चंडीगढ़ को सीधे केंद्र द्वारा नियंत्रित करने का फ़ैसला वापस क्यों लेना पड़ा और पंजाब बीजेपी ने इस फ़ैसले को लेकर क्या कहा था? इस पर अब कई जीचें साफ़ हो रही हैं। केंद्र सरकार द्वारा चंडीगढ़ को संविधान के अनुच्छेद 240 के तहत लाने वाले प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक का राजनीतिक विरोध हुआ और खुद पंजाब भाजपा ने इससे असहमति जताई थी।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार विधेयक को संसद में पेश करने से ठीक पहले ही केंद्र ने पंजाब बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं को एक अनौपचारिक नोट भेजकर इस कदम के पक्ष में विस्तृत तर्क दिए थे, लेकिन पंजाब भाजपा ने साफ कह दिया कि वह इस फैसले को पंजाब की जनता को समझा पाने में असमर्थ होगी। तो सवाल है कि आख़िर पंजाब में बीजेपी के ही नेता असहमत क्यों थे और उनको क्या डर था?
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नोट में क्या थे केंद्र के तर्क?

द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से ख़बर दी है कि शनिवार को ही पंजाब बीजेपी के शीर्ष नेताओं को भेजे गए इस नोट में कहा गया था कि चंडीगढ़ का वर्तमान संवैधानिक दर्जा, राजधानी की भूमिका व प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह बरकरार रहेगा और सिर्फ़ अनुच्छेद 240 के तहत लाकर राष्ट्रपति को विशेष अधिकार देने से चंडीगढ़ की ख़ास ज़रूरतों के लिए तेजी से और लचीले ढंग से कानून बनाए जा सकेंगे।

रिपोर्ट के अनुसार नोट में कहा गया था कि अभी संसद को ही चंडीगढ़ के लिए कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन 1966 के बाद पंजाब पुनर्गठन अधिनियम और 1987 के कुछ प्रतिनिधित्व कानूनों को छोड़कर कोई विशेष कानून नहीं बना। इसमें यह भी तर्क दिया गया था कि अन्य केंद्रशासित प्रदेश अनुच्छेद 240 के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी से स्थानीय जरूरतों के हिसाब से कानून बना सकते हैं, जबकि चंडीगढ़ को हमेशा पंजाब या हरियाणा के कानूनों को बढ़ाना पड़ता है, जो कई बार उपयुक्त नहीं होते।

रिपोर्ट के अनुसार नोट में यह भी तर्क दिया गया कि छोटे-छोटे संशोधनों के लिए भी संसद की मंजूरी लेनी पड़ती है, जिससे प्रशासनिक दिक्कतें आती हैं।

क्या फायदे बताए गए?

अंग्रेज़ी अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी नेताओं को भेजे गए नोट में इसके कई फायदे बताए गए। कहा गया कि प्रस्तावित बदलाव से बिना कोई बड़ा संवैधानिक परिवर्तन किए राष्ट्रपति के आदेश से ही जरूरी संशोधन हो सकेंगे, जिससे प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी। दावा किया गया कि स्वास्थ्य, स्थानीय सेवाएं, कानून-व्यवस्था, नौकरशाही ढांचा- कुछ भी प्रभावित नहीं होगा। पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी का दर्जा भी यथावत रहेगा।

नोट में यह भी जोर देकर कहा गया था कि यह कदम केवल 'आधुनिक कानूनी ढांचा' देने के लिए है, ताकि चंडीगढ़ अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के बराबर आ सके।
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पंजाब भाजपा ने क्यों जताया कड़ा विरोध?

रिपोर्ट के अनुसार पंजाब बीजेपी नेताओं ने केंद्र को जो फीडबैक दिया, उसमें साफ़ कहा गया कि पंजाब में चंडीगढ़ को लेकर बेहद भावनात्मक लगाव है और अधिकांश लोग मानते हैं कि चंडीगढ़ पंजाब को मिलना चाहिए।

बीजेपी नेताओं का कहना है कि 2020-21 के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के बाद सिख समुदाय के बड़े वर्ग में केंद्र के प्रति पहले से ही अविश्वास और संशय का माहौल है। ऐसे में इस प्रस्ताव को 'चंडीगढ़ के साथ छेड़छाड़' के रूप में देखा जाएगा, भले ही केंद्र का इरादा अच्छा हो।

विधानसभा चुनाव का डर?

रिपोर्ट के अनुसार पंजाब बीजेपी नेताओं ने तर्क दिया कि विधानसभा चुनाव में अभी सिर्फ एक साल से थोड़ा ज्यादा वक्त बचा है, ऐसे समय में यह कदम राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति को अस्थिर कर सकता है और इसे अनावश्यक उकसावा माना जाएगा।
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बीजेपी नेताओं में भी नाराजगी

पंजाब बीजेपी के एक नेता ने अख़बार को नाम न छापने की शर्त पर कहा, 'हमें यह समझ नहीं आ रहा कि ऐसे समय पर यह फैसला क्यों लिया गया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सिख समुदाय से निरंतर संवाद बना रहे हैं। अभी गुरु तेग बहादुर जी का 350वां शहीदी दिवस मनाया जा रहा है, कुशक्षेत्र में प्रधानमंत्री खुद कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी के सीनेट और सिंडिकेट को केंद्रीय नियंत्रण में लाने का मामला भी अभी ठंडा नहीं पड़ा है, लोग दिल्ली की तानाशाही की बात कर रहे हैं। ऊपर से यह नया प्रस्ताव।'

केंद्र का यू-टर्न

राजनीतिक विरोध और सहयोगी दलों की नाराजगी को देखते हुए केंद्र सरकार ने विधेयक को फिलहाल टाल दिया है। सूत्रों का कहना है कि पंजाब बीजेपी की तरफ से मिले फीडबैक के बाद ही केंद्र ने अपना इरादा बदल लिया। चंडीगढ़ को लेकर पंजाब और हरियाणा के बीच दशकों पुराना विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है, और इस बार केंद्र का प्रस्तावित कदम उल्टा पड़ गया।