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सुप्रीम कोर्ट में रफ़ाल, सबरीमला पर 6-8 महीने से फ़ैसले का इंतजार

देश के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनके सेवानिवृत्त होने से पहले राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद भूमि विवाद, रफ़ाल लड़ाकू विमान ख़रीद सौदा और सबरीमला मंदिर के मामले में शीर्ष अदालत के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिकाओं और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के ख़िलाफ़ लंबित न्यायालय की अवमानना मामले में फ़ैसले आ जायेंगे। 

राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद भूमि विवाद मामले में 18 अक्टूबर तक सुनवाई चलेगी। अयोध्या प्रकरण को मध्यस्थता के माध्यम से हल करने के प्रयास विफल होने के बाद प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ छह अगस्त से इस मामले की नियमित सुनवाई कर रही है। संविधान पीठ का प्रयास है कि यह सुनवाई 18 अक्टूबर तक पूरी कर ली जाये ताकि 17 नवंबर से पहले इस बारे में फ़ैसला सुनाया जा सके।

राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद भूमि विवाद मामले के महत्व को देखते हुए एक सदी से भी अधिक पुराने इस विवाद का समाधान करने के प्रति न्यायालय की गंभीरता को समझा जा सकता है, लेकिन कुछ अन्य मामले भी हैं जिनमें इसी तरह की तत्परता की अपेक्षा थी।

केरल में स्थित सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के फ़ैसले और रफ़ाल लड़ाकू विमानों की ख़रीद मामले में सुनाये गये फ़ैसलों पर पुनर्विचार याचिकाओं का उल्लेख किया जाना ग़लत नहीं होगा जिनमें क्रमशः आठ और छह महीने से फ़ैसले का इंतजार है।

इसी तरह, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ न्यायालय की अवमानना के मामले में भी शीर्ष अदालत के फ़ैसले का क़रीब छह महीने से इंतजार है। 

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यह भी विचित्र संयोग ही है कि मुक़दमों की सुनवाई पूरी होने के बाद फ़ैसला सुनाने में अत्यधिक विलंब से चिंतित उच्चतम न्यायालय ने 18 साल पहले इस संबंध में उच्च न्यायालयों के लिये विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किये थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश यह था कि मुक़दमे की सुनवाई पूरी होने के दो महीने के भीतर यदि संबंधित अदालत फ़ैसला नहीं सुनाती है तो मुख्य न्यायाधीश इस तथ्य की ओर उक्त पीठ का ध्यान आकर्षित करेंगे।

उच्चतम न्यायालय के ये दिशा-निर्देश भले ही उच्च न्यायालयों के लिये थे लेकिन उम्मीद की जाती थी कि शीर्ष अदालत भी इस पर अमल करके एक नजीर पेश करेगी। लेकिन ऐसा लगता है कि इन दिशा-निर्देशों का शीर्ष अदालत में फ़ैसले का इंतजार कर रहे मुक़दमों से कोई सरोकार नहीं था।

केरल के सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के संविधान पीठ के 28 सितंबर, 2018 के बहुमत के फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिये दायर याचिकओं पर शीर्ष अदालत ने छह फरवरी को सुनवाई पूरी की थी। उम्मीद थी कि इस मामले में जल्द से जल्द फ़ैसला आ जायेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

इसी तरह, रफ़ाल लड़ाकू विमानों की ख़रीद में कथित अनियमितताओं के मामले में सरकार को क्लीन चिट देने वाले न्यायालय के 14 दिसंबर, 2018 के फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिये पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी के साथ ही अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अन्य की याचिकाओं पर शीर्ष अदालत ने 10 मई को सुनवाई पूरी कर ली थी। इस मामले में भी न्यायालय का निर्णय प्रतीक्षित है।

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रफ़ाल सौदे के संदर्भ में राहुल गाँधी की टिप्पणियों को लेकर उन पर न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही के लिये बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी की याचिका पर भी शीर्ष अदालत ने 10 मई को ही सुनवाई पूरी की थी। इसमें भी अभी तक फ़ैसला नहीं आया है। राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री के लिये अपनी टिप्पणियों को न्यायालय के मुंह में डालने के प्रयास के लिये शीर्ष अदालत से बिना शर्त माफ़ी मांग ली थी।

वैसे यह पहला मौक़ा नहीं है जब उच्चतम न्यायालय में किसी मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद इतने लंबे समय तक निर्णय का इंतजार हुआ है। इससे पहले भी कई बार महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई पूरी होने के बाद लंबे समय तक फ़ैसले का इंतजार किया गया।

शीर्ष अदालत ने 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन घोटाला मामले में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा पर मुक़दमा चलाने की अनुमति देने में प्रधानमंत्री कार्यालय की निष्क्रियता को लेकर दायर याचिका पर न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एके गांगुली ने नवंबर, 2010 में सुनवाई पूरी करने के बाद 31 जनवरी, 2012 को फ़ैसला सुनाया था। कुछ ऐसी ही स्थिति आय से अधिक संपत्ति के मामले में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह और अन्य के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की अनुमति वापस लेने की सीबीआई की अर्जी के साथ भी हुई थी।

फ़ैसला सुनाने में विलंब क्यों?

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूति केटी थॉमस और न्यायमूति आरपी सेठी की पीठ ने छह अगस्त, 2001 को अपने फ़ैसले में उच्च न्यायालयों में मुक़दमों की सुनवाई पूरी होने के बाद फ़ैसला सुनाये जाने में अत्यधिक विलंब पर चिंता व्यक्त की थी। शीर्ष अदालत ने कहा था कि उच्च न्यायालय में किसी भी मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद अगर छह सप्ताह में फ़ैसला नहीं सुनाया जाता है तो मुख्य न्यायाधीश इस बारे में न्यायाधीशों के बीच सीलबंद लिफ़ाफ़े में अपना संदेश वितरित करने पर विचार करेंगे और दो महीने के भीतर फ़ैसला नहीं सुनाये जाने की स्थिति में वह इस ओर संबंधित पीठ का ध्यान आकर्षित करेंगे।
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यही नहीं, न्यायालय ने तो यहां तक कहा था कि सुनवाई पूरी होने के तीन महीने के भीतर फ़ैसला नहीं सुनाये जाने की स्थिति में ऐसे मामले का कोई भी पक्ष शीघ्र फ़ैसले के लिये आवेदन दायर कर सकेगा।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि अगर किसी वजह से छह महीने के भीतर फ़ैसला नहीं सुनाया जाता है तो ऐसे मामले का कोई भी पक्षकार अपना मामला वापस लेने और किसी नयी पीठ के समक्ष नये सिरे से बहस के लिये सूचीबद्ध करने की माँग मुख्य न्यायाधीश से कर सकता है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ऐसे मामले में जो भी उचित समझें, आदेश पारित कर सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय की 18 साल पुरानी व्यवस्था के बावजूद आज भी अक्सर कई मामलों में सुनवाई पूरी होने के बाद पक्षकारों को लंबे समय तक फ़ैसले का इंतजार रहता है।

बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि सुनवाई पूरी होने के बाद एक निश्चित अवधि के भीतर फ़ैसला सुनाने के बारे में उच्च न्यायालयों के लिये प्रतिपादित दिशा-निर्देशों पर अमल करके हमेशा की तरह शीर्ष अदालत भी एक नजीर पेश करेगी।

अनूप भटनागर
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