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भारतीय लोगों की भाषा कौन सी है - हिंदी या उर्दू?

ऐसा क्यों है कि भारत के देशभक्त युवा बिस्मिल, फैज़, जोश आदि की उर्दू कविताएं/गीत को सुनते और गाते हैं और कोई हिंदी कवि जैसे महादेवी वर्मा या सुमित्रा नंदन पंत की कविताओं/गीतों को नहीं? इसका कारण यह है कि हिंदी कविताओं में वह शक्ति नहीं है जो उर्दू कविताओं में है। हिंदी हिन्दुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की, यह प्रचार करना अंग्रेज़ों की 'बाँट करो और राज करो' की नीति का हिस्सा था, जबकि वास्तविकता यही है कि उर्दू सभी शिक्षित लोगों की भाषा थी चाहे वे किसी भी मजहब के हों।  
जस्टिस मार्कंडेय काटजू

यह कहने के लिए कि ‘हिंदी भारतीय जनभाषा नहीं है, बल्कि एक कृत्रिम रूप से बनाई गई भाषा है’, मुझे कई लोगों की कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, जैसे कि मैंने कोई बेतुकी, भयानक या अति निंदनीय बात कह दी हो। 

हिंदी और हिंदुस्तानी में अंतर समझाने के लिए मैं एक उदाहरण दे रहा हूँ। हिंदुस्तानी में कहेंगे 'उधर देखिए', हिंदी में कहेंगे 'उधर अवलोकन कीजिए'। आम आदमी कभी 'अवलोकन' शब्द का प्रयोग नहीं करता। इसी तरह कई शब्द ऐसे हैं जो व्यावहारिक हिंदुस्तानी भाषा में प्रयोग किए जाते हैं लेकिन जिन्हें संस्कृतमय कर दिया गया। उदाहरण के लिए 'ज़िला' शब्द को 'जनपद' में बदल दिया गया।

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जब मैं इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज था तो मेरे सामने एक अधिवक्ता जो हिंदी में ही बहस करते हैं, उन्होंने मुझे एक दरख्वास्त दी जिसका शीर्षक था 'प्रतिभू आवेदन पत्र'। मैंने पूछा ये 'प्रतिभू' शब्द का क्या अर्थ है तो उन्होंने बताया इसका अर्थ है ‘बेल’ या ‘ज़मानत’। मैंने उनसे कहा कि आप ‘बेल’ या ‘ज़मानत’ शब्द का उपयोग ही करते जो सब समझते हैं। इसी तरह हज़ारों शब्द हैं जिन्हें आम आदमी व्यावहारिक रूप में प्रयोग करता है लेकिन उन्हें क्लिष्ट बना दिया गया और इस प्रकार इस कृत्रिम भाषा हिंदी का निर्माण हुआ।  

मैंने यह पहले भी कहा है कि भारत के कई हिस्सों में अशिक्षित आम आदमी की भाषा हिंदुस्तानी है (जिसे खड़ी बोली भी कहा जाता है), जबकि शिक्षित भारतीयों की भाषा उर्दू थी, चाहे वह हिंदू, मुसलमान या सिख हो। (मेरे लेख देखें 'उर्दू क्या है?' ('What is Urdu?') और 'भारत में उर्दू के प्रति महान अन्याय (‘Great injustice to Urdu in India’)'।

मैंने इन लेखों में बताया है कि यह प्रचार करना कि हिंदी हिन्दुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की, अंग्रेज़ों की 'बाँट करो और राज करो' की नीति का हिस्सा था, जबकि वास्तविकता यही है कि उर्दू सभी शिक्षित लोगों की भाषा थी चाहे वे किसी भी मजहब के हों।  

हालांकि कुछ निहित स्वार्थी लोगों ने मुझे मुसलिम अपीलकर्ता, पाकिस्तानी और क्या-क्या नहीं कहा। परन्तु भारत के लोगों ने मुझे सही साबित किया है। निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान दें - 

