यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) सभी 403 सीटों पर लड़ने की तैयारी में है। पासी-दलित वोट बैंक, भाजपा से गठबंधन और अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति पर क्या होगा असर?
चिराग पासवान अपडेट
- 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं स्पष्ट कर दी हैं। कल 5 नवंबर को वो वाराणसी में थे।
- पार्टी ने सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत दिया है।
- इस घोषणा के पीछे सिर्फ चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में जगह बनाने, गैर-जाटव दलित वोटों को आकर्षित करने और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने की रणनीति भी दिखाई देती है।
लखनऊ से लेकर वाराणसी तक चिराग पासवान की सक्रियता ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। क्या बिहार में अपनी राजनीतिक ताकत साबित कर चुके चिराग पासवान उत्तर प्रदेश में भी दलित राजनीति का नया चेहरा बनना चाहते हैं? या सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात एनडीए के भीतर ज्यादा सीटें हासिल करने के लिए दबाव बनाने की राजनीतिक रणनीति है?
403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी का ऐलान
केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने 5 नवंबर को वाराणसी में कहा कि अगर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ सीटों को लेकर सहमति नहीं बनती है तो उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है।वाराणसी में पत्रकारों से बातचीत में चिराग ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन को लेकर अभी औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई है। हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि एनडीए के भीतर सहमति बन जाएगी। चिराग ने कहा कि केंद्र में उनकी पार्टी एनडीए का हिस्सा है और बिहार में भी वह एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ चुकी है। उन्होंने झारखंड का भी उल्लेख किया, जहां पार्टी ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा।
चिराग पासवान ने नागालैंड का उदाहरण देकर यह भी स्पष्ट किया कि गठबंधन नहीं होने की स्थिति में उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ने से पीछे नहीं हटेगी। 2023 के नागालैंड विधानसभा चुनाव में एलजेपी (रामविलास) ने अकेले चुनाव लड़कर दो सीटें जीती थीं। चिराग का यह बयान एक तरफ भाजपा के साथ गठबंधन की इच्छा जाहिर करता है, तो दूसरी तरफ सीटों के बंटवारे में अपनी पार्टी के लिए पर्याप्त जगह मांगने का संकेत भी देता है।
भाजपा से कितनी सीटें मांग रहे हैं चिराग?
चिराग पासवान ने पिछले महीने लखनऊ दौरे के दौरान कहा था कि उनकी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में प्राथमिकता वाली और 'ए कैटेगरी' की सीटों की पहचान कर ली है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। उनका तर्क था कि गठबंधन के संभावित सहयोगियों के सामने सीटों की संख्या सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा।यह बात महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में भाजपा पहले से कई सहयोगी दलों के साथ गठबंधन में है। इनमें अपना दल (सोनेलाल), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी शामिल हैं। इन दलों की भी अपनी-अपनी सामाजिक और क्षेत्रीय ताकत है और वे 2027 के चुनाव में अधिक सीटों की मांग कर सकते हैं। ऐसे में चिराग पासवान की एंट्री भाजपा के लिए सीटों के बंटवारे को और जटिल बना सकती है। एनडीए के भीतर पहले से मौजूद सहयोगी दलों के बीच सीटों की मांग को लेकर प्रतिस्पर्धा है। चिराग की पार्टी अगर उत्तर प्रदेश में अपनी हिस्सेदारी चाहती है तो उसे अपनी सामाजिक पकड़ और चुनावी उपयोगिता साबित करनी होगी।
दलित राजनीति में असली निशाना गैर-जाटव वोट बैंकः चिराग पासवान की उत्तर प्रदेश में राजनीतिक महत्वाकांक्षा को समझने के लिए राज्य के दलित वोटों के बदलते समीकरण को समझना जरूरी है। उत्तर प्रदेश की आबादी में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी करीब 21 फीसदी है। इनमें जाटव और गैर-जाटव दोनों समुदायों की महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका है। लंबे समय तक जाटव समुदाय बहुजन समाज पार्टी और मायावती का सबसे मजबूत आधार रहा है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में बसपा का जनाधार लगातार कमजोर हुआ है। इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति पर पड़ा है। बसपा का वोट प्रतिशत 2017 के विधानसभा चुनाव में 22.23 फीसदी था, जो 2022 में घटकर 12.88 फीसदी और 2024 के लोकसभा चुनाव में 9.4 फीसदी रह गया।
