पंजाब चुनाव से पहले नेतृत्व में वैसी ही कलह शुरू हो गयी जैसी 2022 के चुनाव से पहले चन्नी के सीएम बनाए जाने के बाद नवजोत सिद्धू की नाराजगी से हुई थी। तो क्या मौजूदा चुनाव में बढ़त बनाती दिख रही कांग्रेस ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है?
राजा वडिंग बनाम चरणजीत सिंह
पंजाब में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले प्रदेश पार्टी नेतृत्व में अंदरुनी कलह तब और खुलकर सामने आ गई जब मंगलवार को हुई एक अहम बैठक से चरणजीत सिंह चन्नी गुट ग़ायब रहा। बैठक पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल के नेतृत्व में थी। बैठक में राज्य की मौजूदा राजनीतिक स्थिति, पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 के लिए पार्टी की रणनीति पर विचार करने जैसे अहम मुद्दे थे। रिपोर्ट है कि चन्नी अपने समर्थकों के साथ दिल्ली जाने की तैयारी में हैं। इस बीच, पार्टी नेतृत्व में क़लह की ख़बरों को प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने खारिज करते हुए कहा है कि एकता बरकरार है और जल्द ही सभी एक मंच पर साथ होंगे।
पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी की मंगलवार को अहम बैठक हुई, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी तथा वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा इसमें शामिल नहीं हुए। इससे पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान की चर्चाओं को और बल मिला। हालाँकि, पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और कुछ नेताओं का बैठक में शामिल न हो पाना सामान्य बात है।
राजा वडिंग ने कहा कि चन्नी और रंधावा दोनों ने पहले ही बैठक के अध्यक्ष को सूचित कर दिया था कि वे शहर से बाहर हैं और दो-तीन दिन बाद उपलब्ध होंगे। उन्होंने कहा, 'जिन नेताओं को बुलाया गया था, वे बैठक में आए। दो नेताओं ने पहले ही अपनी अनुपस्थिति की जानकारी दे दी थी।'
राजा वडिंग बोले- 'मसाला नहीं है'
बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में राजा वडिंग ने कहा कि कुछ जिला अध्यक्ष अमरनाथ यात्रा पर गए हुए हैं, इसलिए वे बैठक में नहीं आ सके। उन्होंने कहा, 'लोग मसाला ढूंढ़ रहे हैं, लेकिन मेरे पास देने के लिए कोई मसाला नहीं है। हर बैठक में एक-दो लोग किसी न किसी कारण से नहीं आ पाते। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है।' उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही पंजाब कांग्रेस के सभी बड़े नेता एक मंच पर साथ दिखाई देंगे और मीडिया को संबोधित करेंगे, जिससे पार्टी की एकजुटता साफ नजर आएगी।
बैठक से पहले दिल्ली रवाना हुए चन्नी!
मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी बैठक में शामिल होने के बजाय अपने समर्थक नेताओं के साथ दिल्ली पहुंचे हैं। बताया जा रहा है कि चन्नी कांग्रेस आलाकमान के सामने पंजाब संगठन में नेतृत्व संबंधी फ़ैसलों पर अपनी नाराजगी दर्ज कराना चाहते हैं।कांग्रेस ने हाल ही में अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने और प्रताप सिंह बाजवा को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए रखने का फ़ैसला किया है। इसी फ़ैसले से चन्नी खेमे में असंतोष है।
नेतृत्व को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
पंजाब कांग्रेस में पिछले कई हफ्तों से प्रदेश अध्यक्ष बदलने की चर्चाएँ चल रही थीं। इसी बीच, कांग्रेस हाईकमान ने पार्टी के भीतर राय जानने के लिए कई दौर की बैठकें कीं और एक समिति भी बनाई। लेकिन अंत में संगठन में कोई बदलाव नहीं किया गया और राजा वडिंग को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा गया। इसके बाद से चन्नी समर्थकों की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी।
2022 जैसी स्थिति बनने का डर
कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि यदि समय रहते मतभेद दूर नहीं किए गए तो 2022 विधानसभा चुनाव जैसी स्थिति दोबारा बन सकती है। 2022 के चुनाव से पहले भी पार्टी में नेतृत्व को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा था। उस समय नवजोत सिंह सिद्धू, तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और बाद में अमरिंदर सिंह की जगह सीएम बनाए गए चरणजीत सिंह चन्नी के बीच टकराव ने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया था।इस बार भी राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजा वडिंग और चरणजीत सिंह चन्नी दोनों खुद को मुख्यमंत्री पद का मजबूत दावेदार मानते हैं, जिससे संगठन के भीतर खींचतान बढ़ रही है।
कई नेता मानते हैं कि 2022 की गलती दोहराई जा रही है। हाई कमांड गुटों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इससे साफ़ नेतृत्व नहीं उभर पा रहा है। माना जा रहा है कि यदि समय रहते एकजुटता नहीं बनी तो वोट शेयर फिर गिर सकता है, कार्यकर्ता घर बैठ जाएंगे या दूसरे दलों की ओर चले जाएंगे और इससे आप और बीजेपी दोनों को फायदा होगा।
कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की कोशिश कर रही कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती फ़िलहाल अपनी पार्टी को एकजुट रखना है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यदि अंदरूनी विवाद जल्द खत्म नहीं हुआ तो चुनाव से पहले संगठन कमजोर हो सकता है और इसका फायदा विरोधी दलों को मिल सकता है।फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि पार्टी में कोई बड़ा मतभेद नहीं है, लेकिन बैठक से प्रमुख नेताओं की गैरमौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर असहमति अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
2022 में आंतरिक लड़ाई ने कांग्रेस को 'स्वयं का दुश्मन' बना दिया था। 2027 से पहले अगर चन्नी-वडिंग विवाद, गुटबाजी और हाई कमांड की अनिश्चितता नहीं सुलझी तो इतिहास दोहराने की पूरी आशंका है।