दिल्ली के शाहीन बाग़ में हुए सीएए विरोधी प्रदर्शन-रैलियों में, पाकिस्तानी क्रांतिकारी कवि हबीब जालिब की उर्दू कविता 'दस्तूर' को गाया गया था और आईआईटी कानपुर के छात्रों की रैली में जामिया मिल्लिया के छात्रों के समर्थन में प्रसिद्ध पाकिस्तानी कवि फैज़ द्वारा उर्दू कविता 'हम देखेंगे' को गाया गया।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिस्मिल की उर्दू कविता 'सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' हर देशभक्त की जुबान पर थी और यह हमारा क्रांतिकारी गान बन गया था, ठीक वैसे ही जैसे 'मार्सेल्स' फ्रांसीसी क्रांति के दौरान था या 'द इंटरनेशनल’ रुसी क्रांति के दौरान।

ऐसा क्यों है कि भारत के देशभक्त युवा बिस्मिल, फैज़, जोश आदि की उर्दू कविताएं/गीत को सुनते और गाते हैं और कोई हिंदी कवि जैसे महादेवी वर्मा या सुमित्रा नंदन पंत की कविताओं/गीतों को नहीं? इसका कारण यह है कि हिंदी कविताओं में वह शक्ति नहीं है जो उर्दू कविताओं में है।

क्रांतिकारी कविताओं से लोगों को, विशेषकर युवाओं को, वीरतापूर्ण कार्य करने की प्रेरणा मिलनी चाहिये (जैसे मैक्सिम गोर्की की कविता ‘द सॉन्ग ऑफ़ द स्टॉर्मी पेट्रेल’) लेकिन हिंदी कविताएं ऐसा करने में स्पष्ट रूप से कमज़ोर दिखाई देती हैं।

उदाहरण के लिए, यदि हम बिस्मिल की उर्दू कविता ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ वाक्य का हिंदी में अनुवाद करते हैं तो यह बन जाता है - "शीश कटवाने की इच्छा अब हमारे हृदय में है"। निश्चित रूप से इसमें वह दम नहीं है जो बिस्मिल की उर्दू कविता में है और कोई भी क्रांतिकारी इसे नहीं गाएगा।

इसी प्रकार, फैज़ की शक्तिशाली उर्दू कविता "बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़ुबां अब तक तेरी है" का हिंदी अनुवाद पूरी तरह से बेतुका हो जाएगा, इसका हिंदी अनुवाद होगा - "उच्चारण करो कि होंठ स्वतंत्र हैं तुम्हारे, उच्चारण करो कि जिह्वा अब तक तुम्हारी है"।

उर्दू कविता की निम्नलिखित सरल लेकिन शक्तिशाली पंक्तियों पर विचार करें:

“जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है? (साहिर लुधियानवी के शेर "सनाख्वाँ-ए-तकदीस -ए-मशरिक़ कहाँ हैं ") या मजरूह सुल्तानपुरी के शेर “सर पर हवा-इ-ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ, अपनी कुलाह कज है उसी बांकेपन के साथ’’।

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इसमें कोई संदेह नहीं है कि दिनकर जैसे कुछ हिंदी कवि हैं जिन्होंने ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' जैसी कविताएं लिखीं, जिसमें 'वीर रस' है। कवि भूषण जिन्होंने शिवाजी महाराज का गुणगान करते हुए कई छंद लिखे, फिर भी उर्दू के बजाए हिंदी में लिखने के कारण इनमें उतनी शक्ति नहीं है जितनी उर्दू शायरी में होती। हिंदी में वह बल और अंदाज़-ए-बयान नहीं है जो उर्दू में है।

जैसा कि मेरे लेख ‘उर्दू क्या है (What is Urdu?) में मैंने बताया कि उर्दू कविता विरोध की कविता है व आम आदमी के दुखों और अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती है। क्योंकि भारत अपने इतिहास में एक क्रांतिकारी परिवर्तनशील युग से गुज़र रहा है, भारतीयों, विशेष रूप से भारतीय युवाओं को, वीरतापूर्ण कार्य करने के लिए, आने वाले ऐतिहासिक संघर्ष में प्रेरणा देने के लिए क्रान्तिकारी कविता की आवश्यकता होगी।

मेरे विचार से ये कविताएं केवल उर्दू कविताएं हो सकती हैं हालांकि इन्हें सरलीकृत किया जाना चाहिए न कि ये क्लिष्ट फारसी भाषा में हों। 

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जस्टिस मार्कंडेय काटजू
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