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यूनिवर्सल बेसिक इनकम से ग़रीबी पर बड़ी चोट पड़ेगी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने छत्तीसगढ़ की एक सभा में घोषणा कर दी कि अगर कांग्रेस 2019 के चुनाव के बाद सत्ता में आई तो सबके लिए एक निश्चित आमदनी की गारंटी कर दी जाएगी। राहुल गाँधी ने कहा कि, ‘हम एक आधुनिक भारत का निर्माण तब तक नहीं कर सकते जब तक हमारे करोड़ों भाई-बहन ग़रीबी के अभिशाप से जूझ रहे हैं।’ उन्होंने दावा किया कि ग़रीबी और भुखमरी से मुक्ति पाने का यही तरीक़ा है। राहुल ने न्यूनतम आमदनी गारंटी की बात ऐसे समय में की है जब पूरी दुनिया भर में यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी यूबीआई की बात हो रही है। हालाँकि, यह बात अभी साफ़ नहीं है कि राहुल गाँधी ने बिना शर्त सभी के लिए यूबीआई की बात की है या लक्ष्य तय करके इस योजना को लागू करने की बात की है। 

दुनिया भर के विद्वानों का मानना है कि अगर यह योजना वास्तव में यूनिवर्सल न की गयी तो लाभार्थी तय करने के लिए बीच में नौकरशाही टपक पड़ेगी और भ्रष्टाचार की एक धारा खुल जाएगी जैसा कि अभी बहुत सारी योजनाओं में होता है। मनरेगा जैसी स्कीम में भी पंचायत प्रधान, बीडीओ से लेकर ज़िलाधिकारी और मुख्यमंत्री तक भ्रष्टाचार की कड़ी चलती है और लूट में सभी शामिल होते हैं। यूनिवर्सल बेसिक इनकम अगर सही अर्थों में लागू हो जाएगी तो अमीर-ग़रीब सबके बैंक खाते में एक निश्चित रक़म जमा हो जाया करेगी और यह काम मशीनी तरीक़े से हो जाया करेगा।

दिल्ली के सत्ता के गलियारों में बहुत समय से चर्चा है कि चुनाव के पहले आने वाले अंतरिम बजट में बीजेपी की सरकार भी इसी तरह की घोषणा करने वाली है। मौजूदा सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यन ने तो केंद्र सरकार के आर्थिक सर्वे में इस विषय पर पूरा एक अध्याय लिखा था और यूनिवर्सल बेसिक इनकम को एक सरकारी नीति के रूप में पेश कर दिया था। अगर उस समय सरकार ने उनकी बात मान ली होती तो आज नरेंद्र मोदी को हरा पाना असंभव हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

सभी नागरिकों के लिए न्यूनतम आमदनी की गारंटी करना बहुत बड़ा आर्थिक बोझ नहीं है। विख्यात अर्थशास्त्री प्रणब बर्धन ने यूनिवर्सल बेसिक इनकम के बारे में काफ़ी शोध किया है। उनका कहना है कि यह संभव है और भारत के लिए वांछनीय भी है। 

अर्थशास्त्री प्रणब बर्धन का सुझाव है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल पोषाहार और मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं के अलावा बाक़ी की सब्सिडी को ख़त्म करके अगर यूबीआई की व्यवस्था लागू कर दी जाये तो समाज का और अर्थव्यवस्था का बहुत भला होगा।

खाद, यातायात, बिजली, पानी, पेट्रोल आदि पर जो सब्सिडी दी जाती है वह ग़रीब आदमी तक तो पहुँचती ही नहीं, उसका एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार के तंत्र में चला जाता है। इस तरह की सब्सिडी बंद करके यूबीआई की बात शुरू कर दी जाए तो ग़रीब आदमी तक कुछ धन सीधे पहुँचेगा। 

सब्सिडी के पैसे से लागू होगी यूबीआई?

