2000 रुपये से अधिक के मर्चेंट UPI भुगतान पर लगाए जाने वाले शुल्क को कांग्रेस ने मोदी सरकार की ‘जेब काटो योजना’क़रार दिया है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर यह हमला तब किया जब सरकार ने घोषणा की है कि यूपीआई से एक बार में 2000 रुपये से ज़्यादा की खरीदारी की तो 0.4 फीसदी शुल्क लगेगा। यानी यदि आपने किसी व्यापारी को 5000 रुपये का यूपीआई भुगतान किया तो 40 रुपये का शुल्क लगेगा।

मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर के रूप में लगाए जाने वाले इस शुल्क की घोषणा के बाद कांग्रेस ने इस फैसले को 'द ग्रेट UPI लूट' क़रार दिया।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार भले ही कह रही है कि UPI इस्तेमाल करने वाले ग्राहक से सीधे कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन मर्चेंट पर लगने वाला शुल्क आख़िरकार सामान और सेवाओं की कीमतों के ज़रिए ग्राहक तक पहुंच सकता है।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने दावा किया कि 2,000 रुपये से ज्यादा के मर्चेंट UPI लेनदेन की संख्या भले ही कुल लेनदेन का करीब 5 प्रतिशत हो, लेकिन इनके जरिए होने वाली कुल UPI लेनदेन की रकम का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा आता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था से बड़े मूल्य वाले डिजिटल भुगतान पर शुल्क लगाने का रास्ता खोल दिया गया है।
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‘UPI में मोदी की लूट शुरू’

कांग्रेस ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सरकार के फैसले पर हमला करते हुए इसे 'UPI में मोदी की लूट' बताया। पार्टी का कहना है कि 15 अक्टूबर से मर्चेंट यूपीआई भुगतान पर नई शुल्क व्यवस्था लागू होगी।

इसका तर्क है कि अगर किसी व्यापारी को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए अतिरिक्त लागत उठानी पड़ेगी तो वह लागत किसी न किसी रूप में अपने कारोबार में समायोजित कर सकता है। इसका एक संभावित तरीका उत्पाद या सेवा की कीमत बढ़ाना हो सकता है।

दुकानदार पर फीस लगेगी तो पैसा कहां से आएगा?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार पर यूपीआई की जीरो शुल्क या एमडीआर व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप लगाया। राहुल गांधी ने कहा कि सरकार का कहना है कि ग्राहक से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन अगर दुकानदार पर शुल्क लगाया जाएगा तो सवाल है कि उस शुल्क का भार आखिर कहां जाएगा। उनका तर्क है कि व्यापारी इस लागत को कीमतों में जोड़ सकते हैं और इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से ग्राहक की जेब पर बोझ पड़ सकता है।

अमेरिका का दबाव: राहुल

राहुल गांधी ने यह भी दावा किया कि 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन संख्या के लिहाज से कम हैं, लेकिन कुल यूपीआई लेनदेन के मूल्य में उनका हिस्सा काफी बड़ा है। इसलिए उनका कहना है कि सरकार ने बड़े डिजिटल भुगतानों के लिए शुल्क का रास्ता खोल दिया है। उन्होंने अमेरिकी भुगतान कंपनियों का भी जिक्र किया और आरोप लगाया कि ये कंपनियां लंबे समय से भारत की जीरो-MDR नीति का विरोध करती रही हैं।
राहुल गांधी ने इसे अमेरिकी दबाव से जोड़ते हुए मोदी सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला किया और आरोप लगाया कि सरकार अमेरिकी कंपनियों के हितों के सामने झुक रही है। 

खड़गे बोले- ‘मोदी सरकार की लूट UPI तक पहुंच गई’

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सरकार पर हमला करते हुए कहा कि अब 'मोदी सरकार की लूट UPI तक पहुंच गई है।' उन्होंने कहा कि पहले नीति को इस तरह पेश किया जाता था कि यूपीआई पर कोई शुल्क नहीं होगा, लेकिन अब व्यवस्था बदलकर 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेनदेन को शुल्क से मुक्त रखने की बात कही जा रही है।

