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कोरोना: यूपी-बिहार से मज़दूर नहीं आएँगे तो बर्बाद हो जाएगी पंजाब की खेती-किसानी

कोरोना वायरस के कारण लगे कर्फ्यू की वजह से पंजाब में लोग घरों में कैद हैं और जो बाहर निकल भी रहे हैं, उनकी अपनी-अपनी मजबूरियाँ हैं। कर्फ्यू के बीच बाहर निकलने वाले लोगों की पुलिस से जमकर भिड़ंत हो रही है। इस महामारी के दौर में भी यह बखूबी साबित हो रहा है कि पुलिस आख़िरकार 'पुलिस' ही है। 

जोरों पर है मुनाफ़ाखोरी 

पंजाब में सरकारी घोषणा की गई थी कि कर्फ्यू के दौरान लोग कतई घरों से बाहर ना निकलें। भरोसा दिलाया गया था कि उन्हें आवश्यक चीजों की कमी नहीं होने दी जाएगी। हेल्पलाइन नंबर जारी कर दिए गए थे। लेकिन हो क्या रहा है? पुलिस सड़कों पर मरीजों तक को पीट रही है और लोगों को मुर्गा बनाने की शर्मनाक पुलिसिया परंपरा को कायम रखे हुए है। कालाबाजारी और मुनाफ़ाखोरी जोरों पर है। जो सब्जी या फल पहले 50 रुपये किलो था वह अब 100 से 150 रुपये किलो तक बिक रहा है। आटे की थैली 100 रुपये तक बेची जा रही है। 

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बिस्किट, ब्रेड, रस्क सहित बेकरी के अन्य सामान भी ऊंचे दामों पर ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बेचे जा रहे हैं। दवाइयों के दाम भी एकाएक बढ़ गए हैं। कुछ प्राइवेट अस्पताल पहले से ही लूट का अड्डा बन चुके हैं। शराब के ठेके बंद हैं लेकिन घरों में तस्करी के जरिये शराब और अन्य नशे आराम से पहुँचाए जा रहे हैं।

असली सवाल उन लोगों का है जो रोजमर्रा से होने वाली कमाई के जरिये 2 जून की रोटी का इंतजाम करते थे। जालंधर शहर के बीचोंबीच एक गांव है रेड़ू। जालंधर-पठानकोट हाईवे पर। यहां किराये के एक कमरे में रहने वाला बक्शीश सिंह का परिवार 2 दिन से भूखा है। राज्य सरकार कहती है कि 10 लाख भूखे लोगों तक खाने के पैकेट पहुँचाए गए हैं लेकिन अब तक बक्शीश सिंह के परिवार तक कोई पैकेट नहीं पहुँचा। 

बक्शीश सिंह की उम्र लगभग 65 साल है। वह रुआंसे होकर कहते हैं, "तीन बार खाने की तलाश में और गुहार लगाने के लिए बाहर शहर (पठानकोट बाईपास) चौक तक गया लेकिन पुलिस ने खदेड़ दिया। गाँव वाले कब तक खाना खिलाएँगे?" 

खैर, कुछ धार्मिक संगठनों ने भी ज़रूरतमंदों को खाना पहुँचाने की घोषणा की है लेकिन जालंधर के ही सोफी पिंड के नीरज कुमार के लिए यह बेमतलब है। इस पत्रकार ने नीरज के सामने ही प्रशासन के कुछ आला अधिकारियों से फोन पर जानना चाहा कि शासनादेश तो यह है कि किसी को भूखा नहीं रखा जाएगा लेकिन यहां तो कई लोग भूखे हैं तो लगभग सभी का यही जवाब था, "आते-आते ही सब कुछ आएगा!" 

पंजाब में कुछ जगहों के हालात यही बता रहे हैं कि कोरोना वायरस से ज़्यादा मौतें शायद भुखमरी और अवसाद/तनाव से हो सकती हैं। प्रशासन अपनी 'रूल बुक' के मुताबिक़ संवेदनशील है लेकिन यथास्थिति के मुताबिक़ निहायत क्रूर तथा असंवेदनशील!

