पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी सरकार द्वारा ओबीसी आरक्षण में बड़े बदलाव किए जाने पर अखिलेश यादव ने बीजेपी पर ओबीसी आरक्षण विरोधी होने का आरोप लगाया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश ने कहा कि बीजेपी ने ओबीसी कोटा 17% से घटाकर 7% कर दिया है। अखिलेश ने यह आरोप तब लगाया है जब बंगाल में शुभेंदु सरकार ने मंगलवार को कैबिनेट बैठक के बाद पुरानी ओबीसी सूची रद्द कर दी और 2010 से पहले वाली 66 समुदायों को नियमित कर दिया। इस फैसले से राज्य की नौकरियों और कॉलेज एडमिशन में ओबीसी कोटे में काफी कमी आ गई है।

शुभेंदु सरकार ने ओबीसी आरक्षण में बदलाव करने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के मई 2024 के फ़ैसले का सहारा लिया। सरकार ने उस फ़ैसले का पालन करते हुए 2010 के बाद जोड़े गए 77 समुदायों को ओबीसी सूची से हटा दिया। इनमें ज़्यादातर मुस्लिम समुदाय थे। सरकार ने 2010 से पहले वाली 66 समुदायों को एक ही नई सूची में शामिल करने का फ़ैसला लिया। इनमें कपाली, कुर्मी, नाई (नापित), तांती, धनुक, कसाई, खंडायत, तुरहा जैसी पारंपरिक हिंदू समुदाय की जातियाँ शामिल हैं। तीन मुस्लिम समुदाय- पहाड़िया, हज्जाम और देवांगा को भी पिछड़ा वर्ग में रखा गया।

दो कैटेगरी में था आरक्षण, एक ख़त्म

ओबीसी आरक्षण पहले दो कैटेगरी में दिया जाता था। पहले यह कुल मिलाकर 17% था। इसमें 10% ‘अधिक पिछड़े’ (कैटेगरी ए) और 7% ‘पिछड़े’ (कैटेगरी बी) थे। अब बदलाव के बाद सिर्फ़ 7 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा।
 
पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने नोटिफिकेशन जारी कर कहा कि अब ये 66 समुदाय सरकारी नौकरियों, पदों और कॉलेज एडमिशन में 7% आरक्षण का लाभ ले सकेंगे।

अखिलेश यादव का हमला

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बीजेपी सरकार के इस फ़ैसले पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा, 'बीजेपी ने बंगाल में ओबीसी कोटा 17% से घटाकर 7% कर दिया। शुभेंदु सरकार ने ओबीसी सूची रद्द करके पिछड़ों के साथ अन्याय किया है।'

कोर्ट का फ़ैसला और पुरानी व्यवस्था

ममता बनर्जी सरकार के समय 2010-2012 में 77 नए समुदायों को ओबीसी में जोड़ा गया था, जिससे आरक्षण 17% हो गया था। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे गलत और असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा था कि इन समुदायों को शामिल करने से पहले सही सामाजिक-आर्थिक सर्वे नहीं किया गया था। कोर्ट ने 2010 के बाद जारी क़रीब 12 लाख ओबीसी सर्टिफिकेट रद्द कर दिए, लेकिन जिन लोगों को पहले नौकरी मिल चुकी थी, उन्हें सुरक्षा दी। 2010 से पहले वाले सर्टिफिकेट अभी भी मान्य हैं।

छात्रों और नौकरियों पर असर

शिक्षा विभाग के अधिकारी बताते हैं कि केंद्रीय एडमिशन पोर्टल पर अब ओबीसी कोटा 7% कर दिया गया है। कई छात्रों और अभ्यर्थियों में भ्रम है। जानकार कहते हैं कि अब ओबीसी समुदायों के बीच प्रतियोगिता बढ़ जाएगी। जवाहर सरकार जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि 2010 के बाद ज्यादातर मुस्लिम समुदायों को वोट बैंक की राजनीति के तहत जोड़ा गया था। अब उनकी संख्या ओबीसी सूची से कम होने से उनका उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व घट सकता है।

राजनीतिक मायने

यह फ़ैसला 2027 की जाति जनगणना से पहले आया है, जिससे बंगाल में जाति और वोट बैंक की राजनीति फिर से गरम हो गई है। टीएमसी और अन्य विपक्षी दल इसे 'पिछड़ों और अल्पसंख्यकों पर हमला' बता रहे हैं, जबकि भाजपा सरकार इसे 'कोर्ट के आदेश का पालन और पारदर्शिता' बता रही है। मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा, 'यह फैसला सामाजिक न्याय और अदालत के निर्देश के अनुरूप लिया गया है।' अभी राज्य के कॉलेजों में एडमिशन चल रहे हैं। नया बदलाव कितना असर डालेगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। ओबीसी युवा और उनके परिवार इस फ़ैसले को लेकर चिंतित हैं।