एक आदमी का घर छिन जाए। हम उसे भ्रष्टाचार नहीं कहते। एक बैंक का कर्ज़ डूब जाए। हम उसे अपराध नहीं कहते। सबका पैसा पूरा चुकता हो, यह हमेशा मुमकिन नहीं होता। दिवालिया कानून की ज़रूरत ही इसीलिए पड़ी थी।

जब बैंकिंग की भाषा में 'हेयरकट' शब्द आया, तो लगा कि सिर्फ़ बाल काटे जाएँगे। थोड़ा नुकसान बैंक सहेंगे, थोड़ा कारोबारी। लेकिन जब यह हेयरकट बढ़ते-बढ़ते मुंडन बन जाए, जब सौ रुपये के कर्ज़ पर निन्यानवे रुपये सत्तानवे पैसे साफ़ कर दिए जाएँ, तो हमें रुककर पूछना पड़ेगा कि खेल क्या है।

सारे घुमाव-फिराव हटा दीजिए। सीधे तथ्यों को देखिए। जो सच बचता है, वह डराने वाला है।

बात 2024 की है। जी और एस्सेल ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा दिवालिया अदालत में खड़े थे। बैंकों के ₹22,006 करोड़ के दावे थे। अदालत ने जो रास्ता साफ़ किया, उसमें बैंकों के हाथ सिर्फ़ ₹6.25 करोड़ आए। यानी हर सौ रुपये पर निन्यानवे रुपये सत्तानवे पैसे का मुंडन।

सीधा हिसाब यह है: आप पर बैंक का हजार रुपया चढ़ जाए, तो आप तीस पैसे देकर घर आ जाएँ। अदालत ने इस पर मुहर लगा दी। बड़े बैंकों ने हाँ कह दिया। लेकिन एचडीएफसी बैंक और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने ऐतराज़ जताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला गैर-कानूनी है। मामला अटका, जज बंटे, और अब अपील की तैयारी है।
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सुभाष चंद्रा के कर्ज का विवाद क्या?

लेकिन इसे "चंद्रा का 22,000 करोड़ का कर्ज़ चुकाना" कहना तकनीकी रूप से गलत होगा। ये दावे मुख्य रूप से उन गारंटियों के थे जो उन्होंने अपनी कंपनियों के कर्ज़ के लिए दी थीं। सरकार का तर्क है कि मूल कर्ज़ के वक्त दी गई गारंटियां सिर्फ़ ₹2,574 करोड़ की थीं, बाकी तो बाद में जोड़ी गईं। और चंद्रा का प्लान मंज़ूर होने से मूल कंपनियों पर बैंकों का दावा पूरी तरह खत्म नहीं होता।

यह कानूनी बारीकी अपनी जगह है। पर इससे जनता का सवाल खत्म नहीं होता। पर्सनल गारंटी का कोई मतलब होता है या नहीं? अदालत ने सिर्फ़ यह देखा कि आज उनकी जेब में क्या बचा है। अदालत ने यह नहीं देखा कि पैसा गया कहाँ।

एक आदमी 2016 में संसद को अपनी निजी जायदाद ₹39 करोड़ बताता है। 2024 में वही आदमी इंसॉल्वेंसी अफ़सर को ₹31.79 करोड़ का हिसाब देता है—जिसमें 25 करोड़ का वह मकान शामिल है जिसमें वह आज भी रह रहा है। वह हज़ारों करोड़ की गारंटियों के पीछे अपनी निजी हैसियत को ऐसे खाली कैसे दिखा सकता है?