केवल खाद, यातायात, बिजली, पानी और पेट्रोल की सब्सिडी जीडीपी का 4% होता है। कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने एक ट्वीट के ज़रिये बताया कि राहुल गाँधी के वायदे पूरी तरह से लागू करने के लिए जीडीपी का केवल 3% ही काफ़ी होगा। अभी पीडीएस में जो सब्सिडी दी जाती है वह जीडीपी का 1.4% है। दुनिया जानती है कि पीडीएस में बहुत बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है और उस रक़म को अगर सीधे लाभार्थी के खाते में डाल दिया जाय तो सही रहेगा। अभी कस्टम और सेन्ट्रल एक्साइज में सरकार ऐसी छूट देती है जिसको रेवेन्यू फॉरगॉन ( revenue forgone) कहते हैं और वह जीडीपी का 6 प्रतिशत होता है। इसका मतलब यह है कि ऐसी योजना को लागू करने के लिए सब्सिडी की व्यवस्था पर पुनर्विचार की ज़रूरत पड़ेगी।

  • न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रफ़ेसर देबराज रे ने यूनिवर्सल बेसिक इनकम पर बहुत काम किया है। वह इसको यूनिवर्सल बेसिक शेयर कहते हैं और सुझाव देते हैं कि जीडीपी का एक हिस्सा रिज़र्व कर दिया जाए जिसको पूरी आबादी के खातों में जमा कर दिया जाना चाहिए। 

‘यूबीआई के लिए बदलाव ज़रूरी’

यूबीआई के लिए अब बुनियादी ढाँचा भी लगभग तैयार हो गया है। आधार कार्ड एक ऐसी सुविधा है जो देश के हर नागरिक की पहचान को सुनिश्चित कर देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जन-धन योजना के तहत देश के अधिकांश नागरिकों के खाते बैंकों में खुलवाने की पहल कर दी थी। अभी सब के खाते तो नहीं खुले हैं, लेकिन एक सिस्टम उपलब्ध है। टेलिविज़न पर हुई एक चर्चा में कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने बताया कि मौजूदा सब्सिडी तंत्र ज्यों का त्यों लागू रहेगा और यूबीआई की व्यवस्था उसके साथ-साथ होगी। अगर कांग्रेस सब्सिडी को जारी रखते हुए यूबीआई की बात कर रही है तो उन्होंने केवल चुनावी घोषणा कर दी है, उनको अर्थशास्त्र के इस सबसे आधुनिक पहलू के बारे में सही जानकारी नहीं है। अगर यूबीआई जैसी किसी योजना की बात करनी है तो उसको उन बहुत-सी ऐसी चीज़ों के बदले में लाना होगा जो भारतीय अर्थ-व्यवस्था में बहुत दिनों से चली आ रही है।

यूबीआई को लागू करने में भारत में कई समस्याएँ आने वाली हैं। सही बात यह है कि यूरोप के जिन देशों में यह स्कीमें सफलतापूर्वक चल रही हैं, समस्याएँ वहाँ भी हैं। स्विट्ज़रलैंड में यह व्यवस्था लागू थी लेकिन दो साल पहले हुए एक रेफरेंडम में जनता ने इसको बंद करने के लिए वोट दे दिया। मुख्य तर्क यह है कि इसके लागू होने से लोगों में कमाने के लिए उत्साह ख़त्म हो जाता है। नार्वे में यह स्कीम लागू है। लेकिन वहाँ उन लोगों को ही यह सुविधा मिलती है जिनके पास कोई काम नहीं है।

ओस्लो विश्वाविद्यालय के अर्थशास्त्री प्रो. काले मोइन का कहना है कि भारत में भी इसी तरह से लागू किया जा सकता है। ग़रीबी हटाने का इससे कारगर कोई तरीक़ा नहीं हो सकता।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने यूरोप में चल रही यूबीआई की इसी बहस से प्रभावित होकर 1971 के चुनाव में 'ग़रीबी हटाओ' का नारा दे दिया था। उस दौर में दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री, मिल्टन फ्रायडमैन भी यूबीआई की बात कर रहे थे और लेफ़्ट ऑफ़ सेंटर चिन्तक जॉन केनेथ गैलब्रेथ भी इस व्यवस्था को भुखमरी और ग़रीबी की महत्वपूर्ण काट के रूप में बता रहे थे। इंदिरा गाँधी ने घोषणा कर दी, जनता ने उनके ऊपर विश्वास किया, लेकिन ऐसा लगता है कि उनके पास योजना को लागू करने का कोई आइडिया नहीं था। बस उन्होंने चुनाव जीतने के लिए एक जुमला उछाल दिया था, जिसपर जनता ने विश्वास कर लिया। ठीक उसी तरह जैसे 2014 के चुनावों के अभियान में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो करोड़ नौकरियाँ प्रति वर्ष और किसान की आमदनी दुगुनी करने की बात कर दी थी। देश के नौजवानों और किसानों ने उनकी बात का विश्वास किया और देश में मोदी लहर आ गई। आज वही वायदा उनकी चुनावी सम्भावनाओं पर भारी पड़ रहा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं और सत्ताधारी पार्टी के पास कोई जवाब नहीं है।