बसपा के कमजोर होने से जो राजनीतिक जगह खाली हुई है, उस पर भाजपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत कई दलों की नजर है। अब चिराग पासवान भी इस प्रतिस्पर्धा में उतरना चाहते हैं। उनकी रणनीति खास तौर पर गैर-जाटव दलितों को अपने साथ जोड़ने की है। इनमें पासी समुदाय महत्वपूर्ण है।
पासी उत्तर प्रदेश की प्रमुख दलित जातियों में से एक है। द फेडरल के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में पासियों की हिस्सेदारी करीब 3.5 फीसदी और दलित आबादी में लगभग 16 फीसदी है। यह संख्या चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। खासकर अवध और पूर्वांचल के कई इलाकों में पासी मतदाताओं की मौजूदगी चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है। चिराग पासवान खुद बिहार के दुसाध (पासवान) समुदाय से आते हैं। उनकी कोशिश पासी और पासवान समुदायों को एक राजनीतिक मंच पर लाने की है। इसके जरिए वह उत्तर प्रदेश में एक नया दलित राजनीतिक आधार तैयार करना चाहते हैं।
पासी-पासवान के साथ ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिशः चिराग पासवान की रणनीति सिर्फ दलित वोटों तक सीमित नहीं है। उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी की तरफ से 'पासी-पासवान सम्मान शौर्य यात्रा', दलित चौपाल और वंचित समाज सम्मेलन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसके अलावा ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित करने की भी योजना है। पार्टी ने दलित समुदाय के ऐतिहासिक प्रतीकों को भी अपने अभियान में शामिल किया है। इनमें वीरांगना ऊदा देवी, लखन पासी और महाराजा बिजली पासी जैसे नाम प्रमुख हैं।
यह रणनीति दो स्तरों पर काम कर सकती है। पहला, पासी समुदाय के बीच राजनीतिक पहचान और सम्मान का सवाल उठाकर समर्थन जुटाना। दूसरा, ब्राह्मणों और अन्य सामाजिक समूहों को जोड़कर पार्टी को सिर्फ एक जाति आधारित संगठन की छवि से बाहर निकालना।
'पंडित-पासी-पासवान' जैसे सामाजिक समीकरण के जरिए पार्टी एक व्यापक चुनावी आधार तैयार करना चाहती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जातीय सम्मेलनों और प्रतीकों के सहारे स्थायी राजनीतिक समर्थन हासिल किया जा सकता है? इसके लिए स्थानीय नेतृत्व, संगठन और लगातार जनसंपर्क भी जरूरी होंगे।
भाजपा और सपा के बीच दलित वोटों की लड़ाई में चिराग की एंट्री
उत्तर प्रदेश में दलित वोटों को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 2024 के लोकसभा चुनाव में दिखाई दिया। बसपा के कमजोर होने का फायदा भाजपा को मिलने की उम्मीद थी, लेकिन चुनाव परिणामों ने इस धारणा को चुनौती दी। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के जरिए गैर-जाटव दलित मतदाताओं के एक हिस्से को अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की।लोकनीति-सीएसडीएस के चुनाव बाद सर्वेक्षण के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में 56 फीसदी गैर-जाटव दलितों ने इंडिया गठबंधन को वोट दिया। एनडीए को 29 फीसदी और बसपा को 15 फीसदी गैर-जाटव दलित वोट मिले। यह आंकड़ा भाजपा के लिए चिंता का विषय है। खासकर इसलिए कि गैर-जाटव दलितों का एक हिस्सा पहले भाजपा के साथ रहा है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने गैर-जाटव दलितों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की थी। लेकिन 2024 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इस वोट बैंक में सेंध लगाई।
- अब चिराग पासवान की पार्टी इसी राजनीतिक खालीपन में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
- हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि पासवान समुदाय में चिराग की लोकप्रियता उत्तर प्रदेश के पासी मतदाताओं में भी उसी तरह समर्थन पैदा कर देगी।
- बिहार और उत्तर प्रदेश की सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं। दोनों राज्यों में जातियों की राजनीतिक प्राथमिकताएं और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका भी अलग-अलग है।
क्या चिराग पासवान अखिलेश यादव के लिए चुनौती बनेंगे?
