कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने एक छोटा सवाल आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से पूछा कि आरएसएस ने आजतक अपना रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं कराया? इस सवाल का जवाब आसान है। भागवत कह सकते थे कि हाँ, गलती हो गई रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं। या फिर जल्दी ही करा लेंगे। लेकिन संघ की तरफ से ऐसा जवाब नहीं आया। जो जवाब आया वो हास्यास्पद ही नहीं, वो आपत्तिजनक भी है। वो कहते हैं कि हिंदू धर्म का कब रजिस्ट्रेशन हुआ। ये जवाब अहंकार से भरा है। ये एक धृष्टता भी है। करोड़ों हिंदुओं का अपमान भी। कहीं किसी धर्म का रजिस्ट्रेशन होता है? आरएसएस अपने अहंकार में भूल गया कि संघ हिंदू धर्म नहीं है। और अगर उसे ये मुग़ालता है तो बहुत जल्दी ये दूर हो जायेगा क्योंकि हिंदू धर्म में किसी का अहंकार पचता नहीं है।

रजिस्ट्रेशन क्यों ज़रूरी?

आरएसएस अगर भारत के संविधान को मानता है, वो कानून की चारदिवारी में रह कर अगर अपने काम करता है तो उसे रजिस्ट्रेशन कराना चाहिए। अंग्रेजों के जमाने में नहीं कराया तो कोई बात नहीं लेकिन आज़ादी के बाद तो उसे कराना चाहिए। इस देश का संविधान कहता है कि ये देश क़ानून से चलेगा। और देश का संविधान कहता है कि अगर कुछ लोग एक संगठन बना कर कोई काम करना चाहते हैं तो उसका रजिस्ट्रेशन होना चाहिए ताकि ये पता चले कि उनके काम का उद्देश्य क्या है, उनके सदस्य और पदाधिकारी कौन हैं? और कानून की किस धारा के तहत वो अपनी कार्यवाही को संचालित करते हैं? संगठन में पैसे का लेन देन है या नहीं, और अगर है तो फिर उसका हिसाब-किताब रखा जाता है या नहीं? अगर टैक्स देना ज़रूरी है तो फिर टैक्स दिया जाता है या नहीं? ये सब कानून की नज़र में किसी भी संगठन के लिए ज़रूरी है। लेकिन संघ, जो दुनिया का सबसे बड़ा संगठन होने का दावा करता है, जिसके बारे में लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमंत्री कहते हैं कि आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ है, वो कहता है कि ये दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है कि वो एक संगठन है, वो एनजीओ नहीं है।
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'व्यक्तियों का समूह' की दलील क्यों?

अब कौन झूठ बोल रहा है। ये बताने की ज़रूरत नहीं है। संघ, जो अपनी संगठन क्षमता पर गर्व करता है, जिससे लाखों-करोड़ों लोग जुड़े हैं, जो पचास से ज्यादा दूसरी संस्थाओं को चलाता है, जिसकी एक सुविचारित और सुव्यवस्थित, संरचना है, जिसमें प्रमुख से लेकर सबसे निचले पायदान के व्यक्ति का कार्य निर्धारित है वो कहता है कि वो संगठन नहीं है, वो महज़ ‘व्यक्तियों का समूह’ है। अब ये कौन मानेगा कि आरएसएस सिर्फ व्यक्तियों का समूह है, जो रोज मिलते हैं और चले जाते हैं। यानी वो आरएसएस जो दरअसल संगठन का पर्याय है, जिससे पूरी दुनिया को सीखना चाहिए कि संगठन कैसे बनता है, कैसे चलाया जाता है, संगठन किस तरह से काम करता है और कैसे संगठन अपने पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में अनुशासन की प्राणवायु भरता है, वो कहता है कि वो संगठन नहीं है। अब इसे झूठ नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए। सवाल ये उठता है कि आरएसएस खुद को संगठन क्यों नहीं मानता?

आरएसएस के इस झूठ में आरएसएस की पीड़ा भी छुपी है और उसकी मजबूरी भी। आरएसएस का मूल उद्देश्य है हिंदूओं को एक करना। वो मानता है कि चूँकि हिंदू कभी एक नहीं रहा है इसलिये वो सदियों ग़ुलाम रहा है। जातियों में विभाजित हिंदुओं को एक करने के लिये संघ को एक शत्रु चाहिए। मुसलमान और ईसाई में वो शत्रु खोज लेता है और उनका डर दिखा कर वो हिंदुओं को एकजुट करने की कोशिश में लगा हुआ है। संघ के दूसरे प्रमुख एम एस गोलवलकर ने ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ नामक अपनी किताब में लिखा है कि हिंदुस्तान के तीन दुश्मन हैं- मुसलमान, ईसाई और साम्यवादी। अब मोहन भागवत कहते हैं कि संघ ने गोलवलकर की किताब का ये हिस्सा निकाल दिया है क्योंकि ये गोलवलकर और संघ के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। ठीक है। 

लेकिन इस सवाल का जवाब कौन देगा कि हर रोज संघ और उनसे जुड़े दूसरे संगठनों के कार्यकर्ता और पदाधिकारी क्यों मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं?

संघ के चरित्र को पटेल ने उजागर किया

संघ के इस चरित्र को खुद सरदार पटेल ने उजागर किया था। 11 सितम्बर 1948 को पटेल ने गोलवलकर को लिखी चिट्टी में कहा था- “हिंदुओं को एक करना और उनकी मदद करना एक बात है लेकिन उनकी तकलीफ के लिये मासूम और बेसहारा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों से बदला लेना दूसरी बात है। इनके सारे भाषण सांप्रदायिक ज़हर से भरे होते हैं। हिंदुओं में जोश भरने और सुरक्षा के लिये उनको संगठित करने के लिये ज़हर फैलाना ज़रूरी नहीं था। इस ज़हर के परिणामस्वरूप देश को गांधी जी के अनमोल जीवन के बलिदान का दर्द झेलना पड़ा।’ गांधी की हत्या के बाद संघ के लोगों ने मिठाई बाँटी थी। और आरएसएस पर पटेल ने प्रतिबंध लगाया था। गोलवलकर और हज़ारों कार्यकर्ताओं को जेल में बंद किया गया था। हालाँकि ये भी सच है कि गाँधी की हत्या में आरएसएस का हाथ था, इस बात के सबूत कभी नहीं मिले। पटेल कांग्रेस में रहते हुए भी, गांधी के कट्टर अनुयायी होने के बाद भी, आरएसएस से सहानुभूति रखते थे। फिर भी उन्होंने संघ पर बैन लगाया? क्यों? क्योंकि संघ की गतिविधियाँ देश और समाज के लिये ख़तरनाक थीं?
इसके अलावा संघ पर दो और बार बैन लगा। 1975 में इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगने के साथ संघ पर प्रतिबंध लगाया था। इंदिरा गांधी की प्रशंसा अटल बिहारी वाजपेयी और संघ के प्रमुख बाला साहेब देवरस करते थे। जेल से देवरस ने इंदिरा की तारीफ में चिट्टी लिखी थी। 

इंदिरा गांधी संघ से नफ़रत नहीं करती थीं। उनके बारे में ये भी कहा जाता है कि वो जीवन के उत्तरार्ध में हिन्दुवादी हो गई थीं। इंदिरा को क्यों संघ पर बैन लगाने की ज़रूरत पड़ी? वो किन कानून विरोधी गतिविधियों में संलग्न था?

नरसिम्हा राव ने क्यों प्रतिबंध लगाया था?

इसी तरह पी वी नरसिम्हा राव ने भी 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था। बाबरी विध्वंस के दिन को लाल कृष्ण आडवाणी अपने जीवन की सबसे दुखद घटना कहते हैं। और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में लिखा कि ये एक आपराधिक कृत्य था। बाबरी मस्जिद को गिराने का काम संघ के लोगों ने किया था। ये सब को मालूम है। पूरी योजना संघ के लोगों ने तैयार की थी। और इसलिये संघ पर तीसरी बार प्रतिबंध लगा था। दिलचस्प बात ये है कि नरसिम्हा राव भी आरएसएस के दुश्मन नहीं थे। वो संघ से सहानुभूति रखते थे। इसलिए संघ के लोग भी नरसिम्हा राव के प्रति नरम रहते हैं। वो सोनिया-राहुल की तीखी आलोचना तो करते हैं लेकिन राव को बख़्श देते हैं। यानी पटेल, इंदिरा और राव, तीनों ही कहीं न कहीं संघ के प्रति नरम रूख रखने वाले नेता थे पर इन्हें संघ पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। क्यों?

और जिस संगठन पर तीन बार प्रतिबंध लग चुका हो वो हमेशा ये प्रयास करता है कि उसकी कोई भी गतिविधि काग़ज़ पर न हो, ताकि कोई सबूत न मिले। अगर वो रजिस्ट्रेशन करायेगा तो फिर उसे अपने कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों का रजिस्टर रखना पड़ेगा और अगर ये कार्यकर्ता कभी ग़लत काम करते या क़ानून विरोधी गतिविधियाँ करते हुए पकड़े गये तो फिर आरएसएस ये नहीं कह पायेगा कि वो उनका कार्यकर्ता नहीं है। रजिस्ट्रेशन कराने के बाद ये सुविधा नहीं रहेगी।
मुझे अभी भी उम्मीद नहीं है कि संघ कर्नाटक सरकार के दबाव में रजिस्ट्रेशन के लिये तैयार हो जायेगा। वो टालने की कोशिश करेगा। केंद्र में उसकी सरकार है। ऐसे में कर्नाटक सरकार एक सीमा के बाद संघ को विवश भी नहीं कर सकती। लेकिन लोगों के मन में ये सवाल तो रह जायेगा कि जो दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है, वो खुद को संगठन नहीं मानता? ये झूठ क्यों बोला जाता है? संघ क्यों सच बोलने से कतराता है? कुछ तो गड़बड़ है। इतना संघ के नैतिकता के छद्म लबादे को नुक़सान पहुँचाने के लिए काफ़ी है। और यही कांग्रेस का उद्देश्य भी है। शायद।