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पैसे की कमी से जूझ रही कांग्रेस, एक-एक रुपया बचाने की कोशिश 

पैसे की कमी से जूझ रही कांग्रेस ने अपने सांसदों से कहा है कि वे पार्टी के खजाने में हर साल 50 हज़ार रुपये दें। पार्टी के कोषाध्यक्ष सुनील बंसल ने पार्टी के खजाने को भरने के लिए तमाम बड़े क़दम उठाने का एलान किया है। इसमें कॉस्ट कटिंग भी शामिल है। 

पवन बंसल ने कहा है कि हमें ख़र्च को कम रखना है और वे एक-एक रुपया बचाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस ने पार्टी के सचिवों से लेकर राष्ट्रीय महासचिवों तक से इन क़दमों को मानने की अपील की है। 

इन क़दमों के तहत सचिवों से कहा गया है कि वे ट्रेन से यात्रा करें जबकि ऐसे महासचिव जो सांसद भी हैं, उनसे कहा गया है कि वे उन्हें मिलने वाले हवाई भत्तों का इस्तेमाल करें। 

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एनडीटीवी के मुताबिक़, “एआईसीसी के सचिवों को 1400 किमी। की दूरी तक का ट्रेन का भत्ता दिया जाएगा। महीने में दो बार ही हवाई भत्ता दिया जाएगा और अगर ट्रेन का किराया हवाई किराये से ज़्यादा है तो सचिव हवाई यात्रा का विकल्प चुन सकते हैं।” यह भी कहा गया है कि एआईसीसी के पदाधिकारी कैंटीन, स्टेशनरी, बिजली, अख़बार, पेट्रोल आदि का ख़र्च कम से कम करें। 

सचिवों और महासचिवों को मिलने वाले भत्तों में क्रमश: 12 व 15 हज़ार रुपये की कटौती की गई है। 

76 फ़ीसदी बॉन्ड बीजेपी को 

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2019-20 में कांग्रेस को मिलने  वाले चुनावी बॉन्ड में 17 फ़ीसदी की गिरावट आई है। एक ओर कांग्रेस का तो चुनावी बॉन्ड गिरा है लेकिन बीजेपी को साल 2019-20 में कुल बॉन्ड का 76 फ़ीसदी पैसा मिला है। कुल 3,355 करोड़ में से बीजेपी को 2,555 करोड़ का बॉन्ड मिला है। बीजेपी को पिछले साल मिले बॉन्ड में 75 फ़ीसदी का उछाल आया है। 

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चुनावी बॉन्ड पर सवाल

जब से राजनीतिक चंदे के एक उपकरण के तौर पर चुनावी बॉन्ड को पेश किया गया है तब से इसकी आलोचना की जाती रही है। यह कहा जाता रहा है कि इस चुनावी बॉन्ड से काला धन राजनीतिक दलों के पास पहुंचता है। चुनावी बॉन्ड दरअसल एक तरह का वित्तीय साधन है, जिससे कोई भी किसी राजनीतिक दल को चंदा दे सकता है।

अमेरिका, ब्रिटेन, स्वीडन में राजनीतिक चंदा देने वाले को अपनी पहचान को सार्वजनिक करना होता है, लेकिन भारत में नहीं। 

भारत की जन प्रतिनिधि क़ानून की धारा 29 सी के अनुसार, 20,000 रुपये से ज़्यादा चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी। लेकिन, वित्तीय अधिनियम 2017 के क्लॉज़ 135 और 136 के तहत इलेक्टोरल बॉन्ड को इससे बाहर रखा गया है।

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