हिन्दुत्ववादी संगठनों के एक समूह श्री वैष्णो देवी संघर्ष समिति ने कटरा स्थित श्री माता वैष्णो देवी उत्कृष्ट चिकित्सा संस्थान में एम.बी.बी.एस. का कोर्स इसलिए बंद करवा दिया है क्योंकि वर्तमान वर्ष में नीट प्रवेश परीक्षा के माध्यम से दाखिला पाए 50 छात्रों में से 42 मुस्लिम थे। हालाँकि महीन तरीक़े से हिन्दुत्व की दखलंदाजी शैक्षणिक संस्थानों में तो तभी से शुरू हो गई थी जब नरेन्द्र मोदी की दिल्ली में सरकार बनी, लेकिन यह अभी तक का सबसे नग्न और खुला हस्तक्षेप है।
हिन्दुत्ववादियों का यह कहना कि यह संस्थान चूँकि माता वैष्णो देवी के भक्तों के चंदे से बना है अतः यहां ज्यादातर मुस्लिम बच्चे पढ़ेंगे तो भक्तों की भावना को ठेस पहुंचेगी, पूरी तरह सही नहीं है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बताया है कि वहां की सरकार ने संस्थान स्थापित करने के लिए 80 कैनाल जमीन दी और संस्थान के संचालन के लिए प्रति वर्ष अनुदान भी देती है। पिछले वर्ष सरकार ने 24 करोड़ रुपये दिए व वर्तमान वर्ष में संस्थान के लिए 28 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की कार्रवाई पर सवाल
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग, जिसने मात्र चार माह पहले ही इस संस्थान में एम.बी.बी.एस. कोर्स के संचालन की अनुमति दी थी, द्वारा 2 जनवरी को मात्र 15 मिनट की सूचना पर एक औचक निरीक्षण कर संस्थान को एम.बी.बी.एस. संचालन की अनुमति वापस ले ली है। वह उसके द्वारा तैयार की गई एक फर्जी रिपोर्ट से ज्यादा हिन्दुत्ववादी संगठनों के धरना-प्रर्दशन के दबाव का परिणाम ज्यादा दिखाई पड़ता है। छात्रों से अपने घर वापस जाने को कह दिया गया और ऐसा आश्वासन दिया गया है कि उन्हें अन्यत्र चिकित्सा संस्थानों में समायोजित किया जाएगा लेकिन प्राध्यापकों को तो नए सिरे से नौकरी की तलाश करनी पड़ेगी।
ऐसा लगता है कि बीजेपी नेता और विधान सभा में विपक्ष के नेता सुनील कुमार शर्मा का यह तर्क कि श्रद्धालु चाहते हैं कि उनका पैसा सनातन धर्म के प्रचार प्रसार में लगे, एक बाद में सोचा गया तर्क है। यह रोचक होगा यदि भक्तों से पूछा जा सके कि वे अपना पैसा एक चिकित्सा संस्थान में लगाना चाहेंगे जहां से उनके बच्चे पढ़ कर चिकित्सक बन सकते हैं अथवा वैदिक अनुसंधान केन्द्र या गुरुकुल बनाने में जैसा कि शर्मा दावा कर रहे हैं।हिन्दुत्ववादी संगठन एक ख़तरनाक नज़ीर पेश कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि हिन्दू श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान के अंश से बने संस्थान में मुस्लिम छात्र नहीं पढ़ सकते। क्या ये छात्र चिकित्सक बन कर सिर्फ़ मुसलमानों का इलाज करने वाले थे?
अगली बात ये हिन्दुत्ववादी यह कर सकते हैं कि हिन्दू चिकित्सक सिर्फ़ हिन्दुओं का इलाजे करेंगे और मुस्लिम अपने लिए मुस्लिम चिकित्सक ढूंढें। यदि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती है कि किसी हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ता को अथवा उसके परिजन को अस्पताल में भर्ती रहते खून की ज़रूरत पड़े तो क्या वे देखेंगे कि खून किसका चढ़ाया जा रहा है हिन्दू या मुसलमान का? जिस तरह से सरकार द्वारा हिन्दुत्ववादी संगठनों का तुष्टीकरण हो रहा है, देश पतन की ओर तेजी से अग्रसर है।
दान में भी हिंदू-मुस्लिम?
