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मूर्ख़तापूर्ण है 'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' का विरोध

एक निहायत बकवास फ़िल्म आई थी जिसका नाम था ‘पद्मावत’। इस फ़िल्म को बनाने वाले हैं संजय लीला भंसाली। वैसे तो अच्छे फ़िल्मकार हैं पर लगता है यह फ़िल्म बनाते हुए उनकी अक़्ल कहीं निकल ली थी। फ़िल्म सौ प्रतिशत फ़्लॉप होती पर बीच में कूद पड़ी करणी सेना। कहने लगी कि इस फ़िल्म में राजपूत रानी पद्मावती का अपमान किया गया है। हक़ीकत यह है कि पद्मावती राजपूत नहीं थी, वह श्रीलंका की थी। सिंहला थी। राजपूत राजा से उनका ब्याह हुआ था। 
आशुतोष

अमेरिकी राष्ट्रपति बेंजामिन फ़्रैंकलिन कहते थे- “जो लोग थोड़ी-सी सुरक्षा के लिये स्वतंत्रता को छोड़ देते हैं वे न तो सुरक्षा के हक़दार हैं और न ही स्वतंत्रता के।” आज के हुक़्मरानों और तथाकथित देश-भक्त जनता को बेंजामिन की बातें शायद बेहूदा और बकवास लगे। लेकिन अगर भारत देश ने लोकतंत्र को चुना है तो उसे यह सोचना चाहिये कि हर कुछ समय के बाद यह मूर्ख़ता क्यों की जाती है कि फलाँ फ़िल्म पर बैन लगनी चाहिये, फलाँ पेंटिंग से किसी की धार्मिक भावनाएँ आहत हो रही हैं? किसी की जातिगत भावना आहत हो रही है या किसी की हिंदू भावना, किसी की मुसलिम भावना पर आघात हो रहा है तो किसी को लग रहा है कि उसके ख़ानदान पर चोट की जा रही है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिनको सेक्स से ही एतराज़ है क्योंकि फ़िल्मों में ‘ग़लत’ तरह से दिखाया जा रहा है, या फिर समलैंगिकता को इतनी तवज्ज़ो क्यों दी जा रही है? और तो और एक नया बहाना चल निकला है, राष्ट्रवाद के नाम पर, जन गण मन के नाम पर, वंतेमातरम के नाम पर। सब एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू हैं। ऐसा लग रहा कि भावनाएँ न हुईं किसी देवदास का दिल हो गया जो ज़रा-सा लरजते ही टूट जाता है। मुझे लगता है कि पिछले कुछ सालों में एक समाज के स्तर पर जहाँ हम आसमान की नई बुलंदियों को छूने का प्रयास कर रहे हैं वहीं एक ऐसा समाज भी हमारे बीच खड़ा हो रहा है जो अपने खोदे कुएँ ये बाहर निकलना ही नहीं चाहता।

ताज़ा उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर बनी फ़िल्म का है। उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब - ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ - पर इसी नाम से बनी फ़िल्म पर बवाल हो रहा है। इस बार कांग्रेसियों की भावनाएँ आहत हो रही हैं। देवदास की तरह उनका दिल टूट रहा है। वे कह रहे हैं कि इस फ़िल्म में सोनिया और राहुल गाँधी को ग़लत तरीके से पेश किया जा रहा है। उनकी छवि को बीजेपी के इशारे पर धूमिल किया जा रहा है। मज़ेदार बात यह है कि इस फ़िल्म में मनमोहन सिंह का रोल किया है अनुपम खेर ने जो मोदी के घनघोर समर्थक हैं। फ़िल्म को को-प्रोड्यूस किया है अशोक पंडित ने। यह शख़्स भी पानी पी-पी कर कांग्रेस को गाली देते रहते हैं।
  • फ़िल्म का तीन मिनट के ट्रेलर को सोशल मीडिया पर बीजेपी के ट्विटर हैंडल से प्रमोट किया गया और ख़ूब प्रमोट किया गया। ऐसे में कांग्रेस ने आरोप लगा दिया कि यह फ़िल्म 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले एक प्रोपगंडा के तौर पर बनाई गई है। कांग्रेस का पक्ष बचकाना है और मूर्ख़तापूर्ण भी।

फ़िल्म से चुनाव प्रभावित?

