अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘वारिस पंजाब दे’ पंजाब की चुनावी राजनीति में एक ख़तरनाक दाँव चल रही है। इंदिरा गांधी के हत्यारे के बेटे को उम्मीदवार बना कर पार्टी ने साफ़ कर दिया है कि ख़ालिस्तान समर्थक तत्वों को एकजुट करने की राजनीति के रास्ते पर खुल कर आगे बढ़ेगी।
खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘वारिस पंजाब दे’ ने पंजाब विधानसभा चुनाव में एक ख़तरनाक दाँव चल दिया है। इसने इंदिरा गांधी के हत्यारे के बेटे को उम्मीदवार बना कर साफ़ कर दिया है कि वह खुलकर खालिस्तान की रजनीति करेगी।
खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) की ख़ालिस्तान समर्थक तत्वों को एकजुट करने की उसकी खुली राजनीति तब सामने आ गई जब इसने अपना पहला उम्मीदवार घोषित कर दिया। पार्टी ने बसी पठाना विधानसभा सीट से सतवंत सिंह को टिकट दिया है। सतवंत सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में फांसी पाए केहर सिंह के बेटे हैं। इस फ़ैसले के बाद पंजाब की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। सवाल उठ रहा है कि आखिर पार्टी ने ऐसा फ़ैसला क्यों लिया और इसके पीछे उसकी राजनीतिक रणनीति क्या है।
पंथक वोटों को साधने की कोशिश
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फ़ैसला सिख समुदाय के पंथक वोटों को अपने पक्ष में लाने की रणनीति है। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और अमृतपाल सिंह के पिता तरसेम सिंह ने उम्मीदवार की घोषणा करते हुए कहा कि पार्टी की राजनीति सिर्फ सत्ता हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पंथक सिद्धांतों, पंजाब के अधिकारों और सिख समुदाय के लिए 'बलिदान' देने वाले परिवारों के सम्मान के लिए काम कर रही है। उन्होंने कहा कि सतवंत सिंह को टिकट देना उन आरोपों का जवाब भी है, जिनमें कहा जा रहा था कि पार्टी ऐसे परिवारों की अनदेखी कर रही है।
इंदिरा गांधी हत्याकांड से जुड़े परिवारों को साधा
यह पहली बार नहीं है जब पार्टी ने इंदिरा गांधी हत्याकांड से जुड़े परिवारों को प्रमुख भूमिका दी हो। खडूर साहिब से सांसद सरबजीत सिंह खालसा, इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले बेअंत सिंह के बेटे हैं। पार्टी के संसदीय बोर्ड के सदस्य सुखविंदर सिंह अघवान, इंदिरा गांधी के दूसरे हत्यारे सतवंत सिंह के भतीजे हैं। अब केहर सिंह के बेटे सतवंत सिंह को विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार बनाया गया है। इस तरह इंदिरा गांधी हत्या मामले से जुड़े तीनों परिवारों को पार्टी में प्रमुख स्थान मिल गया है।
सतवंत सिंह ने क्या कहा?
पूर्व बैंक मैनेजर रहे सतवंत सिंह ने कहा कि वह लंबे समय से सरबजीत सिंह खालसा और सुखविंदर सिंह अघवान के साथ विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होते रहे हैं। उन्होंने बताया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने सरबजीत सिंह खालसा के प्रचार में भी हिस्सा लिया था। बाद में खालसा और अघवान ने ही उनका नाम पार्टी टिकट के लिए सुझाया।
पिछले कुछ समय से वारिस पंजाब दे पर खालिस्तानी समर्थक और कट्टरपंथी आरोप लगा रहे थे कि वह उन परिवारों को पर्याप्त सम्मान नहीं दे रही, जिन्हें पार्टी समर्थक 'बलिदानी परिवार' मानते हैं।
खालिस्तानी समर्थक और कट्टरपंथियों के दबाव के बीच पार्टी ने इंदिरा गांधी के हत्यारे के बेटे को टिकट देकर संदेश देने की कोशिश की है कि वह पंथक राजनीति को प्राथमिकता देती है।
हाल ही में अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने भी सभी अकाली दलों से अपील की थी कि विधानसभा चुनाव में 30 प्रतिशत टिकट 'बंदी सिखों' और उन परिवारों को दिए जाएँ। उन्होंने कहा था कि यदि ऐसे परिवारों को सम्मान नहीं मिला तो यह सिख समुदाय के साथ अन्याय होगा।
क्यों अहम है यह फ़ैसला?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वारिस पंजाब दे के सामने सबसे बड़ी चुनौती मजबूत संगठन और अनुभवी नेताओं की कमी है। अमृतपाल सिंह 2023 से असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद हैं। ऐसे में पार्टी उनकी लोकप्रियता के साथ-साथ ऐसे चेहरों को आगे लाना चाहती है जिनकी पंथक राजनीति में पहचान हो। इसी रणनीति के तहत हाल के महीनों में पार्टी ने कई नए नेताओं को भी जोड़ा है।
पंजाब की पंथक राजनीति में बदलाव
पंजाब में इस समय पंथक राजनीति तेजी से बदल रही है। शिरोमणि अकाली दल (बादल) का प्रभाव पहले की तुलना में कम हुआ है। कई पुराने अकाली नेता नए विकल्प तलाश रहे हैं। वारिस पंजाब दे इस मौके का फायदा उठाकर खुद को नए पंथक राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहती है। इसी दिशा में पार्टी पहले से ही बंदी सिखों की रिहाई, धार्मिक मुद्दों और सिख पहचान से जुड़े सवालों को लगातार उठा रही है।
वारिस पंजाब दे की राह आसान नहीं?
हालाँकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ भी हैं। पार्टी के पास अभी मज़बूत बूथ स्तर का संगठन नहीं है। कई छोटे पंथक दल सीट बँटवारे में बड़ी हिस्सेदारी चाहते हैं। यदि पार्टी दूसरे दलों के असंतुष्ट नेताओं को शामिल करती है तो उसका मूल समर्थक कट्टरपंथी वर्ग नाराज़ हो सकता है। जेल में बंद अमृतपाल सिंह की गैरमौजूदगी में चुनाव प्रचार भी पार्टी के लिए चुनौती बना रहेगा।
चुनावी असर कितना होगा?
सतवंत सिंह को टिकट देकर वारिस पंजाब दे ने साफ़ संकेत दे दिया है कि वह ख़ालिस्तान समर्थक तत्वों को एकजुट करने की राजनीति के रास्ते पर खुल कर आगे बढ़ेगी। और इसीलिए आगामी विधानसभा चुनाव में पंथक वोटों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ना चाहती है। अब देखना होगा कि यह रणनीति पार्टी को राजनीतिक फायदा दिलाती है या नहीं। साथ ही यह भी साफ़ होगा कि क्या पंजाब के मतदाता इस मुद्दे को चुनावी समर्थन में बदलते हैं या विकास और अन्य स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं।