वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन का विश्लेषण: पढ़िए पंजाब चुनाव में गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति, बीजेपी-अकाली दल समीकरण, आप सरकार की चुनौतियाँ और कांग्रेस की संभावनाएँ क्या।
चाहे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फ्री हैंड देना वजह हो या कुछ और, जिस तरह से गृह मंत्री अमित शाह पंजाब चुनाव को लेकर सक्रिय हैं वह इस अपेक्षाकृत छोटे राज्य के चुनाव को भी काफ़ी दिलचस्प बना देता है। माना जाता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में योगी बनाम अमित शाह की खींचतान ने भी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की नैया डुबोने का काम किया। इस बार भी पिछले प्रदर्शन को आधार बनाकर दोनों एक दूसरे का कद घटाना और अपना कद बढ़ाना चाहते थे। खैर। पंजाब में अमित शाह ने पिछली बार भी कम मेहनत नहीं की थी और ड्रग के कारोबार को रोकने के नाम पर नेशनल हाइवे से जाने कितने मीटर दूर तक नशीले पदार्थों की बिक्री रोकने और निगरानी का ज़िम्मा केन्द्रीय बलों को देने जैसे विवादास्पद क़ानूनी बदलाव भी किये। पर जब पार्टी खास प्रदर्शन नहीं कर पाई तो सारा दोष एनडीए के पार्टनर अकाली दल और इसके एक मंत्री और बादल परिवार के रिश्तेदार विक्रम मजीठिया के सिर मढ़ा गया। पिछली बार 117 सीटों में से बीजेपी को दो और अकाली दल को तीन सीटें मिली थीं।
पंजाब में बीजेपी कोई लाभ नहीं ले पाई
असल में बीजेपी अभी हाल तक प्रदेश की राजनीति में मुख्य खिलाड़ी रही भी नहीं थी और उसके लिए मैदान में ताल ठोंकना और बड़ी-बड़ी बातें करना भी हल्का लगता था। लेकिन पिछली बार आप ने जिस तरह से पंजाब को जीता वह बीजेपी के लिए ही नहीं किसी भी नए खिलाड़ी के लिए एक उदाहरण बन सकता है। आप 2014 में एक बार लोकप्रिय होकर पिट चुकी थी और 2017 में उसके हाथ आती बाजी कांग्रेस ने जीत ली थी। पिछली बार आप ने कांग्रेस को पटखनी देकर अपना बदला ले लिया लेकिन पंजाब की राजनीति में दिग्गज रहे कांग्रेस और अकाली दल की गिरावट का बीजेपी कोई लाभ नहीं ले पाई तो सारा नजला अकालियों पर गिरा। उस पर भी यह हुआ कि अकालियों ने विवादास्पद कृषि कानून लाने पर बीजेपी और एनडीए से नाता तोड़ लिया था और अब भी वह मतदाता सूची की गहन पुनरीक्षा को लेकर संशय में है। पर चुनावी साथी की जरूरत बीजेपी को है तो अकालियों को भी बैसाखी चाहिए। अब सवाल यह बन गया है कि सीनियर पार्टनर कौन होता है अर्थात किसको ज्यादा सीटों पर लड़ने का अवसर मिलता है। बीजेपी को यहां तक ला देना भी अमित शाह और उसके साथी रणनीतिकारों की एक उपलब्धि है।
और इसको असली ताक़त लोकसभा के पिछले चुनाव के नतीजों से मिली है जो बीजेपी के लिए किसी के अनुमान से बेहतर रहे हैं। बीजेपी को विधानसभा की 23 सीटों पर बढ़त मिली तो शिरोमणि अकाली दल को मात्र नौ स्थानों पर। कांग्रेस को सबसे ज्यादा 37 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली तो आप को 33 सीटों पर। जाहिर है इस रिजल्ट के आधार पर पंजाब की लड़ाई अभी खुली लगती है। और इसी आधार पर इस बार बीजेपी अकालियों से ज्यादा सीटों की बात चला रही है। पर कुछ बातें अमित शाह और बीजेपी के रणनीतिकारों को ध्यान में रखनी चाहिए। यह चुनाव लोकसभा का नहीं, विधानसभा का है और इसमें बीजेपी के पास मोदी जी जैसा कोई चेहरा नहीं है।