भुखमरी से मौत का ख़तरा

फगवाड़ा के एक किसान परिवार के दो सदस्यों ने सल्फास खाकर अपनी जान दे दी। शेष परिवार अब बेमौत मर रहा है क्योंकि परिवार की महिलाएं तक खेतों में मजदूरी करती थीं लेकिन कर्फ्यू तथा लॉकडाउन ने इस सिलसिले को बेमियादी वक्त के लिए रोक दिया है। 81 साल की निहाल कौर यह कहते हुए रोने लगतीं हैं कि, "पुत्तरा ऐसा वक्त कभी नहीं देखा। हमारे घर के दो बच्चे चले गए कर्ज के कारण। हमने हिम्मत नहीं हारी। लेकिन अब? एक ख़तरा कोरोना वायरस का और दूसरा भुखमरी का। घर में एक पैसा नहीं और उधार देने को कोई तैयार नहीं। किसी को यकीन ही नहीं कि यह सिलसिला कब खत्म होगा और होगा भी तो हालात सामान्य कब होंगे। तमाम लोग नगद लेकर सामान दे-ले रहे हैं। हम कहां जाएं?"   

कटाई के इंतजार में गेहूं की फसल

सूबे में गेहूं की फसल एकदम तैयार है और कटने के इंतजार में है। लगता नहीं कि इस बार गेहूं की फसल अपने मुफीद मुकाम तक पहुंचेगी। देशव्यापी लॉकडाउन के चलते प्रवासी मजदूर आएंगे नहीं। पंजाब के खेत फसल कटाई के वक्त उन्हीं के हवाले रहते हैं। किसान यूपी-बिहार से आने वाले मज़दूरों के इंतजार में हैं लेकिन रेलगाड़ियां रद्द हैं।

प्रवासी मजदूरों पर निर्भरता

जालंधर जिले के रुपेवाली गांव के एक किसान, मदनलाल जिन्होंने 70 एकड़ जमीन पर गेहूं की फसल खड़ी की है, वह कहते हैं, "दोआबा के किसान परिवारों के ज्यादातर बच्चे विदेशों में हैं और मशीनों के बावजूद फसल कटाई और बुवाई के लिए हम लोग पूरी तरह उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और राजस्थान से आने वाले प्रवासी मजदूरों पर निर्भर हैं। लेकिन अब वे नहीं आएंगे क्योंकि आवाजाही के सारे साधन पूरी तरह बंद हैं। पंजाब में कर्फ्यू है तो उनके राज्यों में लॉकडाउन।" 

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कर्फ्यू के चलते सड़ गईं फसलें 

राज्य में शुक्रवार सुबह तेज हवाओं के साथ बारिश हुई जो ज्यादातर फसलों के लिये तेजाब की तरह है। राज्य के जिन खेतों में गेहूं से इतर फसलें लगाईं गईं थीं, वे पककर तैयार हुईं, कट कर हाथों में भी आईं लेकिन कर्फ्यू के चलते बेमौत मारी गईं यानी सड़ गईं। लगभग 18000 हेक्टेयर खेतिहर भूमि में ऐसी फसलें होतीं हैं और फल भी। अब सब कुछ तबाह है। धरती बेशक बंजर नहीं है लेकिन उससे भी बदतर हालत में है। यह सारा कहर तब दरपेश है जब पंजाब की किसानी पहले से ही कर्ज के जानलेवा मकड़जाल में फंसी हुई है। 

पंजाब में रिकॉर्ड पैमाने पर किसान और स्थानीय खेत मजदूर खुदकुशी के लिए मजबूर हैं। कोरोना वायरस, कर्फ्यू और लॉकडाउन की सुर्खियों के बीच ख़बर मिली कि जिला मानसा के बरेटा में 27 वर्षीय एक किसान ने आत्महत्या कर ली। कीटनाशक निगलकर जान देने वाले इस किसान हरपाल सिंह पर 7 लाख रुपये का कर्ज था। इस सवाल का जवाब कौन देगा कि देशव्यापी संकट के बीच किसने किसान से कर्ज वापस मांगा होगा और किसे यह कर्ज अदा करने का उस पर इतना मारक दबाव रहा होगा?

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अमरीक
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