भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुई न्यूक्लियर डील का श्रेय लेने को लेकर कांग्रेस और बीजेपी भिड़ गई हैं। बीजेपी ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की उपलब्धि बताई तो कांग्रेस ने जवाब दिया कि ऑस्ट्रेलिया द्वारा भारत को यूरेनियम बेचने का फ़ैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपलब्धि नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत यूपीए सरकार के समय ही हो गई थी। बीजेपी का दावा है कि समझौते को जमीन पर लागू करने का काम मोदी सरकार ने किया।

पीएम मोदी के ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर एक दिन पहले ही भारत और ऑस्ट्रेलिया ने कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें असैन्य परमाणु ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा, अहम खनिज, साइबर सुरक्षा और रक्षा सहयोग जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इन समझौतों के तहत ऑस्ट्रेलिया अब भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए व्यावसायिक रूप से यूरेनियम की आपूर्ति कर सकेगा। इसी मुद्दे पर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच विवाद शुरू हो गया है।
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बीजेपी के किस बयान पर शुरू हुआ विवाद?

विवाद की शुरुआत बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय के बयान से हुई। उन्होंने कहा था कि 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम देने से इनकार कर दिया था क्योंकि भारत परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी का सदस्य नहीं है। मालवीय ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक स्थिति मज़बूत हुई और अब ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम देने के लिए तैयार हुआ है।

उन्होंने कहा कि यह केवल यूरेनियम का समझौता नहीं, बल्कि दुनिया में भारत की बढ़ती रणनीतिक साख का प्रमाण है।

कांग्रेस ने किया बीजेपी के दावे को खारिज

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बीजेपी के उस दावे को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आपूर्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक सफलता है। जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा कि 4 दिसंबर 2011 को तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने अपनी लेबर पार्टी से भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी हासिल कर ली थी।
उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला अक्टूबर 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद संभव हुआ था। कांग्रेस का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया का नीति परिवर्तन मोदी सरकार के आने से पहले ही हो चुका था, इसलिए इसका पूरा श्रेय वर्तमान सरकार को देना सही नहीं है।

बीजेपी ने कांग्रेस के दावे का कैसे जवाब दिया?

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय समझौते राजनीतिक दल नहीं बल्कि सरकारें करती हैं और उन्हें लागू भी सरकारें ही करती हैं। उन्होंने कहा कि अगर 2011 में ही सब कुछ तय हो गया था तो फिर 2011 से 2014 के बीच भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की आपूर्ति क्यों नहीं हुई?

भंडारी ने दावा किया कि 2012 में भी ऑस्ट्रेलिया ने कहा था कि भारत को जल्द यूरेनियम सप्लाई नहीं होगी। भारत-ऑस्ट्रेलिया असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर सितंबर 2014 में मोदी सरकार के दौरान हस्ताक्षर हुए। वर्ष 2026 में इस समझौते को पूरी तरह लागू कर ऑस्ट्रेलिया से दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति सुनिश्चित की गई। उन्होंने कहा कि केवल घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं होता, असली उपलब्धि उसे लागू करने में होती है।
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने दावा किया है कि सितंबर 2014 में ही इस समझौते पर दस्तख़त हो गए थे तो सवाल यह भी उठ रहा है कि फिर इसे 12 साल तक क्यों लटकाए रखा गया?

भारत के लिए यह समझौता क्यों अहम है?

भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए यूरेनियम की नियमित आपूर्ति जरूरी है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है। ऐसे में वहां से मिलने वाली आपूर्ति भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को मजबूती दे सकती है।

दोनों पक्षों के दावे

कांग्रेस का कहना है कि 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते ने रास्ता खोला। 2011 में ऑस्ट्रेलिया की लेबर पार्टी ने भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी दी। इसलिए इसकी बुनियाद यूपीए सरकार के समय रखी गई थी।
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बीजेपी का कहना है कि नीति संबंधी चर्चा और वास्तविक आपूर्ति में अंतर है। समझौते को लागू करना और यूरेनियम की आपूर्ति शुरू कराना मोदी सरकार की उपलब्धि है। अंतरराष्ट्रीय समझौतों का मूल्यांकन उनके क्रियान्वयन से होना चाहिए।

भारत-ऑस्ट्रेलिया परमाणु सहयोग समझौते को लेकर अब दोनों दल अपने-अपने दौर की सरकारों को श्रेय देने की कोशिश कर रहे हैं। एक ओर कांग्रेस इसे यूपीए सरकार की विदेश नीति की सफलता बता रही है, वहीं बीजेपी का कहना है कि इस समझौते को वास्तविक रूप देने और उसे लागू करने का काम मोदी सरकार ने किया है।