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क्या पायलट की नाराज़गी के तूफ़ान में उड़ जाएगी गहलोत सरकार?

जैसा कि कल के अपने लेख में मैंने बताया था कि कांग्रेस एक और तूफ़ान से गुज़रने वाली है, शाम होते-होते तूफ़ान ने कांग्रेस के दरवाज़े पर दस्तक दे दी। साफ़ दिख रहा है कि कांग्रेस की राजस्थान सरकार संकट में है। लगता है राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार इस तूफ़ान की भेंट चढ़ जाएगी। सारे हालात इसी तरफ़ इशारा कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इस तूफ़ान की आशंका पहले से होने के बावजूद कांग्रेस ने इससे बचने की कोई तैयारी नहीं की।

राजस्थान में पिछले कई दिन से लगातार गहराते राजनीतिक संकट के बीच राज्य के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने बीजेपी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया से मुलाक़ात की है। इस मुलाक़ात के गहरे राजनीतिक संकेत हैं। यह मुलाक़ात राज्य की अशोक गहलोत सरकार के लिए ख़तरे की घंटी है। बीजेपी जल्दबाज़ी के बजाय ‘देखो और इंतज़ार करो’ की रणनीति पर चल रही है। सचिन पायलट का ज्योतिरादित्य से मिलने जाना ही इस बात का संकेत है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनने का सपना साकार करने की इच्छा उनके भीतर कुलांचे मार रही है। अब वो इसे जल्द साकार करना चाहते हैं।

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रविवार शाम को सचिन पायलट के ज्योतिरादित्य सिंधिया से मुलाक़ात के बाद राजनीति गरमा गई है। दोनों नेताओं की यह मुलाक़ात दिल्ली में हुई है। लगभग 40 मिनट तक चली यह मुलाक़ात ज्योतिरादित्य सिंधिया के आवास पर हुई। इस मुलाक़ात के कई मायने निकाले जाने लगे हैं। क्या सचिन पायलट भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह पर चलेंगे और कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर बीजेपी में शामिल होंगे? हालाँकि आख़िरी फ़ैसला सचिन पायलट को ही लेना है। पायलट यह फ़ैसला कब लेंगे और कैसे लेंगे यह देखना काफ़ी दिलचस्प होगा। सचिन पायलट पूरी तरह ज्योतिरादित्य के नक़्शे क़दम पर चल रहे हैं।

ग़ौरतलब है कि इस मुलाक़ात से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सचिन पायलट के समर्थन में एक ट्वीट भी किया। इसमें सिंधिया ने कहा, ‘सचिन पायलट को दरकिनार किए जाने से मैं दुखी हूँ। यह दिखाता है कि कांग्रेस में क़ाबिलियत और क्षमता की कोई अहमियत नहीं है।’

इससे साफ़ लगता है कि राजस्थान की राजनीतिक पटकथा भी मध्य प्रदेश की तरह लिखी जा रही है। चार महीने पहले मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस में हुई बग़ावत के बाद वहाँ कमलनाथ सरकार का पतन हो गया और बीजेपी सत्ता में आ गई।

अब राजस्थान में सचिन पायलट के बाग़ी तेवर कांग्रेस के लिए मुसीबत बनते नज़र आ रहे हैं। हालाँकि संख्या बल के लिहाज से राजस्थान कांग्रेस के लिए काफ़ी मज़बूत है, लेकिन पायलट ख़ेमा लगभग 30 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहा है। इससे कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार का संकट बढ़ सकता है। अगर मध्य प्रदेश की तरह सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों का विधानसभा से इस्तीफ़ा दिला देते हैं तो गहलोत सरकार का पतन उसी तरह तय है जैसे चार महीने पहले मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार गई थी।

बीजेपी पूरे मामले पर पैनी नज़र बनाए हुए है। वह उचित समय का इंतजार कर रही है। चोट करने के लिए उसे लोहे के गर्म होने का इंतज़ार है। सूत्रों के अनुसार बीजेपी नेतृत्व इस पूरे मामले में जल्दबाज़ी नहीं करेगा, बल्कि चुपचाप कांग्रेस के अंदर बग़ावत को हवा देकर कांग्रेस की बर्बादी का तमाशा देखेगा।

बीजेपी की रणनीति साफ़ है कि अगर पायलट सरकार गिराना चाहते हैं तो अपनी ताक़त दिखाएँ। बीजेपी की नज़रें इस पर हैं कि सचिन के साथ कितने लोग हैं और कब तक बाहर आते हैं? बीजेपी का सारी रणनीति इसी पर टिकी है। बीजेपी ख़ेमे से संकेत मिल रहे हैं कि अगली कार्रवाई की योजना पर फ़ैसला लेने से पहले वो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच शक्ति प्रदर्शन के नतीजों का इंतज़ार करेगी।

