सांप्रदायिक तनाव और आबादी में बदलाव के मद्देनजर, राजस्थान सरकार ने 'अशांत क्षेत्रों' में अचल संपत्ति का ट्रांसफर या बेचने को रोकने वाले विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी है। बीजेपी शासित राजस्थान में अल्पसंख्यक विरोधी इस प्रस्तावित कानून पर तमाम सवाल हो रहे हैं।
राजस्थान सरकार एक ऐसा कानून लाने जा रही है, जो अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के नज़रिए से खतरनाक है। इस प्रस्तावित विधेयक में किसी भी क्षेत्र को अशांत घोषित करने, साम्प्रदायिक तनाव और दंगों के दौरान संपत्तियों की बिक्री पर रोक जैसे प्रावधान हैं। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की अध्यक्षता में 21 जनवरी 2026 को कैबिनेट बैठक में 'राजस्थान अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के ट्रांसफर पर रोक तथा परिसर से किरायेदारों को बेदखली से संरक्षण विधेयक, 2026' के ड्राफ्ट को मंजूरी दे दी गई है। यह विधेयक राज्य विधानसभा के आगामी बजट सत्र में पेश किया जाएगा।
विधेयक के प्रमुख प्रावधानों के अनुसार, राज्य सरकार को अधिकार मिलेगा कि वह हिंसा, भीड़ द्वारा उपद्रव या "अनुचित क्लस्टरिंग" (improper clustering) के कारण आबादी में बदलाव वाले क्षेत्रों को 'अशांत क्षेत्र' (disturbed areas) घोषित कर सके। ऐसे क्षेत्रों में सक्षम प्राधिकारी (जैसे जिला मजिस्ट्रेट) की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी अचल संपत्ति (इमूवेबल प्रॉपर्टी) का ट्रांसफर अमान्य और शून्य माना जाएगा। उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे, जिसमें 3 से 5 वर्ष तक की कैद तथा जुर्माने का प्रावधान है।
यह कानून मुख्य रूप से उन स्थितियों से निपटने के लिए लाया जा रहा है, जहां दंगों या साम्प्रदायिक अशांति के दौरान स्थायी निवासियों को अपनी संपत्तियां बहुत कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। साथ ही, कुछ क्षेत्रों में किसी विशेष समुदाय की आबादी तेजी से बढ़ने से आबादी का असंतुलन पैदा हो रहा है, जिससे सामुदायिक सद्भाव बिगड़ रहा है और स्थानीय निवासियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इस कानून के ज़रिए अल्पसंख्यकों और आदिवासियों की ज़मीनों पर अप्रत्यक्ष प्रभावी नियंत्रण सरकार को मिल जाएगा।
कैबिनेट बैठक के बाद संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने पत्रकारों से कहा, "हमने देखा है कि कुछ क्षेत्रों में किसी विशेष समुदाय की आबादी तेजी से बढ़ रही है... यह जनसांख्यिकीय असंतुलन सामुदायिक सद्भाव को बिगाड़ता है और स्थायी निवासियों के लिए कठिनाइयां पैदा करता है। दंगों और जन-उपद्रव की स्थिति में विशेष कानून की जरूरत है।"
यह विधेयक गुजरात में लागू समान कानून की तर्ज पर तैयार किया गया है। सरकार का दावा है कि इससे सामुदायिक सद्भाव और सामाजिक संरचना को बनाए रखने में मदद मिलेगी।
