भूपेश बघेल के '2022 वाली गलती' वाले बयान से पंजाब कांग्रेस में नया बवाल खड़ा हो गया है। चन्नी ने दलित प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाए, गुटबाजी तेज हुई और 2027 चुनाव से पहले कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ीं।
पंजाब कांग्रेस प्रभारी और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के हालिया बयान के बाद पार्टी में नई उथल-पुथल मच गई है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 2027 के विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की पूर्व घोषणा के सवाल पर भूपेश बघेल ने कहा था, '2022 वाली गलती अब नहीं दोहराई जाएगी।' इस बयान के बाद पंजाब कांग्रेस में अविश्वास और मतभेदों की नई खाई खुल गई है।
याद रहे, 2021 में विधानसभा चुनाव से पहले असंतुष्ट नेताओं के अभियान के कारण कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर दलित चेहरे चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। 2022 के चुनाव में कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया था, लेकिन पार्टी हार गई।
पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव फरवरी 2027 में होने हैं। इस बार सभी प्रमुख दल अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। आम आदमी पार्टी अपनी सत्ता बचाने की कोशिश में है, जबकि मुख्य विपक्षी कांग्रेस के लिए प्रदेश में रिवाइवल सबसे बड़ा सवाल है। शिरोमणि अकाली दल अपनी सर्वाइवल की जद्दोजहद में जुटा है और बीजेपी पंजाब पर कब्जा करने के सपने देख रही है।
चन्नी की क्या आपत्ति?
चरणजीत सिंह चन्नी ने कांग्रेस पंजाब की अनुसूचित जाति शाखा के प्रतिनिधित्व को लेकर केंद्रीय प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और अन्य नेताओं के साथ बैठक में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने भूपेश बघेल के बयान पर पार्टी से स्पष्टीकरण की मांग की। जब कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो प्रदेश कार्यालय में एससी विंग की बैठक में मंच से उन्होंने खुलकर अपनी पीड़ा जाहिर की। चन्नी ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस में दलित भाईचारे को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा रहा है। इस बयान ने पार्टी में हलचल मचा दी और जट्ट सिख यानी अपर कास्ट तथा दलित सिख समुदायों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी ने कहा, 'पंजाब में दलितों की आबादी लगभग 35-38% है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष राजा अमरिंदर सिंह वडिंग, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, महिला विंग अध्यक्ष गुरशरण कौर रंधावा, यूथ कांग्रेस प्रधान मोहित महिंद्रा और एनएसयूआई अध्यक्ष ईशरप्रीत सिंह जट्ट सिख समुदाय से हैं। दलित कहाँ गायब हैं?' पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं।
हालाँकि, अगले दिन चन्नी ने स्पष्टीकरण दिया कि उनका बयान किसी जाति के खिलाफ नहीं था। वे सभी वर्गों को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने चन्नी का पक्ष लेते हुए कहा कि पार्टी ने ही चन्नी को मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष बनाया और विधानसभा से दो बार हारने के बाद भी लोकसभा का टिकट दिया।
लेकिन पंजाब से निकला यह संदेश राहुल गांधी के राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों को कांग्रेस से जोड़ने के प्रयासों को झटका दे सकता है। राहुल गांधी ने पहले भी वंचित वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व न मिलने पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी।
पंजाब में जातिगत राजनीति!
पंजाब कांग्रेस में समानांतर एक अभियान भी चल रहा है, जिसमें 34 नेताओं ने हाईकमान को पत्र लिखकर मांग की है कि प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और चुनाव प्रचार समिति के चेयरमैन की नियुक्तियों में उनसे परामर्श किया जाए। चन्नी के बयान की गूंज अब 2027 के चुनाव तक पार्टी को विचलित करती रहेगी। पहले से चल रही गुटबाजी के श्राप से जूझ रही कांग्रेस को जातिगत राजनीति ने फिर धरातल पर ला पटका है।
जातिगत राजनीति पंजाब के लिए नई नहीं है, लेकिन इसका फायदा उठाने से सत्ताधारी आप, भाजपा या अकाली दल चूकने वाली नहीं हैं। भाजपा लंबे समय से पंजाब में अपना जनाधार बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी तक सभी वर्गों में स्वीकार्यता हासिल नहीं कर पाई है।
प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल की इस 'अपरिपक्व' टिप्पणी के प्रभाव को संभालना कांग्रेस नेतृत्व के सामने नई चुनौती है। गुटबाजी खत्म कर पार्टी को एकजुट करने में असफलता भी साफ दिख रही है। पंजाब में वापसी की मजबूत संभावनाओं के बावजूद, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ और गुटबाजी पार्टी के उद्देश्यों के विपरीत काम कर रही हैं।
राजनीतिक करवटें अक्सर नई संभावनाओं के संकेत देती हैं। 2022 के बदलाव के प्रयोग से पंजाब में कोई बड़ा उन्नति का दौर नहीं आया। ऐसे में भाजपा या आप जैसी पार्टियाँ किसी संकट को अवसर में बदलने की कला में माहिर हैं। वर्तमान परिस्थितियों में पंजाब में समय से पहले चुनाव भी संभव हो सकते हैं।