कांग्रेस में गहमागहमी

उधर कांग्रेस ने राजस्थान की अपनी सरकार बचाने के लिए पूरी ताक़त झोंक दी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कांग्रेस विधायकों की बैठक बुलाई है। उन्होंने अपने ख़ास मैनेजरों को एक-एक विधायक को ढूंढ कर लाने की ज़िम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने साफ़ कहा है कि सरकार बचाने की ज़िम्मेदारी सबकी है। सचिन पायलट ख़ेमे से संकेत मिल रहे हैं कि वो और उनके समर्थक इस बैठक में शामिल नहीं होंगे। अगर ऐसा होता है तो यह माना जाएगा कि विधायकों और सरकार दोनों पर अशोक गहलोत की पकड़ ढीली हो चुकी है। सत्ता उनके हाथ से किसी पल खिसक सकती है।  

कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने गहलोत सरकार को संकट से उबारन के लिए अपने ख़ास सिपहसालारों को जयपुर भेज दिया है। राजस्थान मामलों के प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे के साथ अजय माकन और रणदीप सुरजेवाला को जयपुर भेजा गया है। ये दोनों ही नेता राहुल गाँधी के ख़ास माने जाते हैं। शायद इसीलिए सचिन पायलट को मनाने की ज़िम्मेदारी इन्हें दी गई है। ये सचिन को मना पाते हैं या नहीं ये तो वक़्त बताएगा।

फ़िलहाल तो कांग्रेस की कोशिश कटी पतंग को पकड़ने जैसी लगती है। सवाल यह भी है कि कांग्रेस आलाकमान सचिन के ज्योतिरादित्य से मुलाक़ात करने से पहले क्यों नहीं जागा?

दरअसल, राजस्थान के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट नाराज़ तो तभी से चल रहे थे जब 2018 में उन्हें नज़रअंदाज़ करके अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया था। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के साथ सिर्फ़ उपमुख्यमंत्री बनाकर झुनझुना थमा दिया गया था। उनकी नाराज़गी बढ़ती चल गई गई। आरोप है कि गहलोत ने लगातार उन्हें दबाकर रखा। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, सचिन पायलट से राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने को कहा जा रहा है, जिससे वह नाराज़ हैं। बताया जाता है कि सचिन इसी शर्त पर उपमुख्यमंत्री बनने को राज़ी हुए थे कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष भी बने रहने दिया जाएगा।

विचार से ख़ास
दूसरी तरफ़ यह भी ख़बर सामने आई है कि सचिन ख़ेमा लगातार कांग्रेस आलाकमान पर मुख्यमंत्री बदलने का दबाव डाल रहा है। मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार गिरने के बाद इस माँग ने और ज़ोर पकड़ा है। कुछ दिन पहले इसी पर बयान देते हुए अशोक गहलोत ने कहा था कि दावेदार भले ही कई हों, लेकिन मुख्यमंत्री तो कोई एक ही बनता है।
सवाल यह है कि अंदर ही अंदर सुलग रही इन चिंगारियों को कांग्रेस आलाकमान देख नहीं पाया या फिर उसने देखकर भी अनदेखा कर दिया? अब जबकि ये चिंगारियाँ विस्फोटक हो चली हैं तो आलाकमान की नींद टूटी है।

ख़बर यह भी है कि राजस्थान एसओजी (SOG) ने उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को नोटिस भेज करके पूछताछ के लिए बुलाया। इसने पहले से नाराज़ चले आ रहे पायलट की नाराज़गी की आग में घी का काम किया। सूत्रों का कहना है पायलट इस सिलसिले में कांग्रेस आलाकमान से मिलकर स्थिति साफ़ करना चाहते थे लेकिन किसी को फ़ुरसत नहीं थी। वक़्त रहते किसी ने उनसे मिलने की ज़हमत नहीं उठाई तो उन्होंने ज्योतिरादित्य से मुलाक़ात करके आलाकमान को ही ज़हमत में डाल दिया। पायलट 20 से 25 विधायक लेकर दिल्ली पहुँचे और पार्टी हाईकमान को सारी स्थितियों से अवगत करा दिया है।

साफ़ है कि आदत से मजबूर कांग्रेस वक़्त रहते राजस्थान के सियासी हालात को संभाल नहीं पाई। इसीलिए सचिन पायलट बग़ावत के रास्ते पर इतनी दूर निकल गए हैं जहाँ से उनकी वापसी नामुमकिन लगती है। अगर मानमनौव्वल के बाद वह वापस आ भी गए तो ज़्यादा दिन टिक नहीं पाएँगे। कांग्रेस आलाकमान की लेटलतीफ़ी ने सचिन पायलट की सौदेबाज़ी की ताक़त बढ़ा दी है। कांग्रेस आलाकमान को अपनी इस ग़लती की क़ीमत तो चुकानी होगी। यह देखना काफ़ी दिलचस्प होगा कि क़ीमत कौन चुकाता है, कांग्रेस आलाकमान या गहलोत?

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यूसुफ़ अंसारी
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