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को छह सीटें मिली थीं। इस प्रदर्शन में पिछड़े वर्गों के साथ दलित मतदाताओं का समर्थन भी महत्वपूर्ण रहा। अखिलेश यादव की पीडीए रणनीति ने भाजपा के उस सामाजिक गठबंधन को चुनौती दी, जिसके सहारे पार्टी ने 2014, 2017 और 2019 में बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल की थी। अब चिराग पासवान की कोशिश है कि दलित मतदाताओं के बीच एक अलग राजनीतिक विकल्प खड़ा किया जाए।वाराणसी के राजनीतिक विश्लेषक और शिक्षाविद सुरेंद्र दुबे ने चिराग की संभावनाओं पर संदेह जताया। उनके मुताबिक, चिराग युवा और लोकप्रिय नेता हो सकते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के बीच उनकी अभी वैसी राजनीतिक स्वीकार्यता नहीं है। एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक डॉ. राज कुमार का मानना है कि चिराग पासवान बसपा से दूर हुए मतदाताओं के एक छोटे हिस्से को भी अपने साथ जोड़ लेते हैं तो उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी के लिए आधार तैयार कर सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि चिराग की सफलता का पैमाना केवल सीटें जीतना नहीं होगा। अगर वह कुछ क्षेत्रों में दलित वोटों का प्रभावी हिस्सा हासिल कर लेते हैं तो भविष्य में भाजपा और दूसरे दलों के साथ उनकी सौदेबाजी की ताकत बढ़ सकती है।
भाजपा के लिए चिराग मददगार या नई परेशानी: चिराग पासवान की उत्तर प्रदेश में सक्रियता भाजपा के लिए दो तरह के परिणाम पैदा कर सकती है। पहला, अगर चिराग एनडीए के साथ चुनाव लड़ते हैं तो वह गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच भाजपा के लिए सामाजिक पहुंच बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। दूसरा, अगर उनकी पार्टी अलग चुनाव लड़ती है तो कुछ सीटों पर भाजपा, सपा या दूसरे दलों के वोट काट सकती है।
राजनीतिक रणनीतिकार अमिताभ तिवारी ने इस संभावना की ओर इशारा किया है कि एलजेपी की स्वतंत्र मौजूदगी उत्तर प्रदेश में सीधे भाजपा बनाम समाजवादी पार्टी के मुकाबले को बहुकोणीय बना सकती है। ऐसी स्थिति में वोटों का विभाजन चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि यह विभाजन किसके पक्ष में जाएगा, इसका अनुमान पहले से नहीं लगाया जा सकता। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भाजपा के पास उत्तर प्रदेश में पहले से कई सहयोगी दल हैं। अपना दल (सोनेलाल), निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल जैसे दलों की अपनी सामाजिक और क्षेत्रीय ताकत है। इन सभी सहयोगियों को सीटें देनी हैं। ऐसे में चिराग पासवान को पर्याप्त सीटें देना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। कुल मिलाकर एलजेपी को 10 सीटें देना भी भाजपा के लिए मुश्किल समझौता हो सकता है और उसे दो सीटें तक मिलना अधिक व्यावहारिक हो सकता है। यह उनका राजनीतिक आकलन है, कोई घोषित सीट बंटवारा नहीं।
बिहार की सफलता और यूपी की हकीकत में बड़ा अंतर
चिराग पासवान की राजनीतिक ताकत को समझने के लिए बिहार के चुनावी प्रदर्शन पर नजर डालना जरूरी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने पांच सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी पांचों पर जीत हासिल की। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 29 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 19 सीटें जीतीं। उसका स्ट्राइक रेट करीब 66 फीसदी रहा। नागालैंड में भी पार्टी ने 2023 के विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। लेकिन उत्तर प्रदेश में तस्वीर बिल्कुल अलग है।रामविलास पासवान के नेतृत्व में अविभाजित लोक जनशक्ति पार्टी ने 2002 के विधानसभा चुनाव में एक सीट जीती थी। इसके बाद 2007 और 2012 के चुनावों में पार्टी को सफलता नहीं मिली। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एलजेपी (रामविलास) ने कोई सीट नहीं जीती और उसका वोट प्रतिशत महज 0.01 फीसदी रहा। इसलिए बिहार में मिली सफलता को उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं माना जा सकता। चिराग को यहां न केवल संगठन खड़ा करना होगा, बल्कि ऐसा स्थानीय नेतृत्व भी तैयार करना होगा जिसकी अपने क्षेत्रों में पहचान और स्वीकार्यता हो।
100 सीटों पर पासी मतदाताओं के बीच संगठन मजबूत करने की योजना