ऐतराज़ जताने वाले बैंकों ने माँग की थी कि कॉर्पोरेट गारंटियों के उस पहाड़ से लेकर इस इकतीस करोड़ की रिहाइश तक पहुँचने के रास्ते का फॉरेंसिक ऑडिट हो। लेकिन व्यवस्था के पास न वक़्त था, न नीयत।

यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि चंद्रा सिर्फ़ एक कारोबारी नहीं थे। वे 2016 से 2022 तक भाजपा के समर्थन से राज्यसभा के सांसद रहे। 2016 में वे विपक्ष के वोट रद्द होने से जीते थे और 2022 में भी भाजपा-समर्थित उम्मीदवार थे।

इस राजनीतिक नज़दीकी से यह साबित नहीं होता कि अदालत का फैसला ऊपर से तय हुआ था। लेकिन लोकतंत्र में संस्थाओं का काम सिर्फ़ फैसला देना नहीं होता; उनका काम यह भरोसा देना भी होता है कि फैसला साफ-सुथरा है। जहाँ तीन पैसे का हिसाब हो और हेयरकट मुंडन बन चुका हो, वहाँ शक होना स्वाभाविक है।

इंसॉल्वेंसी बोर्ड: 203 बड़े मामलों का निपटारा

चंद्रा का मामला अकेला नहीं है। इंसॉल्वेंसी बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि जून 2026 तक एक हज़ार करोड़ से ऊपर वाले 203 बड़े मामलों का निपटारा हुआ। इन कंपनियों पर बैंकों के ₹12.27 लाख करोड़ के दावे थे। बैंकों को मिले कुल ₹3.85 लाख करोड़। यानी सिर्फ़ 31 फीसदी की वसूली। बाकी के ₹8.42 लाख करोड़ बही-खातों से साफ़ हो गए। इन ₹8.42 लाख करोड़ को सीधे चोरी कहना गलत होगा। इसमें ब्याज था, और कई कंपनियां अदालत पहुँचने तक पूरी तरह सड़ चुकी थीं।
इसीलिए बोर्ड अपनी सफ़ाई में कहता है: इन मामलों में बैंकों को कंपनियों की 'लिक्विडेशन वैल्यू'—यानी उन्हें कबाड़ के भाव बेचने पर जो मिलता—उसका 172 प्रतिशत हासिल हुआ। यानी कबाड़ से 1.7 गुना ज़्यादा।

यह व्यवस्था का सबसे बड़ा बचाव है। और यहीं से असली खेल शुरू होता है। आप किसी कंपनी को सालों तक अदालत और अफ़सरशाही के चक्कर में फँसाकर रखिए। उसकी कीमत रोज़ गिरेगी। मज़दूर भाग जाएँगे, मशीनें जंग खा जाएँगी, बाज़ार खत्म हो जाएगा। फिर उस सड़ी हुई कीमत को पैमाना बनाइए। और जब कोई बोली उस कबाड़ से थोड़ी ऊपर आए, तो अपनी पीठ थपथपाइए।

देरी ने कीमत मारी। मारी हुई कीमत ने मुंडन को जायज़ ठहराया। और कम बोली लगाने वाले को विजेता घोषित कर दिया गया। व्यवस्था उस चीज़ का आधा हिस्सा बचाने का जश्न मना रही है जिसे खत्म उसने खुद किया था।

संसदीय समिति की चेतावनी

संसदीय समिति ने 2021 में ही चेताया था कि अदालतों में देरी से देश की संपत्ति घिस रही है। 2026 तक आते-आते बड़े मामलों का औसतन समय 600 से 750 दिन हो चुका है। यहाँ समय ही देनदार का सबसे बड़ा वकील है।

जब रघुराम राजन ने इस कानून की वकालत की थी, तो उनका तर्क साफ था: कर्ज़ लेकर भागने का दौर खत्म होना चाहिए। जो डूबेगा, वह कंपनी गंवाएगा। अरविंद सुब्रमण्यम ने बैंकों के संकट की चेतावनी दी थी, और विरल आचार्य ने कहा था कि धीमी चाल से काम नहीं चलेगा।

लेकिन इस सोच में एक बुनियादी चूक थी। "विशुद्ध पूँजीवाद" की बात सिर्फ़ एक आर्थिक सिद्धांत नहीं थी, उसने एक पर्दे का काम किया। ऐसा पर्दा जिससे लगा कि संपत्ति का यह नया बंटवारा कोई निष्पक्ष प्रक्रिया है।