बीजेपी के सामने मुश्किल
अनेक कारणों से बीजेपी का संगठन अभी गाँव गाँव तक नहीं है और सिखों का वोट पाना उसके लिए खासा मुश्किल है। अकालियों के संग लड़ने पर भी यही देखने में आया है कि मोर्चा के अकाली उम्मीदवार को तो हिन्दू वोट मिल जाते हैं लेकिन बीजेपी के उम्मीदवार को सिख वोट नहीं मिलते। दूसरी चीज बीजेपी द्वारा निरंतर अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके बाहरी लोगों- जिनमें फ़िल्म वालों, पूर्व नौकरशाहों और दूसरे दलों से आए नेताओं का अनुपात बहुत ज़्यादा है, को चुनाव में अवसर देना भी है। ऐसे लोग केंद्र में मंत्री तक बने हैं जबकि स्थानीय कार्यकर्ता सिर्फ दरी बिछाने तक रह गए।
जानी मानी हस्तियों को आखिरी वक्त टिकट देने की बात अभी छोड़ दें तो बीजेपी और इसके सूत्रधार अमित शाह ने काफी सारे नेता दूसरे दलों से तोड़े हैं। सबसे ताजा और बड़ा खेप तो राघव चड्ढा के नेतृत्व में आप के सांसदों को तोड़ने का है।
अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ जैसे पुराने कांग्रेसी दिग्गज इधर आकर न कुछ कर पाए और न कुछ पा सके लेकिन अभी भी मनीष तिवारी से लेकर कई कांग्रेसी दिग्गजों के पाला बदलने की चर्चा उड़ती रहती है। कांग्रेस में जिस तरह की गुटबाजी है और केन्द्रीय नेतृत्व जिस तरह बेपरवाह रहता है उसमें तय मानिए कि अभी कई विकेट गिरेंगे। और अगर कांग्रेस संभलकर लड़ी तो उसके लिए अपना खोया प्रदेश हासिल करके का अवसर है। उसके पास नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं की फौज है और समाज के हर वर्ग में पैठ भी है। बात सिर्फ भरोसा बनाने की है और यह कम बड़ी शर्त नहीं हैं। और दूसरे दलों से लोग तोड़ने में बीजेपी ने अकाली दल को भी निशाना बनाया जिसके एक बड़े नेता मनजीत सिंह बादल को उसने अपनी ओर कर लिया है।
बीजेपी के निशाने पर आप
लेकिन अभी तो अमित शाह और बीजेपी की केंद्र सरकार के निशाने पर आप है। और अगर आप पिछले विधानसभा चुनाव के पहले की दिल्ली की स्थिति को याद कर सकें तो आपको वही दृश्य पंजाब में दोहराया जाता दिखेगा। अब आप के लोग कोई दूध के धुले हों और भगवंत मान की सरकार ने कोई झंडे गाड़ दिए हों, यह नहीं है, लेकिन खुद मान साहब और उनके साथियों के साथ पिछले कुछ समय से केंद्र की एजेंसियों के माध्यम से जो व्यवहार हो रहा है, वह अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येन्द्र जैन जैसों के साथ चले मामलों जैसा ही दिखाता है। यहां कोई नई शराब नीति भी नहीं बनी है और न ठेका देने में संदेहास्पद तरीकों का आरोप है। पर जिस तरह भगवंत मान को विदेश से आने पर दिल्ली हवाई अड्डे पर ज्यादा खरीद और अघोषित सामान रखने के नाम पर पकड़ा गया वह विशुद्ध अपमान था और किसी अन्य मुख्यमंत्री के साथ ऐसे व्यवहार की याद आपको नहीं होगी। हमने देखा है कि जब राघव चड्ढा की अगुवाई में आप के सांसदों को तोड़ने का प्रयास हो रहा था तो वहां भी साम दाम दंड भेद सब उपाय करने की बात सामने आई। एक सांसद महाराज तो जेल भी गए और बाद में सब कुछ बीजेपी के वाशिंग मशीन में धुल गया। अब एंटी इंकम्बेन्सी से जूझ रही आप को कमजोर कड़ी मानकर उसकी घेरेबंदी तेज करना और सही मुद्दों पर हमले बढ़ाना तो ठीक रणनीति है लेकिन सवाल बड़ा यह है कि क्या इन सबसे बीजेपी पंजाब जीत पाएगी।