खड़गे ने महंगाई का मुद्दा उठाते हुए कहा कि आम आदमी की जेब पहले ही खाली है और ऐसे समय में डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त लागत डालने की तैयारी की जा रही है। उन्होंने इसे 'डिजिटल पेमेंट्स टैक्स' जैसा बताया।

नोटबंदी, डिजिटल पेमेंट का मुद्दा भी उठाया

मल्लिकार्जुन खड़गे ने यूपीआई शुल्क के मुद्दे को 2016 की नोटबंदी से जोड़ा। उन्होंने कहा कि नोटबंदी के समय सरकार की ओर से डिजिटल भुगतान और कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की बात कही गई थी। उनका सवाल है कि अगर डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना उद्देश्य था तो अब उसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर शुल्क क्यों लगाया जा रहा है। खड़गे ने यह भी कहा कि वित्त मंत्री ने संसद में यूपीआई पर टैक्स या शुल्क नहीं लगाने की बात कही थी।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने 6 अगस्त 2026 को ही यूपीआई पर शुल्क लगाए जाने की संभावित दिशा को लेकर चेतावनी दी थी। उनके मुताबिक, सरकार अब संशोधित पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 के तहत जारी अधिसूचना का इस्तेमाल करते हुए यूपीआई पर शुल्क लगाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। जयराम रमेश इसे पारदर्शिता की कमी बताया और कहा कि सरकार ने UPI उपयोगकर्ताओं का भरोसा तोड़ा है।

AAP ने भी सरकार पर साधा निशाना

आम आदमी पार्टी ने भी इस फैसले को लेकर मोदी सरकार पर हमला किया है। आप ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने का रास्ता खोल दिया है। आप का आरोप है कि यूपीआई भारत में डिजिटल भुगतान की सबसे लोकप्रिय व्यवस्थाओं में से एक है और इस पर शुल्क की व्यवस्था आम लोगों तथा कारोबारियों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है।
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कितना शुल्क लगेगा

नए फ्रेमवर्क के मुताबिक सामान्य मर्चेंट को 2000 रुपये से अधिक का यूपीआई भुगतान मिलने पर लेनदेन की राशि का 0.4 प्रतिशत एमडीआर यानी शुल्क देना होगा। मिसाल के तौर पर अगर किसी व्यापारी को 5000 रुपये का यूपीआई भुगतान मिलता है तो 0.4 प्रतिशत के हिसाब से एमडीआर यानी 20 रुपये होगा। इसी तरह 10000 रुपये के भुगतान पर शुल्क 40 रुपये होगा। लेकिन इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है। इसलिए बहुत बड़ी रकम के भुगतान पर भी एमडीआर 300 रुपये से ज्यादा नहीं होगा। मसलन, 75000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत की गणना 300 रुपये से ज्यादा हो सकती है, लेकिन व्यापारी से अधिकतम 300 रुपये ही एमडीआर लिया जाएगा।

एनपीसीआई ने कुछ खास मर्चेंट कैटेगरी के लिए प्रतिशत आधारित शुल्क के बजाय फ्लैट एमडीआर तय किया है। रेलवे, टेलीकॉम सर्विस, इंश्योरेंस, फ्यूल और कुछ अन्य श्रेणियों में 2000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 5 रुपये प्रति लेनदेन का फ्लैट शुल्क लगेगा।
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UPI शुल्क पर राजनीति क्यों गरमाई?

यूपीआई भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण सफलताओं में से एक माना जाता है। लंबे समय से छोटे-बड़े भुगतान बिना सीधे ग्राहक शुल्क के किए जाते रहे हैं। अब 2000 रुपये से ऊपर के कुछ मर्चेंट भुगतान पर एमडीआर की व्यवस्था ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।

विवाद केवल 0.4 प्रतिशत शुल्क का नहीं है। असली राजनीतिक सवाल यह है कि क्या डिजिटल भुगतान की लागत अब धीरे-धीरे कारोबारियों के रास्ते उपभोक्ताओं तक पहुंचेगी और क्या आज की 2,000 रुपये की सीमा भविष्य में बदली जा सकती है?