया था– इशारों, इशारों में दिल लेने वाले बता ये हुनर तूने सीखा कहां से, निगाहों, निगाहों में जादू चलाना मेरी जान सीखा है तूने जहां से। फिल्म ‘दस्तक’ का वह गाना भी किसी को झूमने पर मजबूर कर सकता है जिसके बोल हैं:—जादू भरी आंखों वाले सुनो, तुम ऐसे मुझे देखा न करो। फिल्म ‘बेदर्द जमाना’ का मुकेश का गाया यह गीत भी लाजवाब हैः— नैना हैं जादू भरे, गोरी तेरे नैना हैं जादू भरे। इसी तरह फिल्म ‘जिस्म’ में श्रेया घोषाल का गाया गीत—जादू है नशा है मदहोशियां हैं। फिल्म ‘माया मेम साहेब’ में गुजलार का लिखा और कुमार सानू का गाया गीत हैः—जादू है जुनून है कैसी माया है। फिल्म ‘हम आप के हैं कौन’ का वह गाना भी कम लोकप्रिय नहीं हैः—दिल पे नहीं काबू, कैसा है ये जादू, ये मौसम का जादू है मितवा।
पता नहीं हमारे हिंदुत्ववादी राजनेता कैसी राजनीति करते हैं कि उनके भाषणों से, उनकी संवेदना से प्रेम और रोमांस समाप्त होता गया है। हास्य भी गायब हो गया है। शायद उनके भीतर विजय की ऐसी लालसा पैदा हो गई है कि वे हिंदी फिल्मों के खलनायकों या हिंसा करने वाले नायकों की तरह खूंखार डॉयलाग बोलने में ही यक़ीन करते हैं। जैसे कि ‘तुम्हारे बाल सफेद हो जाएंगे लेकिन इधर यानी सत्ता पक्ष की ओर बैठने का मौका नहीं मिलेगा’। हिंदुत्ववादी इन नेताओं की तुलना अगर उन्हीं की पिछली पीढ़ी से की जाए तो भी यह पीढ़ी फिसड्डी निकलेगी। आडवाणी जी भले ही गंभीर रहते हों लेकिन वे अपने पत्रकारीय जीवन में फ़िल्मों की समीक्षा करते रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के रोमांटिक व्यक्तित्व का तो क्या ही कहना! शायद उन्हें यह प्रेरणा पंडित जवाहर लाल नेहरू से मिली थी जिन्हें ‘पोयट इन पॉलिटिक्स’ कहा भी जाता था।

हिंदुत्व के बूढ़े, संवेदनहीन और कटुता भरे वचन बोलने वाले और सदैव किसी न किसी संघर्ष का आह्वान करने वाले नेताओं के लिए रामधारी सिंह दिनकर ने कुरुक्षेत्र में कहा हैः—

वह कौन रोता है वहाँ-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है
प्रत्यय किसी बूढ़े, कुटिल नीतिज्ञ के व्यवहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की?

जब पश्चिम बंगाल और असम का चुनाव चल रहा हो तो जादू और जादूगर शब्द बेहद प्रासंगिक हो सकता है। बंगाल और असम के बारे में हिंदी इलाकों में कहा ही जाता है कि वहां मत जाइएगा क्योंकि वहां जादूगरनियां रहती हैं। वे आप को अपने वश में कर लेती हैं।

गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्र नाथ की कथा है ही कि वे असम में किसी स्त्री तांत्रिक के वशीभूत हो गए थे और गोरखनाथ ने जाकर वहां जब कहा कि ‘जाग मछेंद्र गोरख आया’ तो उनकी चेतना जगी। अगर संसदीय कार्रवाई को ध्यान से देखा सुना जाए तो हिंदी गानों का सबसे सर्जनात्मक तरीके से प्रयोग तृणमूल कांग्रेस के सांसद ही करते हैं। कल्याण बनर्जी, शताब्दी राय और उन सबसे ऊपर सयानी घोष। सयानी घोष तो सचमुच हिंदी गानों का प्रयोग करते हुए अपने भाषणों में जादू बिखेरती हैं। इसीलिए कहते हैं पश्चिम बंगाल के चुनाव में उनकी रैलियों की मांग ममता बनर्जी की रैलियों को टक्कर दे रही है।