उनके तर्क का निहितार्थ यह है कि कोई फ़िल्म किसी चुनाव को प्रभावित कर सकती है। वह किसी नेता या पार्टी का भविष्य बना या बिगाड़ सकती है। इसका अर्थ है कि राजनीतिक दल देश की जनता को मूर्ख समझते हैं कि वह पिछले साढ़े चार साल के मोदी के कार्यकलाप की जगह फ़िल्म देख कर देश की क़िस्मत तय करेगी। अगर ऐसा है तो फिर कांग्रेस को फ़ौरन इस फ़िल्म के जवाब में मोदी पर एक फ़िल्म बनवा लेनी चाहिये और मोदी की क़िस्मत को तय कर देना चाहिये। हक़ीकत यह है कि कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की दिलचस्पी देश के असली मुद्दों की तरफ़ नहीं है। इसलिये उसे नक़ली मुद्दे चाहिये। वे मुद्दे जो लोगों की भावनाओं को भड़काएँ। वास्तव में ऐसा होता नहीं है।

‘पद्मावत’ को रोक दिया था बीजेपी सरकारों ने

आपको याद होगा, कुछ महीने पहले एक निहायत बकवास फ़िल्म आई थी जिसका नाम था ‘पद्मावत’। इस फ़िल्म को बनाने वाले हैं संजय लीला भंसाली। वैसे तो अच्छे फ़िल्मकार हैं पर लगता है यह फ़िल्म बनाते हुए उनकी अक़्ल कहीं निकल ली थी। फ़िल्म सौ प्रतिशत फ़्लॉप होती पर बीच में कूद पड़ी करणी सेना। कहने लगी कि इस फ़िल्म में राजपूत रानी पद्मावती का अपमान किया गया है। हक़ीकत यह है कि पद्मावती राजपूत नहीं थी, वह श्रीलंका की थी। सिंहला थी। राजपूत राजा से उनका ब्याह हुआ था। कई महीने तक बवाल हुआ। सेट पर आग लगा दी गई। संजय लीला भंसाली को पीट दिया गया। 

'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' से पहले ‘पद्मावत’ का मामला इतना भड़का या भड़काया गया कि बीजेपी की सरकारों ने गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और हरियाणा में फ़िल्म दिखाने पर रोक लगा दी। क़ानून और व्यवस्था का गंभीर संकट खड़ा हो गया।

सुप्रीम कोर्ट से जब फटकार लगी तो अक़्ल ठिकाने आई। फ़िल्म को इतनी पब्लिसिटी मिली कि फ़िल्म हिट हो गई। तीन चीज़ें साबित हुईं।

  1. फ़िल्म सफल करनी हो तो विवाद खड़ा कर दो। दो-चार को पीट-पाट दो, पोस्टर फाड़ दो। बस। 
  2. चंद मुट्ठी भर लोग पूरी राज्य-व्यवस्था को अपनी उँगली पर नचा सकते हैं। करणी सेना का कोई जनाधार नहीं है पर पूरे देश में कोहराम मचा दिया। बहुसंख्यक लोग असहाय देखते रहे।
  3. देश की राज्य और केंद्र सरकारें इतनी कमज़ोर हैं कि वे बजाय हुड़दंगियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के पैरों के बीच अपनी पूँछ फँसा आत्म समर्पण कर देती हैं। जिस करणी सेना पर पाबंदी लगनी चाहिये वह हीरो बन के निकली। यह दुर्भाग्य है इस देश का। 

