स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पहली बार ऐसे चौंका देने वाले घटनाक्रम का देश को साक्षी बनना पड़ रहा है ! दुनिया की किसी अन्य लोकतान्त्रिक प्रणाली में इस तरह के निलंबन और बिना बहस-संशोधनों के विधेयकों को क़ानूनों में बदल देने की कार्रवाई कभी देखी नहीं गई। सिर्फ़ अधिनायकवादी हुकूमतों में ही एक व्यक्ति का राज चलता है। वही संसद होता है और उसका हर कहा क़ानून बन जाता है।
विपक्षी सांसद सरकार से आख़िर माँग क्या रहे थे ? उनकी माँग सिर्फ़ इतनी थी कि 13 दिसंबर 2023 के दिन संसद भवन के सुरक्षा कवच में जो गंभीर सेंध लगी उस पर देश के शीर्ष नेतृत्व को सदन में वक्तव्य देना चाहिए। देश की जनता को बताया जाना चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देकर दो युवा कैसे संसद के भीतर तक पहुँचने में कामयाब हो गए ! विपक्ष की माँग का जवाब घटना पर कोई वक्तव्य देने के बजाय सांसदों के निलंबन की कार्रवाई से दिया गया। चिंता का विषय हो सकता है अगर विपक्ष के प्रति कार्रवाई की आड़ में जनता को भी कोई संदेश दिया जा रहा हो ! संदेश यह कि पुराना जो कुछ भी है वह समाप्त किए जाने के कगार पर है !
दूसरा और ज़्यादा विश्वसनीय कारण सत्तारूढ़ दल का यह डर यह हो सकता है कि ग़ैर-भाजपा दलों को प्राप्त होने वाले साठ प्रतिशत से ज़्यादा मतों का आपस में विभाजन इस बार नहीं हो पाएगा। विपक्ष के मुक़ाबले कम मत प्राप्त होने के बावजूद बहुमत की सरकार बना पाना भाजपा के लिए कठिन साबित हो सकता है। लोकसभा के चुनाव नतीजे हाल के तीन हिन्दी भाषी राज्यों के बजाय तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल-पंजाब की तरह चौंकाने वाले प्राप्त हो सकते हैं। इंडिया गठबंधन की गतिविधियों ने भाजपा को चिंतित कर रखा है। सांसदों के निलंबन के विरोध में 22 दिसंबर को दिल्ली सहित सभी राजधानियों में हुए धरना-प्रदर्शनों का एनडीए जवाब ही नहीं दे पाया। चुनाव पूर्व प्रारंभ होने वाली राहुल गांधी की दूसरी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ कर्नाटक और तेलंगाना के बाद भाजपा की रीढ माने जाने वाले इलाक़ों पर प्रहार कर सकती है।