वहीं, विपक्षी कांग्रेस ने इस विधेयक की कड़ी आलोचना की है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे भाजपा की "सांप्रदायिक मानसिकता" का हिस्सा बताते हुए कहा कि यह कानून राज्य में भय का माहौल पैदा करेगा, नौकरशाही को असीमित शक्तियां देगा और निवेशकों को हतोत्साहित करेगा। उन्होंने कहा, "जनसांख्यिकीय असंतुलन कोई कानूनी शब्द नहीं है। क्षेत्र को अशांत घोषित करने का कोई आधार निर्दिष्ट नहीं किया गया है। भाजपा गुजरात मॉडल अपनाकर सत्ता में बने रहना चाहती है।"
यह विधेयक राज्य में साम्प्रदायिक तनाव को नियंत्रित करने की दिशा में सरकार का एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित बता रहा है।
बीजेपी की साम्प्रदायिक मानसिकताः कांग्रेस
विपक्षी दल कांग्रेस ने इस विधेयक की कड़ी आलोचना की है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे भाजपा की "सांप्रदायिक मानसिकता" का हिस्सा बताते हुए कहा कि यह कानून राज्य में भय का माहौल पैदा करेगा, नौकरशाही को असीमित शक्तियां देगा और निवेशकों को हतोत्साहित करेगा। उन्होंने कहा, "जनसांख्यिकीय असंतुलन कोई कानूनी शब्द नहीं है। क्षेत्र को अशांत घोषित करने का कोई आधार निर्दिष्ट नहीं किया गया है। भाजपा गुजरात मॉडल अपनाकर सत्ता में बने रहना चाहती है।"
गुजरात का अशांत अधिनियम क्षेत्र
गुजरात में एक ऐसा कानून है जो सदियों से शहरों की गलियों में छिपी आशंकाओं को नियंत्रित करने की कोशिश करता है। 1991 में शुरू हुआ यह 'अशांत क्षेत्र अधिनियम' (Disturbed Areas Act) मूल रूप से दंगों और सांप्रदायिक हिंसा के दौरान लोगों को अपनी संपत्ति मजबूरी में सस्ते दामों पर बेचने से रोकने के लिए बनाया गया था। कल्पना कीजिए, अहमदाबाद या वडोदरा की उन संकरी गलियों में जहां कभी दंगे भड़क उठते थे, वहां घर के मालिक डर से अपनी जमीन या मकान बहुत कम कीमत पर बेच देते थे। कानून ने कहा कि ऐसे 'अशांत क्षेत्रों' में कोई भी अचल संपत्ति का हस्तांतरण बिना जिला कलेक्टर की अनुमति के अमान्य होगा। कलेक्टर जांच करता है कि बिक्री स्वेच्छा से हो रही है, उचित मूल्य पर है और कोई दबाव नहीं है। किरायेदारों को भी बेदखली से बचाने का प्रावधान है, ताकि हिंसा के बाद वे अपनी जगह से न उखाड़े जाएं।
समय के साथ यह कानून और सख्त होता गया। 2020 में आए संशोधनों ने इसे नया रूप दिया। अब कलेक्टर को यह देखने का अधिकार मिला कि क्या कोई संपत्ति ट्रांसफर से किसी समुदाय की 'अनुचित क्लस्टरिंग' या 'ध्रुवीकरण' हो रहा है, जिससे क्षेत्र की जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ सकता है। पांच सौ मीटर तक आसपास के इलाकों को भी शामिल किया जा सकता है, और उल्लंघन पर 3 से 5 साल की जेल और जुर्माने की सजा का प्रावधान है।
हालांकि, ये संशोधन विवादास्पद रहे- कुछ ने इसे सांप्रदायिक सद्भाव बचाने का हथियार कहा, तो कुछ ने इसे अलगाव और भेदभाव बढ़ाने वाला बताया। 2021 में हाई कोर्ट ने कुछ हिस्सों पर रोक लगाई, और 2023 में सरकार ने कुछ प्रावधान वापस लेने की बात कही, लेकिन कानून आज भी गुजरात के कई शहरों में लागू है, जहां संपत्ति खरीद-बिक्री अब सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि प्रशासन की निगरानी में होती है- एक ऐसा कानून जो शांति की रक्षा के नाम पर शहर की सीमाओं को फिर से परिभाषित कर रहा है।