एलजेपी (रामविलास) उत्तर प्रदेश में संगठन विस्तार के लिए चार क्षेत्रों में काम कर रही है। इनमें पूर्वांचल, अवध, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड शामिल हैं। इन क्षेत्रों के लिए अलग-अलग क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाए गए हैं। पार्टी ने अवध और पूर्वांचल की करीब 100 विधानसभा सीटों पर पासी आबादी को ध्यान में रखकर संगठनात्मक काम करने की योजना बनाई है। उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रभारी और सांसद अरुण भारती ने कहा था कि फिलहाल पार्टी सभी 403 सीटों की तैयारी कर रही है। चुनाव के नजदीक आने पर ही अंतिम फैसला होगा कि कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारे जाएंगे। पार्टी की ओर से कम से कम 20 रैलियों और कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है। इनमें चिराग पासवान की भागीदारी होगी। वाराणसी, गोरखपुर और कानपुर जैसे शहरों में भी कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। प्रयागराज में 27 सितंबर को 'यूथ बोले तो' कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसके जरिए युवाओं और खासकर जेनरेशन-जी तक पहुंचने की कोशिश की गई। पार्टी 28 नवंबर को लखनऊ में अपना स्थापना दिवस भी मनाने जा रही है। ये कार्यक्रम बताते हैं कि पार्टी केवल चुनावी घोषणा नहीं कर रही, बल्कि उत्तर प्रदेश में अपनी संगठनात्मक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश भी कर रही है।सबसे बड़ा सवाल: क्या चिराग यूपी में अपनी राजनीतिक जमीन बना पाएंगे?
चिराग पासवान के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं।
- पहली चुनौती संगठन की है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में 403 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए बूथ स्तर तक मजबूत संगठन चाहिए। फिलहाल पार्टी की ऐसी मौजूदगी का कोई चुनावी प्रमाण नहीं है।
- दूसरी चुनौती सामाजिक आधार की है। बिहार के दुसाध-पासवान वोट बैंक को उत्तर प्रदेश के पासी समुदाय के साथ जोड़ना आसान नहीं होगा। दोनों समुदायों की अपनी सामाजिक और राजनीतिक पहचान है।
- तीसरी चुनौती गठबंधन की है। भाजपा के साथ रहते हुए चिराग को कितनी सीटें मिलेंगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। दूसरी तरफ अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में पार्टी के पास कितनी सीटों पर मजबूत उम्मीदवार और प्रभावी संगठन होगा, यह भी बड़ा सवाल है।
यहां एक चौथा राजनीतिक पहलू भी है। चिराग पासवान केंद्र सरकार में मंत्री हैं और एनडीए के महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। लेकिन वह समय-समय पर कुछ मुद्दों पर भाजपा से अलग राय भी रखते रहे हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश में उनकी सक्रियता को केवल भाजपा की रणनीति का हिस्सा मानना भी सही नहीं होगा। वह अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को भी विस्तार देना चाहते हैं।
असली लड़ाई राजनीतिक हिस्सेदारी की
चिराग पासवान का 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का बयान पहली नजर में एक बड़े राजनीतिक विस्तार की घोषणा लगता है। लेकिन इसके पीछे तीन स्तरों पर राजनीति दिखाई देती है। एक तरफ वह बसपा के कमजोर होते जनाधार में अपने लिए जगह तलाश रहे हैं। दूसरी तरफ अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। तीसरी तरफ भाजपा को यह संदेश दे रहे हैं कि एलजेपी (रामविलास) को एनडीए में केवल बिहार तक सीमित सहयोगी नहीं समझा जाए। इसलिए सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा को अंतिम चुनावी फैसला मानना जल्दबाजी होगी। खुद चिराग ने गठबंधन की संभावना खुली रखी है और कहा है कि औपचारिक बातचीत अभी शुरू नहीं हुई है। संभव है कि 403 सीटों की तैयारी का वास्तविक उद्देश्य कुछ चुनिंदा सीटों पर प्रभावी दावेदारी और भाजपा से बेहतर सीट बंटवारा हासिल करना हो। उत्तर प्रदेश की 2027 की लड़ाई में चिराग पासवान कितनी सीटें जीतेंगे, यह अभी दूर की बात है। फिलहाल उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा यह है कि क्या वह बिहार की अपनी पहचान को उत्तर प्रदेश की जटिल दलित राजनीति में बदल पाएंगे? यही तय करेगा कि चिराग पासवान उत्तर प्रदेश में एक नए राजनीतिक खिलाड़ी बनेंगे या एनडीए के भीतर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने वाले एक और सहयोगी साबित होंगे।