एमएलसी चुनाव ने दिग्गजों को फिर से रणनीति बनाने पर मजबूर किया
क्या काकरोच आंदोलन और विपक्ष के जमीनी संघर्ष की वजह से राजनीति में हवा बदलती हुई दिख रही है ? क्या ये कहना सही होगा कि मोदी सरकार के लिये आगे के दिन मुश्किल भरे होंगे ? क्या यूपी विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के लिये संकट का सबब होगा ? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब आज लोग खोज रहे हैं । ऐसे में कुछ लोगों को ये उम्मीद थी कि शायद विधान परिषद की 28 सीटों के चुनाव के नतीजे हवा का रुख बताये । ऐसे तमाम लोगों को निराशा हाथ लगेगी । लेकिन कांग्रेस से बड़ी उम्मीद लगाये बैठे लोग फिर हताश होंगे । कांग्रेस इस चुनाव में सबसे ज़्यादा घाटे में दिखाई पड़ रही है । कर्नाटक और बिहार में उसका खाता तक नहीं खुला ।
कर्नाटक जहां कांग्रेस की सरकार है और अभी हाल में पार्टी ने अपना मुख्यमंत्री बदला है, को जोर का झटका लगा है । पार्टी ने सिद्धारमैया को हटाकर डी के शिवकुमार को कुर्सी सौंपी । शिवकुमार की शोहरत एक आक्रामक नेता और बड़े संगठनकर्ता की है । लेकिन उनके नेतृत्व में पार्टी चारों सीट हार गई । बीजेपी जेडीएस गठबंधन ने सारी सीटों पर बाज़ी मार ली है । तीन पर बीजेपी को और एक पर जेडीएस को जीत मिली है । ये तब हुआ जब राज्य में बीजेपी संगठन की हालत ठीक नहीं है और पार्टी अध्यक्ष विजयेंद्र को लेकर भारी धडे़बंदी है । तो क्या कांग्रेस ने सिद्धारमैया को हटाकर राजनीतिक गलती की है, ये सवाल अब राजनीतिक गलियारों में शिद्दत से पूछा जायेगा।
इसी तरह बिहार में भी बड़ा सवाल है कि क्या नीतीश की जगह सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना सही फैसला था ? बिहार से बीजेपी के लिये अच्छी खबर नहीं है । प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी एक नये विकल्प के तौर पर उभर सकती है और प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं । प्रशांत ने पहले बांकीपुर में बीजेपी के पैर से ज़मीन छिटकाई और अब विधान परिषद के चुनाव में एक सीट जीत कर भविष्य के संकेत दे दिये हैं। आरजेडी और कांग्रेस को अपने आपसी झगड़े से फुर्सत नहीं है । कांग्रेस को यहां भी निराशा हाथ लगी है । बीजेपी को राज्य में नीतीश जैसा नेता खोजना पड़ेगा नहीं तो प्रशांत किशोर बीजेपी के पैरों के नीचे से ज़मीन खींच लेंगे और पार्टी को पता भी नहीं चलेगा।
मौजूदा राजनीतिक कोलाहल में यूपी पर सबकी नज़र है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में क्या होगा ? क्या योगी को तीसरा टर्म मिलेगा या फिर अखिलेश यादव तीसरी बार भाग्यशाली साबित होंगे । योगी के अपने भविष्य के लिये यूपी का चुनाव बेहद अहम है । वो चुनाव हारना एफोर्ड नहीं कर सकते । पार्टी इस वक्त एक बड़े मंथन के दौर से गुजर रही है । प्रधानमंत्री मोदी के बाद की राजनीति में नये चेहरों और नेताओं पर अटकलों का दौर जारी है ।