राज्य सरकारों का ऐसे लोगों के सामने सरेंडर कोई नई बात नहीं हैं। पहले भी इसी तरह कुछ लोगों ने दीपा मेहता की फ़िल्म ‘फ़ायर’ पर बवाल काटा था। तब भी भारतीय संस्कृति की दुहाई थोड़ा अलग तरह से दी गई थी। ‘फ़ायर’ में दो औरतों के बीच समलैंगिक संबंधों को दिखाया गया था। 1996 की इस फ़िल्म का विरोध किया था हिंदुत्ववादी ताक़तों ने। दीपा मेहता की ही फ़िल्म ‘वाटर’ पर भी हंगामा मचा था। उनके सेट पर आग लगा दी गई। फ़िल्म की शूटिंग श्रीलंका में करना पड़ी थी। पर सबसे ज़्यादा अफ़सोस तब होता है जब सरकार ख़ुद ऐसे तत्वों को बढ़ावा देती है। गुजरात 2002 के नरसंहार के परिप्रेक्ष्य में बनी फ़िल्म ‘परज़ानिया’ को गुजरात में नहीं रिलीज़ करने दिया गया। अदालत के आदेश के बाद भी बीजेपी सरकार के दबाव में सिनेमा हॉ मालिकों ने फ़िल्म सिनेमा हॉल में दिखाने से मना कर दिया था। यही हश्र 1993  मुंबई बम धमाकों पर बनी फ़िल्म ‘ब्लैक फ़्राइडे’ का हुआ। फ़िल्म ऐसी अटकी कि 2005 में रिलीज़ होने वाली फ़िल्म 2007 में रिलीज़ हो पाई। आमिर खान की ‘फ़ना’ को भी राजसत्ता का ग़ुस्सा झेलना पड़ा था। आमिर का गुनाह यह था कि वह नर्मदा आंदोलन के समर्थन में धरने पर बैठे थे। 

कांग्रेस की सरकारों का क़हर ‘आँधी’ पर टूटा था। यह आरोप लगा कर फ़िल्म को रिलीज़ करने से मना कर दिया गया था कि इसमें प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की छवि को धूमिल करने की कोशिश की गई है।

सुचित्रा सेन और संजीव कुमार की यह निहायत ख़ूबसूरत फ़िल्म इंदिरा सरकार की तानाशाही का शिकार तो ज़रूर हुई पर बाद में यही फ़िल्म एक ‘कल्ट’ फ़िल्म साबित हुई। सवाल यह उठता है कि कौन जीता? एक राजनेता या कला? लोगों ने कला को सराहा। लोग आज भी गुनगुनाते हैं- “तेरे बिना ज़िंदगी से शिकवा तो नहीं, शिकवा नहीं।” इंदिरा की कांग्रेस हार गई, गुलज़ार की फ़िल्म जीत गई। “क़िस्सा कुर्सी का” फ़िल्म के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया। वैसे यह बताते चलें कि आज़ादी के पहले भी फ़िल्मों से हुक़्मरान हल्कान होते रहे हैं। 1921 में “भक्त विदुर” को अंग्रेज़ों ने बैन किया था। अंग्रेज़ों को लगा था कि जलियाँवाला बाग़ के बाद बनी यह फ़िल्म लोगों को भड़का सकती है।

1921 से लेकर अभी तक देश नहीं बदला है। न ही बदली है देश की सत्ता और कुछ लोगों का मिज़ाज। हाँ, मुद्दे ज़रूर थोड़े बदल गए हैं। आजकल लव जिहाद बड़ा मुद्दा है। जिसे बेवक़ूफ़ी की इंतहा कहा जा सकता है।

ताज़ा फिल्म “केदारनाथ” पर कुछ लोगों को इसलिये एतराज़ हो गया कि इसमें एक मुसलिम लड़के को एक हिंदू लड़की से प्यार करते दिखाया गया है। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को ज़बरदस्त फटकार लगाई। ऐसी ही याचिका गुजरात हाई कोर्ट में भी लगी थी। अदालत ने पाँच हज़ार रुपये का जुर्माना ठोक दिया। कोर्ट ने कहा कि देश में लोकतंत्र है और हर आदमी स्वतंत्र है अपने अधिकारों के इस्तेमाल के लिये। पर हक़ीकत में क्या ऐसा हो पाता है? चंद लोगों की बेवक़ूफ़ियों का सिला पूरे देश को देना होता है। जाने कब लोगों को अक़्ल आएगी। जाने कब सही में लोगों को लोकतंत्र का मतलब समझ में आएगा।

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