लगता है कि भारतीय लोकतंत्र कल्याणकारी राज्य से कष्टकारी राज्य की ओर बढ़ चुका है। शासक दल, सरकार और शासक वर्ग इस बारे में दृढ़ निश्चय कर चुका है कि अब इस लोकतंत्र को जनहितकारी नहीं रहने देना है। उसे ऐसे राज्य और लोकतंत्र का निर्माण करना है जो सरकार और शासक वर्ग के हितों के आगे नतमस्तक रहे और अपने अधिकारों को उतना ही समझे जितना शासक वर्ग उसे प्रदान करे। इन स्थितियों के आगे जनता कुछ करेगी इसकी कोई विशेष उम्मीद लगती नहीं। क्योंकि विपक्षी दल पायमाल हैं और सत्तारूढ़ दल कटिबद्ध है। वे शक्तियां जो दुनिया को फिर से साम्राज्यवाद की ओर ले जाना चाहती हैं वे भारत के शासक वर्ग को चपत लगाने और पुचकारने के खेल में माहिर हैं। उन्हीं के बल पर भारत में लोकतंत्र का विसर्जन हो रहा है।

सबसे ताजा उदाहरण एसआईआर की प्रक्रिया और उस पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का है। इस बारे में पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा और मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, जाने माने वकील प्रशांत भूषण और राजनीतिशास्त्री योगेंद्र यादव समेत देश के विभिन्न नागरिक संगठन गहरी चिंता जता चुके हैं। एसवाई कुरैशी साहब का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने जमीनी हकीकत देखे बिना कानून के दायरे में फैसला दिया है। अदालत ने इस बात का ध्यान ही नहीं रखा कि इससे कितने लोगों को लोकतंत्र की प्रक्रिया से बाहर किया गया है और फिर उन्हें राशन, पेंशन समेत उन तमाम सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है। उनका कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण कुछ भी हो सकता है लेकिन यह पुनरीक्षण तो नहीं था। यह भारतीय लोकतंत्र के जन्म से लेकर 2024 तक बनाई गई मतदाता सूची को रद्द करके एकदम नई सूची बनाने का अभ्यास था। इस अभियान के दौरान एक दो नहीं, करोड़ों लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर किया गया है। उन्होंने सवाल किया है कि सुप्रीम कोर्ट ने हमें यह तो बता दिया है कि एसआईआर संवैधानिक है लेकिन उसने यह नहीं बताया है कि जो लोकतंत्र अपने मजदूर किसान, छोटे कारोबार समेत करोड़ों नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर करता है क्या उसे लोकतंत्र कहा जा सकता है?
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ऐसी प्रतिक्रियाएं और भी देश के कई सरोकार वाले नागरिकों और विशेषज्ञों ने जताई है। किसी ने उस फैसले के दिन को लोकतंत्र का काला दिन कहा है तो किसी ने संवैधानिक संस्थाओं का समर्पण कहा है। कुछ विशेषज्ञों का तो यहां तक कहना है कि अब भाजपा ही तय करेगी कि इस देश का मतदाता कौन होगा। इस फैसले की एक और बड़ी खामी यह है कि इसने यह तो कह दिया कि चुनाव आयोग को नागरिकता की जांच का अधिकार नहीं है लेकिन उसने नागरिकता कानून में सेंध लगाने के लिए चुनाव आयोग को अधिकृत कर दिया है। 

नागरिकता की जांच का अधिकार किसे?

सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि चुनाव आयोग को नागरिकता की जांच का सीमित अधिकार है न कि अंतिम एक नए किस्म की व्याख्या है। आयोग जिसका नाम मतदाता सूची से बाहर करेगा उसे वह चार हफ्ते के भीतर उपयुक्त अधिकारी के पास भेज देगा। वह उपयुक्त अधिकारी तय करेगा कि उन मतदाताओं को नागरिक माना जाए या न माना जाए। पश्चिम बंगाल में भाजपा की नई सरकार ने एसआईआर में बाहर किए गए लाखों लोगों को घुसपैठिया साबित करने का काम शुरू कर दिया है। घर गिराना, कल्याणकारी नागरिक सुविधाओं से वंचित करना और इस प्रक्रिया में सदिग्ध लोगों को समाज से बाहर निकाल कर हिरासत केंद्र बनाने का काम शुरू कर दिया गया है।

इतना ही नहीं, गृह मंत्रालय ने इस बात के लिए भी आयोग का गठन कर दिया है कि देश की आबादी में असंतुलन कैसे पैदा हुआ और उसे कैसे ठीक किया जा सकता है।

