बंगाल चुनाव में टीएमसी हार गई। ममता अपनी सीट भी हार गईं। पहले टीएमसी के 80 में से 60 विधायक टूटे। उनमें से कई मुसलमान भी थे। फिर 28 में से 20 सांसद टूटे। उनमें से 3 मुसलमान भी थे। उन तीन में एक क्रिकेटर यूसुफ़ पठान भी थे। कई दिन से सोशल मीडिया में सिर्फ़ यूसुफ़ पठान के विद्रोह की ही चर्चा चल रही है। सवाल यह है कि हिंदू विधायकों की चर्चा नहीं हो रही, मुस्लिम विधायकों की चर्चा नहीं हो रही, 17 हिंदू सांसदों की चर्चा नहीं हो रही, यहां तक कि बाक़ी दो मुस्लिम एमपी की भी चर्चा नहीं हो रही है। हंगामा अगर है तो केवल यूसुफ़ पठान पर, तो क्या सिर्फ सेलिब्रिटी को ही ईमानदार होना चाहिए? क्यों भाई? क्या बाक़ी को दलबदल करने का पहले से वरदान मिला हुआ था?
यहाँ यह साफ़ कर दें कि हम पठान के दलबदल के पक्ष में नहीं हैं। उनको बंगाल के बहरामपुर से कांग्रेस के एकमात्र सांसद रहे सेक्युलर नेता अधीर रंजन चौधरी को हराने के लिये दीदी गुजरात से लाई थीं। यह सीट मुस्लिम बहुल थी सो वे आराम से जीत गए। उनको क्रिकेटर होने से खूब हिंदू वोट भी मिले थे। वे सेलिब्रिटी हैं तो उनको जो लोग अपना रोल मॉडल मानते हैं, उनको पठान ने क्या मैसेज दिया है?
यह भी बहुत चिंता और दुख की बात है। हमारा कहना यह भी है कि बेईमानी सिर्फ रुपए पैसे की ही नहीं होती, अगर कोई बीजेपी कांग्रेस के खिलाफ़ चुनाव लड़कर जीता है, खासतौर पर उस बीजेपी के खिलाफ़ जो हिन्दुओं की हमदर्द कम मुसलमानों की विरोधी अधिक दिखती है। आखिर नैतिकता भी कोई चीज़ होती है। लेकिन पठान ने अपने निजी फायदे या डर के सामने उसे भी अपनी बिरादरी, मज़हब और पार्टी के मुकाबले ताक पर रख दिया है।
पठान के प्लॉट पर विवाद
यह ठीक है कि पठान भी एक इंसान ही हैं और इंसान हिंदू हो या मुसलमान, कभी भी बेईमान हो सकता है। कुछ पैसे या प्रॉपर्टी के लिये लालच आ ही सकता है। उनके घर के पास नगर निगम का लगभग एक हज़ार गज़ का बहुत महंगा और प्राइम लोकेशन का एक प्लॉट है। जो पठान को बहुत सस्ते में एलॉट किया गया था। उनका आज भी उस पर कब्ज़ा है। लेकिन उस प्लॉट पर विवाद है।
विवाद कोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने उसे खाली करने के आदेश कर दिए। लेकिन पठान के टीएमसी छोड़ने, एनडीए को सपोर्ट करने वाली एनसीपी ऑफ इंडिया में जाने और बीजेपी के बड़े नेताओं से संपर्क करने के बाद उनसे इस बेशकीमती प्लॉट को खाली कराने में निगम अब शांत हो गया है। शायद मामला सुप्रीम कोर्ट जाए तो निगम स्टे का भी विरोध न करे और फिर आगे सत्ता के इशारे पर केस की पैरवी भी ठीक से नहीं करे। इस तरह यह प्लॉट पठान का ही बना रहेगा।
यह तो हुई प्लॉट की वह बात जो पब्लिक डोमेन में आ चुकी है। इसके अलावा भी बीजेपी और पठान के बीच हो सकता है कि कोई बड़ी लेनदेन की डील हुई हो। यह भी हो सकता है कि उनको पुलिस, ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स और कुछ दूसरी एजेंसियों का डर भी सता रहा हो।
वह भी इसी देश, इसी समाज और इसी घटिया सियासत के दौर में रहते हैं तो आम इंसान की कमज़ोरी बुराई और बेईमानी उनमें क्यों नहीं आएगी? इस दौरान ख़बर यह भी आ रही है कि एक बार जब पठान टीएमसी में ही थे और संसद में एसआईआर का विपक्ष के साथ मिलकर ज़ोरदार विरोध कर रहे थे, तब उनको मुसलमानों के एक तथाकथित मसीहा ने मेसेज भेजा था कि वे बीजेपी का इतनी आक्रामकता व बढ़चढ़कर विरोध नहीं करें वरना उनके घर पर गुजरात में बुलडोजर चल सकता है।
यूसुफ पठान डर गए?
यह बात कश्मीर के एक मुस्लिम एमपी ने खुद मौके पर सुनी और मीडिया को बताई है। इतना ही नहीं, चर्चा यह भी है कि बीजेपी की बी टीम के मुखिया के इस मैसेज से पठान इतना डर गए कि वे तत्काल विरोध-प्रदर्शन छोड़ अपनी सीट पर जाकर चुपचाप बैठ गए। इसके बाद वे कभी बीजेपी के खिलाफ़ विपक्ष के साथ खुलकर नहीं खड़े हुए। हो सकता है कि अब उनका दलबदल भी उसी डर, लालच या किसी बड़ी डील का हिस्सा हो, लेकिन असली सवाल यह है जिनको हम सेलिब्रिटी पठान और मुसलमान के तौर पर जानते हैं, केवल उनसे ही ईमानदार, बहादुर और निस्वार्थ होने की उम्मीद क्यों कर रहे हैं, बाक़ी मुसलमानों और हिंदू विधायकों, सांसदों को क्या बेईमानी का लाइसेंस मिला हुआ है?
यह भी हो सकता है कि वे आज़म ख़ान, उमर खालिद, नवाब मलिक जैसे मुस्लिम लीडर्स का हश्र देखकर और इनकी पार्टियों के प्रमुखों का उनके हाल पर छोड़ देने का बेरहम रुख देखकर भी घबरा गए हों क्योंकि क्रिकेटर होना और संघर्ष की भावना होना दोनों अलग-अलग बात होती है। इससे एक झूठ और खुल गया है, वह यह कि मुसलमानों का नेतृत्व कोई मुसलमान ही ठीक से कर सकता है, बल्कि सच यह है उसका धर्म जाति पार्टी कोई भी हो, अगर कोई इनसान उसूल वाला सच्चा निस्वार्थ निडर ईमानदार चरित्रवान नैतिक और अच्छा इंसान है तो वह सब भारतीयों का ही नेतृत्व बेहतर करेगा।
"उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है, जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।"