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न्यायपालिका, प्रेस, चुनाव आयोग तटस्थ नहीं रहे : राहुल

राहुल गाँधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा वापस लेने से इनकार करते हुए एक चिट्ठी लिखी। यह चिट्ठी कांग्रेस के लोगों के लिए है, लेकिन इसमें आरएसएस, बीजेपी और नरेंद्र मोदी पर ज़ोरदार हमले किए और उन्हें भारतीयता के सिद्धान्तों के ख़िलाफ बताया। पढ़िए वह चिट्ठी। 
अध्यक्ष होने के नाते 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के लिए मैं ज़िम्मेदार हूँ। भविष्य में  पार्टी के विकास के लिए ज़िम्मेदार तय होना ज़रूरी है, इसी वजह से मैंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ दे दिया है। 

पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए कड़े फ़ैसले लेने की ज़रूरत है, 2019 की हार के लिए कई लोगों को ज़िम्मेदार ठहराना होगा। यह अनुचित होगा कि दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराऊँ और पार्टी अध्यक्ष के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी की अनदेखी करूँ। 

कई सहयोगियों ने मुझे सलाह दी कि मैं कांग्रेस पार्टी का अगला अध्यक्ष मनोनीत करूँ। यह महत्वपूर्ण है कि पार्टी किसी को अध्यक्ष चुने, लेकिन यह मेरे लिए ठीक नहीं होगा कि मैं यह चुनाव करूँ। हमारी पार्टी का गौरवशाली अतीत रहा है, इसकी समृद्ध विरासत रही है, वह संघर्ष और निष्ठा की रही है और मैं उसका बेहद सम्मान करता हूँ। 

मेरा संघर्ष राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए सामान्य लड़ाई नहीं रहा है। मेरे मन में बीजेपी के लिए कोई नफ़रत या ग़ुस्सा नहीं है, पर मेरा रोम रोम भारत के प्रति बीजेपी के विचारों के विरुद्ध रहा है। यह विरोध इसलिए है कि मेरे अस्तित्व में ही उनके विचारों से सीधा टकराव है। यह टकराव नया नहीं है, हमारे देश की सरज़मीन पर यह टकराव हजा़रों साल से चलता आ रहा है। जहाँ वे विभेद देखते हैं, मैं समानता देखता हूँ, वे घृणा देखते हैं, मैं प्रेम देखता हूँ। वे जिनसे डरते हैं, मैं उन्हें अपना लेता हूँ। 

निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए यह ज़रूरी है कि देश के संस्थान तटस्थ रहें, चुनाव पंचों के बिना निष्पक्ष नहीं हो सकता... ये हैं स्वतंत्र प्रेस, निष्पक्ष न्यायपालिका और एक पारदर्शी चुनाव आयोग जो तटस्थ हो।
हमने 2019 में किसी एक राजनीतिक दल के ख़िलाफ़ चुनाव नहीं लड़ा था। हम भारतीय राज्य की मशीनरी से लड़े, जिसकी सारी संस्थानों को विपक्ष के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया गया। यह बिल्कुल साफ़ हो गया है कि संस्थानों की जिस तटस्थता पर हमें नाज़ था, वह अब भारत में नहीं रही।
आरएसएस का उद्येश्य हमारे देश की संस्थानों पर कब्जा कर लेना है। इस तरह देश की सत्ता पर कब्जा कर लेने से अकल्पनीय हिंसा होगी। इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान किसानों, बेरोज़गार युवाओं, महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों को उठाना होगा। अर्थव्यवस्था और देश की प्रतिष्ठा पर इसका बहुत ही बुरा असर पड़ेगा। प्रधानमंत्री पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप उनके जीत जाने से ख़त्म नहीं हो जाते, पैसे और प्रचार के बल पर सच की किरण को नहीं छिपाया जा सकता। 

देश की संस्थानों को फिर से पाने और उनमें प्राण फूँकने के लिए   भारतीय राष्ट्र को एकजुट होना होगा। इसका ज़रिया कांग्रेस पार्टी बनेगी।
इस महत्वपूर्ण काम के लिए कांग्रेस पार्टी को ख़ुद को बिल्कुल बदल देना होगा। आज बीजेपी भारत की जनता की आवाज़ को सुनियोजित तरीके से तहत दबा रही है। यह कांग्रेस पार्टी की ज़िम्मेदारी है कि वह देश के लोगों की आवाज़ के पक्ष में खड़ी हो। भारत कभी भी एक आवाज़ नहीं रहा है और न यह ऐसा हो सकता है। यह हमेशा कई आवाज़ों का मिश्रण रहा है। भारत माता का मतलब यही है।
मैं अपनी पूरी ताक़त से कांग्रेस पार्टी के मूल्यों के लिए लड़ता रहूँगा। मैं किसी तरह की सलाह और जानकारी के लिए हमेशा तैयार रहूँगा। यह देश के लोगों की आदत है कि वे सत्ता पा कर उससे चिपक जाते हैं, कोई सत्ता का त्याग नहीं करता है। पर हम एक गंभीर सैद्धांतिक लड़ाई लड़े बग़ैर और सत्ता पाने की इच्छा का त्याग किए बिना अपने विरोधियों को हरा नहीं सकते। मैं एक कांग्रेसी के रूप में पैदा हुआ और पार्टी मेरे लिए हमेशा जीवन को संचालित करने वाले ख़ून की तरह रही है और आगे भी रहेगी। 
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