हम हिन्दू और मुस्लिम दान को अलग कैसे कर सकते हैं? एक साझा संस्कृति में जहां मिश्रित आबादी रहती है, यह जटिल काम है। जम्मू-कश्मीर के ही राजौरी जिले की मंजाकोट तहसील में एकमात्र हिन्दू परिवार एक किराना की दुकान चलाता है जिसके सारे ग्राहक मुस्लिम हैं। अब आप इस परिवार की कमाई को हिन्दू मानेंगे या मुसलमान?वैष्णो देवी के श्रद्धालुओं को माता के मंदिर में दर्शन करने के लिए जो 13 किलोमीटर पहाड़ चढ़ना पड़ता है वहाँ मुस्लिम कुली उनकी हर प्रकार से मदद करते हैं- लोगों व सामान को ढोने से लेकर पालकी व टट्टुओं की व्यवस्था करना - जिसके बिना यह चढ़ाई दुष्कर हो जाएगी। अभी वर्तमान में हरिद्वार में जिस तरह गंगा सभा की मांग उठ रही है कि कुम्भ क्षेत्र में गैर-हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित किया जाए यदि कभी इस तरह की व्यवस्था वैष्णो देवी यात्रा क्षेत्र में लागू हो गई तो श्रद्धालुओं के लिए बिना मुस्लिम कुलियों के शारीरिक और नैतिक समर्थन के यात्रा दूभर हो जाएगी।
कल्पना करें कि 42 छात्रों पर इस घटना का क्या मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा होगा जिनको जिन्दगी भर यह बात खटकेगी कि सिर्फ उनके धर्म की वजह से कुछ लोगों को यह मंजूर नहीं था कि वे चिकित्सक बनें। जब कभी उनके जीवन में ऐसे क्षण आएंगे जब उन्हें धर्म के आधार पर पक्षपात के लिए उकसाया जाएगा तो उन्हें अतिरिक्त प्रयास व संयम के साथ खुद को धार्मिक भेदभाव से ऊपर रखना होगा।
हिन्दुत्ववादी शक्तियों, जिनको कहीं न कहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी का मौन समर्थन प्राप्त था, द्वारा कटरा के चिकित्सीय संस्थान को बंद करा कर क्या मिलेगा मालूम नहीं लेकिन इतना तो तय है कि भीड़तंत्र की संस्कृति को वैधता मिली है।
मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा सकता?
2019 में जब फिरोज खान की नियुक्ति बतौर सहायक प्राध्यापक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में हुई तो छात्रों ने विरोध-प्रदर्शन किया कि एक मुस्लिम कैसे संस्कृत पढ़ाएगा? बाद में फिरोज खान को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय में संस्कृत पढ़ाने हेतु नियुक्त किया गया। हालाँकि, किसी प्राध्यापक के धर्म के बजाए उसकी योग्यता को परखा जाना चाहिए था जो उनको उसी विश्वविद्यालय के अन्य विभाग में नियुक्ति देकर स्वीकार की गई और छात्रों की प्राध्यापक नियुक्ति के मामले में अनाधिकृत दखलंदाजी को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए था। किंतु यहाँ भी विश्वविद्यालय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी की इच्छा के सामने झुक गया। यदि सरकार कड़ाई से नियम का पालन करती तो छात्रों की मनमानी नहीं चलती। भारत के बार काउंसिल द्वारा एल.एल.बी. कोर्स की मान्यता 2021 में समाप्त होने के बावजूद 2024 में बाराबंकी के श्री रामस्वरूप विश्वविद्यालय द्वारा दाखिला लेते रहने के खिलाफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के समर्थन से चल रहे छात्रों के धरने पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया। इस मामले में यूपी सरकार द्वारा चार पुलिस वालों को निलम्बित कर और विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलवाकर योगी आदित्यनाथ द्वारा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का तुष्टीकरण किया गया।
लेकिन जम्मू में जो हुआ वह तो इस किस्म के तुष्टीकरण की पराकाष्ठा थी। सड़क पर लोगों ने एक संस्थान का भविष्य तय कर दिया। अब आप हिन्दुत्ववादियों के शैक्षणिक संस्थानों के मामलों में अधिक हस्तक्षेप के लिए तैयार रहिए।
संस्थानों की मान्यता, छात्रों के दाखिले, पाठ्यक्रम, प्राध्यपकों व कुलपतियों की नियुक्ति जैसे मामले अब सड़क पर तय होंगे। हम एक तालिबान जैसी व्यवस्था की ओर अग्रसर हैं जो अफगानिस्तान में लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ने को व पुस्तकालयों में महिला लेखिकाओं की पुस्तकें प्रतिबंधित किए हुए हैं।
धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण के बाद क्या?
एक बार जब धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण एक हद पार कर लेगा तब हम जाति, लिंग व जातीयता जैसी श्रेणियों की ओर बढ़ेंगे। आरक्षण विरोधी लोग, जिनकी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भरमार है, व्यंग्य करते हैं कि क्या आप किसी आरक्षण के आधार पर दाखिला पाए चिकित्सक से इलाज कराना चाहेंगे? जल्द ही तकनीकी पढ़ाई के दरवाज़े अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए बंद हो जाएंगे। यह फ़ैसला भी सड़क पर होगा। दलित, आदिवासी, पिछड़े इसका विरोध करेंगे किंतु विरोध को नजरअंदाज किया जाएगा और ज्यादा बढ़ने पर कुचल दिया जाएगा। न्यायाधीश वंचित तबकों के सांविधानिक अधिकारों के साथ खड़े होने के बजाए आरक्षण की व्यवस्था को ख़त्म होता देख मन ही मन खुश होंगे। महिलाओं को भी संस्थान के प्रमुख पदों से वंचित किया जा सकता है जैसे ईरान में कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकती। यह फैसला भी सड़क पर होगा। छात्रावासों या रिहायशी इलाकों से कश्मीर व पूर्वोत्तर से आए नागरिकों को प्रतिबंधित किया जा सकता है।
हमें विवेक, ज्ञान, योग्यता जैसी चीजों को भूल जाना चाहिए। कोई परीक्षा, साक्षात्कार, चयन समिति आदि की जरूरत नहीं रह जाएगी। फैसले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालयों में लिए जाएंगे और बजरंग दल व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद उनका अनुपालन करवाएंगे। शेष समाज से सहमति की अपेक्षा रहेगी।