सच्चाई यह है कि जब आप टूटी हुई अर्थव्यवस्था में बाज़ार का नियम लागू करते हैं, तो वह बाज़ार बराबरी का नहीं होता। वह लाचार बाज़ार होता है। उस बाज़ार में कौड़ियों के भाव संपत्ति खरीदने की ताकत सिर्फ़ बड़े घरानों के पास होती है। जिनकी जेबें गहरी हैं, जो सालों तक केस लड़ सकते हैं, वे ही बोली जीतते हैं। कानून ने बाज़ार को उसी रूप में लागू किया जिस रूप में वह ताकतवर के हक़ में काम करता है।

अडानी गुडहोम्स का मामला

नतीजा सबके सामने है। रेडियस एस्टेट्स के मामले में बैंकों का ₹1,700 करोड़ का दावा था। अदालत ने अडानी गुडहोम्स की ₹76 करोड़ की योजना पर दस्तख़त कर दिए—यानी 96 फीसदी का मुंडन। जयप्रकाश एसोसिएट्स के मामले में ₹55,000 करोड़ के दावों के मुकाबले अडाणी की ₹14,535 करोड़ की बोली मंज़ूर हुई।

इसे समझाने के लिए किसी साज़िश की ज़रूरत नहीं है। यह इस कानून का सीधा गणित है। अदालतें बैंकों के फैसले के आगे झुकती हैं, अफ़सर कागज़ मिलाते हैं, और सालों की देरी से घिसी संपत्ति देश का सबसे बड़ा घराना उठा लेता है। कानूनी दलीलें अपनी जगह सही होंगी, पर देश की अर्थव्यवस्था पर इसका असर साफ़ है: यह कानून बैंकों का कचरा साफ़ करने के नाम पर देश की संपत्ति को कुछ हाथों में समेट रहा है।

इलाज खुद बीमारी बन चुका है। पुरानी बीमारी थी: बेफ़िक्र पूँजीवाद। प्रमोटर कर्ज़ डुबाकर भी ऐश करता था और सरकारी बैंक घाटा छिपाते थे।
विचार से और
नयी बीमारी ज़्यादा चालाक है। पुराना प्रमोटर भले हट जाए, पर घाटा जनता भरती है। संपत्ति अदालती देरी में घिसती है, और अंत में एक ज़्यादा बड़ा, ज़्यादा रसूखदार घराना उसे हथिया लेता है। मार पड़ती है छोटे शेयरधारकों पर, कामगारों पर और सरकारी बैंकों पर। रसूख का असली ढांचा जस का तस खड़ा रहता है।

रुण जेटली के दौर का कानून

कुछ सांसद जब शुरुआत में मुझसे कहते थे कि यह आवामी दौलत को निजी हाथों में सौंपने का सबसे बड़ा जरिया बन रहा है, तो मुझे लगता था कि वे सियासत कर रहे हैं। अरुण जेटली के दौर में बना यह कानून एक ज़रूरी कदम लगता था। लेकिन दस साल बाद, सबूत सामने हैं।

जो कानून यह न पूछ सके कि अर्ज़ी दाखिल होने से पहले प्रमोटर की दौलत कहाँ गायब हुई, वह दिवालिया कानून नहीं है। वह एक सरकारी बाज़ार है जिसके ऊपर सिर्फ़ मोहर लगी है।

पहला सुधार किसी नए नियम से नहीं होगा। पहला सुधार यह है कि संपत्ति के पिछले रास्तों की फॉरेंसिक जाँच हो—और समय को देनदार का सबसे बड़ा वकील बनने से रोका जाए।

दस साल बाद भारत को यह सवाल पूछना ही पड़ेगा: क्या इस कानून की मार उन पर पड़ी जो इसके ज़िम्मेदार थे—या इस मुंडन ने सिर्फ़ अगली ताकत के लिए मैदान साफ़ किया है?