अथर्ववेद में 'जादू-टोना'

वास्तव में हमारे हिंदुत्ववादी नेता अक्सर भारतीय ज्ञान परंपरा की बात करते रहते हैं लेकिन वे इस बात को भूल जाते हैं कि हमारी परंपरा का चतुर्थ और अंतिम वेद अथर्ववेद है। यह जादू टोना से भरा हुआ है। इसे जादुई सूत्रों का वेद कहा जाता है। वहां जादू के लिए ‘यातु’ शब्द का प्रयोग किया गया है। अथर्वण और आंगरिस ऐसे ग्रंथ हैं जहां जादू का महत्त्व बताया है। वास्तव में वहां जादू के माध्यम से वशीकरण और समाधान जैसी क्रियाएं भी हैं। जादू का प्रयोग इलाज में भी किया जाता रहा है। राजनीति और जादू की विद्या का संबंध बहुत पुराना है। यहूदियों का नेता मूसा मिस्र के शासक फरोस के सामने तमाम तरह के जादू दिखा कर उसे प्रभावित करता था।

महात्मा गांधी का जादू

लेकिन असली सवाल किसी राजनेता के जादुई प्रभाव और उसके क्षीण होने का है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक दौर महात्मा गांधी के जादू का रहा है। वह इतना प्रभावशाली रहा है कि उससे डॉ. भीमराव आंबेडकर बहुत बेचैन थे। उनका कहना था कि लोग तर्क के आधार पर सोचने के बजाय गांधी के प्रवाह में बह जाते हैं। इसीलिए गांधी की हत्या के बाद उन्होंने इस मामले में राहत महसूस की थी कि अब भारतीय जनमानस तर्क के आधार पर सोचने में समर्थ होगा। लेकिन डॉ. आंबेडकर का यह कथन उनकी ईर्ष्या पर आधारित था। वे गांधी के राजनीतिज्ञ और संत वाले चरित्र को लेकर भ्रमित रहते थे और कहते भी थे कि जब मैं संत से मिलने जाता हूं तो एक राजनीतिज्ञ निकल आता है और जब राजनीतिज्ञ से मिलने जाता हूं तो एक संत प्रकट हो जाता है। गांधी के लेखन, चिंतन और कर्म को देखने पर यह लगता है कि वह सत्ता हासिल करने वाला और उसके माध्यम से क्रूरता करने वाला जादूगर नहीं था। वह गुलामी के जादू में फंसी भोली भाली जनता को सत्याग्रह के माध्यम से आजादी का जादुई मंत्र सिखाने वाला जादूगर था। तभी हत्या के बाद भी उसका जादू घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है।

जादूगर कहने पर पीएम क्यों भड़के?

उसके ठीक विपरीत अगर हमारे हिंदुत्ववादी नेता ज्ञान, रोमांस और हास्य की महान परंपरा को छोड़कर प्रधानमंत्री को जादूगर कहने पर भड़क जाते हैं तो जाहिर है कि उनका जादू झूठ, कटुता और तिर्यक किस्म के आख्यान पर केंद्रित है। उन्हें डर है कि उनके सत्ता से उतरते ही जब पूरे झूठ का खुलासा होगा और महिलाओं के प्रति पिछले 12 सालों में किए गए व्यवहारों का खुलासा होगा तो उनके नारी वंदन का क्या होगा। निश्चित तौर पर मोदी जी का एक जादू रहा है। इसी जादू को लेकर एक बार एक बड़े पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि देश की महिलाएं मोदी जी पर फिदा हैं। लेकिन प्रधानमंत्री महोदय ने 18 अप्रैल की रात साढ़े आठ बजे राष्ट्र के नाम संबोधन में जिस तरह से पानी पी पी कर कांग्रेस पार्टी और सभी विपक्षी दलों को कोसा उससे लगा कि वे न तो भारत की अथर्ववेद की परंपरा को समझते हैं, न ही बॉलीवुड की फिल्मी परंपरा को और न ही व्यंग्य और हास्य की वैश्विक परंपरा को। हिंदुत्व अगर बहुत दिन कटुता भरी जीत हासिल करने के लिए हास्य और व्यंग्य से दूर रहेगा तो वह स्वाभाविक रूप से निस्तेज हो जाएगा।