योगी इस राजनीति में खुद को मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में देखना पसंद करेंगे । लेकिन जिस तरह दिल्ली में हालात तेज़ी से बदल रहे हैं वैसे में योगी को अतिरिक्त मेहनत करनी होगी। ये मान कर चलने से काम नहीं चलेगा कि उनकी जीत पक्की है । विधान परिषद की 11 सीटों पर वोट पड़े । बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर बढ़त बनायी है । योगी ये तर्क दे सकते हैं कि पार्टी को अधिक परेशान होने की आवश्यकता नहीं है । लेकिन ये वहीं भूलना चाहिये कि वाराणसी में बीजेपी को मुँह की खानी पड़ी । पार्टी प्रधानमंत्री के क्षेत्र में हार गई।
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यूपी में अप्रत्याशित पराजय का सामना करना पड़ा था । जिस प्रदेश में उसे 70 से अधिक सीट जीतने की उम्मीद थी, वहाँ वो 33 पर सिमट गई और समाजवादी पार्टी को 37 सीटों पर कामयाबी मिली । पार्टी अयोध्या में हार गई । और वाराणसी में प्रधानमंत्री की जीत का मार्जिन काफी घट गया । ऐसे में फिर विधान परिषद के चुनाव में वाराणसी में बीजेपी का हारना और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार का जीतना किसी भी कोण से शुभ संकेत नहीं है । कम से कम प्रधानमंत्री के क्षेत्र में बीजेपी को नहीं हारना चाहिये । इसी के साथ गोरखपुर में पार्टी के उम्मीदवार की जीत की भी चीर फाड़ होगी और दोनों क्षेत्रों में जीत हार की विवेचना अलग ढंग से की जायेगी ।
महाराष्ट्र में अभी भी महायुति का दबदबा है । हालाँकि बीजेपी, एनसीपी और शिव सेना शिंदे गुट में आपसी खींचतान की खबरें हैं । लेकिन सामने विपक्ष बुरी तरह से पस्त पड़ा है । उद्धव ठाकरे की शिवसेना हो या फिर शरद पवार कहीं कोई राजनीतिक पहल दिखाई नहीं पड़ रही है । इसका असर विधान परिषद की पांच सीटों पर हुए चुनाव में साफ देखा जा सकता है । पांच सीटों के नतीजों के मुताबिक महायुति को साफ बढ़त है ।
जहां एनसीपी शरद पवार का प्रदर्शन बेहतर हैं वहीं कांग्रेस को नागपुर में कामयाबी पार्टी को सांत्वना दे सकती है, क्या ये काफी होगा ? इशारा साफ है कि महाराष्ट्र विकास अघाड़ी को नये सिरे से खुद को खड़ा करना पड़ेगा । कांग्रेस को महाराष्ट्र में लीड लेनी पड़ेगी, नये सिरे से खुद की ज़मीन तलाशनी पड़ेगी । वैसे भी शरद पवार की भी उम्र हो गई है और उद्धव की निष्क्रियता कोई हौसला नहीं देती ।
हालाँकि विधान परिषद के चुनावों के आधार पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना ग़लत होगा। इन चुनावों का दायरा बहुत की सीमित होता है । शहरी और पढ़े लिखे मतदाता ही इसमें हिस्सा लेते हैं । इन नतीजों के संदर्भ में गाँव और सुदूर इलाकों के मतदाताओं के रुख का अंदाज़ा लगाना या कोई आख़िरी टिप्पणी करना उचित नहीं होगा । फिर ये चुनाव वैसे भी बेहद लोकल होते हैं । लोकल समीकरण काफी मायने रखते हैं । इन चुनावों के जरिये न तो मुख्यमंत्री का चयन होता है और न ही प्रधानमंत्री का, कि वोटर चुनावों को गंभीरता से लें और अपनी नाराजगी का इज़हार सत्ता के खिलाफ या पक्ष में करे । लेकिन कांग्रेस के लिये खबर अच्छी नहीं है ।
राहुल गांधी की तमाम आक्रामकता के बावजूद भी पार्टी को फायदा क्यों नहीं हुआ ? ये सवाल उसे मथना चाहिये । अन्यथा राहुल की सारी मेहनत बेकार हो जायेगी । इन चुनावों से बीजेपी का मनोबल जरूर बढ़ा होगा । फिर भी अभी दिल्ली बहुत दूर है । उसके पहले लखनऊ की जंग है । अभी तो पार्टी शुरू हुई है । फिल्म अभी बाकी है ।