जनसंख्या बदलाव पर समिति

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलकर के नेतृत्व में गठित जनसंख्या संबंधी परिवर्तनों पर उच्च स्तरीय समिति में और भी कई महत्त्वपूर्ण लोगों को सदस्य के रूप में रखा गया है। इसके अन्य सदस्य हैं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव दुर्गाशंकर मिश्रा, बीपीआर एंड डी के पूर्व प्रमुख बालाजी श्रीवास्तव और अर्थशास्त्री डॉ शामिका रवि। न्यायमूर्ति नाओलकर वही जज हैं जिन्होंने 2001 में अफजल गुरु की फांसी के फैसले पर मुहर लगाई थी। यह पैनन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उस वैचारिक प्रतिस्थापना को तथ्यात्मक जामा पहनाने की कोशिश करेगा कि देश में घुसपैठियों के कारण, धार्मिक मान्यताओं के कारण और दूसरे सामाजिक रीति रिवाजों के कारण आबादी के भीतर भारी असंतुलन पैदा हो गया है। सरकार का कर्तव्य इसे ठीक करना है। वह बताएगा कि किस तरह घुसपैठियों के कारण मतदाता सूची दोषपूर्ण बनी, कैसे भारत की सांस्कृतिक विरासत आहत हुई और कैसे सामाजिक आर्थिक तनाव पैदा हुआ। इस समिति की रपट के बाद शुरू होगी लोगों को चिह्नित करके प्रताड़ित करने की राजनीति और यही भाजपा के लंबे समय तक शासन करने का आधार बनेगी। सभंवतः इसी प्रक्रिया से वह 2030 में भारत को विकसित राष्ट्र घोषित कर सकेगी।
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आर्थिक संकट कितना गंभीर?

जिन लोगों को मौजूदा आर्थिक संकट की गहराई का जरा भी भान है वे जानते हैं कि इस देश की विकास दर 3 से 4 प्रतिशत के बीच है। इस विकास दर के आधार पर भारत कभी भी विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता। ऊपर से अमेरिका जैसे देशों से भारत के शासक वर्ग ने जो वादा किया है अगर उसे पूरा करना है तो भारत को हमेशा दूसरे देशों का मुखापेक्षी होकर ही रहना होगा। ऐसे में अमेरिका और सरकार समर्थक तमाम अर्थशास्त्री यह सुझाव दे रहे हैं कि आर्थिक सुधार तेज करो। सब्सिडी कम करो और जनता को वोट लेने के लिए रेवड़ी बांटने के लिए शुरू की गई योजनाएं बंद करो। अगर रेवड़ी बांटने वाली योजनाएं यकायक बंद कर दी गईं तो उस तबके के भीतर भारी असंतोष होगा जो मौजूद शासक दल को वोट करता है या मतगणना में जिसके वोट दर्शा कर चुनाव को वैधता प्रदान की जाती है। ऐसे में तरीका यही है कि कुछ लोगों को जनसंख्या बढ़ाने का दोषी बताकर, कुछ लोगों को घुसपैठिया बताकर, कुछ लोगों को धार्मिक और सामाजिक तनाव बढ़ाने का दोषी बताकर ऐसा आर्थिक ढांचा बनाया जाए जिसमें कल्याणकारी योजनाएं सीमित आबादी के लिए हों। यानी कल्य़ाणकारी योजनाएं उतनी हों जितने से शासक वर्ग की ऐय्याशियों में खलल न पड़े।

गरीब देता है ज़्यादा टैक्स: रिपोर्ट

ध्यान देने लायक है कि अभी हाल में मधुलिका बनर्जी ने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स के सौजन्य से किए गए एक अध्ययन में बताया है कि भारत की आबादी का निचला 50 प्रतिशत तब देश के 1 प्रतिशत संपन्न वर्ग से अधिक कर देता है। अगर तीन प्रतिशत लोग आयकर देते हैं तो व्यापक आबादी जीएसटी और दूसरे करों के नाम पर उससे कहीं अधिक कर अदा करता है। लेकिन शासक वर्ग दावा यह करता है जैसे कि सामान्य वर्ग उसी के कर से बनी व्यवस्था में खा जी रहा है। जबकि स्थिति उल्टी है।
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कष्टकारी लोकतंत्र की मजबूरी!

मौजूदा स्थिति आमजन के लिए कल्याणकारी नहीं कष्टकारी बनती जा रही है। चिंता की बात यह है कि देश का विपक्ष, देश का संविधान और उसकी संस्थाएं और देश का आमजन इस बारे में कुछ भी करने को तैयार नहीं है। इस बारे में कभी डॉ. लोहिया ने कहा था कि इस देश ने आंतरिक अत्याचारियों के विरुद्ध लंबे समय से कोई विद्रोह नहीं किया। उनकी निराशा का यह बड़ा कारण था जिसे उन्होंने निराशा के कर्तव्य में व्यक्त किया है। उनका यह भी कहना है कि इस देश में शासक तो हजारों साल से बदलते रहे लेकिन शासक वर्ग लंबे समय से नहीं बदला। वह मुगलों के जमाने में भी वही था, अंग्रेजों के जमाने में भी वही था और आजादी के बाद भी वही है। हाल में जब भाजपा सत्ता में आई तो तमाम विश्लेषकों ने यह कहना चाहा कि भारत में अभिजन बदल गया है। लेकिन नीतियां यही बताती हैं कि वह बदला नहीं है। बल्कि लोकतंत्र की अंतर्वस्तु भीतर से बदल रही है। सबसे चुनौती पूर्ण बात यह है कि इन बातों को आम जन तक पहुंचाने के संचार साधन सीमित हैं और आमजन भी ऐसे व्यामोह में है कि वह समझने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में कष्टकारी लोकतंत्र में लंबे समय तक जीना हमारी नियति बन चुकी है।