क्या राहुल ने भी जुमला फेंका?

इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि राहुल गाँधी ने भी एक जुमला ही फेंका हो। लेकिन अब यह बात तय है कि उन्होंने इसकी बात करके भारत में यूबीआई जैसी योजना को लागू करने का रास्ता साफ़ कर दिया है। 

राहुल के इस आक्रामक रुख़ से यह बात तय है कि कल आने वाले अंतरिम बजट में मोदी सरकार भी यूबीआई या इससे मिलता-जुलता कोई प्रस्ताव लाएगी। इसका भावार्थ यह हुआ कि देश की दोनों बड़ी पार्टियों ने अपने आपको यूबीआई के लिए समर्पित कर दिया है।
राहुल गाँधी की घोषणा ने पूरी दुनिया में ग़रीबी, भुखमरी और बुनियादी आमदनी की लड़ाई लड़ रहे लोगों का ध्यान खींचा है। विश्वविख्यात 'टाइम' मैगज़ीन ने भी उनकी घोषणा के हवाले से एक बड़ी ख़बर अपने इंटरनेट संस्करण में लगाई है। पत्रिका ने ग़रीबी के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले अर्थशास्त्री, गाय स्टैंडिंग के बयान का विस्तार से उल्लेख किया है। वह भारत के बीजेपी नेताओं और संयुक्त राष्ट्र में बहुत दिनों से यूबीआई के सन्दर्भ में संपर्क बनाए हुए हैं।
  • गाय स्टैंडिंग कहते हैं कि बीजेपी के बड़े नेताओं में इस तरह की बात बहुत पहले से चल रही है। उन्होंने यूबीआई को मध्य प्रदेश में लागू करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की एक योजना पर 2011-12 में काम किया था। इस योजना के ट्रायल में छह हज़ार लोगों को बेसिक इनकम के दायरे में लिया गया था। उनको भरोसा है कि बीजेपी वाले तो पहले से ही इस विषय पर विचार कर रहे हैं। 

बीजेपी के सामने अब कोई विकल्प नहीं 

अब कांग्रेस की घोषणा के बाद बीजेपी के सामने कोई विकल्प नहीं है। उनको भी अंतरिम बजट में इसी हफ़्ते इसकी घोषणा करनी पड़ेगी। अगर बीजेपी यूबीआई की घोषणा नहीं करती तो उसको चुनावी नुक़सान होना तय है। ज़ाहिर है कि अब यूबीआई भारत की अर्थनीति का हिस्सा बन जाएगी और अपना देश ग़रीबी से लड़ाई की आर्थिक नीतियों के बारे में अमेरिका आदि से भी अधिक प्रगतिशील हो जाएगा। अमेरिका में भी दक्षिणपंथी राजनेता तो इसको फ़ालतू की बात मानते हैं और बर्नी सैंडर्स जैसे बाएँ बाजू के राजनेता भी इसको टालने के चक्कर में रहते हैं। 

टाइम मैगज़ीन में गाय स्टैंडिंग के हवाले से दावा किया गया है कि इस स्कीम के लागू होने से कुपोषण, अशिक्षा जैसी समस्याओं का हल निकालने और महिलाओं की दुर्दशा में सुधार लाने का काम किया जा सकता है। इस तरह हम देखते हैं कि राहुल गाँधी की दादी ने जिस योजना को केवल चुनाव जीतने के लिए 1971 में कह दिया था आज वह एक सच्चाई बन रही है। मई 2019 में सरकार चाहे जो बने यूबीआई अब एक नीति का रूप अवश्य लेगी।
शेष नारायण सिंह
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