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प्रधानमंत्री, प्रज्ञा ठाकुर और एक राष्ट्र की जान जोख़िम में!

क्या यह महज संयोग है कि बीते पाँच वर्षों में पहली बार देश के कई हिस्सों में नाथूराम गोडसे की महिमा या पूजा-अर्चना के समारोह आयोजित हुए? ज़्यादा दूर की क्या कहें, अलवर (राजस्थान) और मेरठ (यूपी) तो राष्ट्रीय राजधानी के बिल्कुल पास हैं, जहाँ गोडसे की महिमा में तरह-तरह के कार्यक्रम हुए! दोनों राज्यों में तब बीजेपी सरकार थी, यूपी में आज भी है। केंद्र और राज्य सरकारों का उन घटनाक्रमों पर क्या नजरिया था? 
उर्मिेलेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को बीजेपी मुख्यालय में आयोजित पार्टी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस से कुछ देर पहले एक न्यूज़ चैनल को दिये चुनावी इंटरव्यू में कहा कि उन्हें प्रज्ञा सिंह ठाकुर के (महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बताने वाले) बयान पर गहरा दुख है और इसके लिए वह प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कभी मन से माफ़ नहीं कर सकेंगे! लेकिन प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जब प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से पार्टी का उम्मीदवार बनाने के फ़ैसले का सवाल उठा तो प्रधानमंत्री की मौजूदगी में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने जवाब दिया, ‘प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उम्मीदवार बनाना ‘भगवा आतंक’ के (आरोप के) ख़िलाफ़ हमारा सत्याग्रह है।’
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यह कैसा सत्याग्रह!

एक तरफ़ दुख है, दूसरी तरफ़ सत्याग्रह है! ‘आतंकी-हिंसा और मालेगाँव विस्फोट कांड की अभियुक्त’ और भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार प्रज्ञा सिंह ठाकुर के विस्फोटक बयान से मोदी-शाह क्या वाक़ई दुखी हैं या 19 मई को होने वाले अंतिम चरण के मतदान के मद्देनजर लोगों के सामने अपनी राजनीतिक शालीनता दर्शाने का यह महज एक रणनीतिक-उपक्रम है? 

चलो, थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि मोदी और शाह वाक़ई प्रज्ञा ठाकुर से क्षुब्ध हैं! फिर वे शब्दों में ही क्षोभ क्यों जाहिर कर रहे हैं? उनका क्षोभ कार्रवाई में भी झलकना चाहिए!
यह मान लिया कि भोपाल का चुनाव हो चुका है। फिर भी पार्टी महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बताने के लिए प्रज्ञा सिंह ठाकुर को दंडित कर सकती है, उसे बाहर का रास्ता दिखा सकती है। प्रज्ञा को पार्टी उम्मीदवार बनाने के लिए पूरे देश से माफ़ी माँग सकती है! एनआईए पर सरकारी दबाव डालकर उन्हें बचाने का ‘सरकारी-संघी धंधा’ बंद‌ करा सकती है! 
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कौन नहीं जानता कि बीते पाँच सालों से प्रज्ञा और ‘उसकी आतंक-आरोपी टीम’ को बचाने के लिए एनआईए पर लगातार दबाव डाला जाता रहा है। अगर प्रधानमंत्री मोदी प्रज्ञा से इतने दुखी हैं कि उसे माफ़ नहीं करना चाहते तो उनकी सरकार मालेगाँव मामले में क़ानून को अपना काम करने की आज़ादी तो दे सकती है! लेकिन यहाँ तो दोनों नेता बता रहे हैं कि उनकी पार्टी ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर ‘भगवा आतंक’ के आरोप के ख़िलाफ़ सत्याग्रह किया! शाह ने जब प्रेस कॉन्फ़्रेंस में यह बात कही तो प्रधानमंत्री मोदी ने इससे अपनी असहमति नहीं जताई। दोनों मंच पर साथ थे यानी ‘सत्याग्रह वाली टिप्पणी’ सरकार और पार्टी की साझा राय की अभिव्यक्ति थी।
मेरा सवाल है - अगर ‘भगवा आतंक’ का आरोप झूठा या निराधार है तो उसका जवाब तो न्यायालय हो सकता है, जहाँ यह मुक़दमा आज भी चल रहा है। असल ‘सत्याग्रह’ तो वहाँ पेश करना चाहिए, ‘भगवा आतंक’ को ग़लत साबित करने वाले ठोस तथ्यों को रखकर। पर भोपाल में क्या हुआ? मोदी-शाह ने न्यायालय के फ़ैसले का इंतजार नहीं किया। उन्होंने ‘आतंकी हिंसा और षडयंत्र’ की आरोपी को संसद भवन में पहुँचने का टिकट दे दिया। अब तो यह जनता पर निर्भर करता है कि वह उसे संसद भवन भेजे या रास्ते से बैरंग लौटा दे।
साध्वी प्रज्ञा ने कहा था, ‘(महात्मा गाँधी के हत्यारे) नाथूराम गोडसे ‘देशभक्त’ थे, ‘देशभक्त’ हैं और ‘देशभक्त’ रहेंगे। जो लोग उन्हें आतंकवादी कहते हैं उन्हें अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए।’ प्रज्ञा ने अपनी विचारधारा के अनुसार अपने ‘मन की बात’ ही तो कही!
प्रज्ञा के अनेक सियासी पूर्वज भी यही कहते रहे - ‘नाथूराम गोडसे जी एक देशभक्त थे!’ उसके समकालीन भी कह रहे हैं - केद्रीय मंत्री रहे अनंत हेगड़े और पार्टी के निर्वतमान सांसद नलिन कुमार कटील। जो लोग ऐसा नहीं कह रहे हैं, वह एक ढकोसला है, एक तरह की रणनीतिक एहतियात! क्या यह महज संयोग है कि बीते पाँच वर्षों में पहली बार देश के कई हिस्सों में नाथूराम गोडसे की महिमा या पूजा-अर्चना के समारोह आयोजित हुए? ज़्यादा दूर की क्या कहें, अलवर (राजस्थान) और मेरठ (यूपी) तो राष्ट्रीय राजधानी के बिल्कुल पास हैं, जहाँ गोडसे की महिमा में तरह-तरह के कार्यक्रम हुए! दोनों राज्यों में तब बीजेपी सरकार थी, यूपी में आज भी है। केंद्र और राज्य सरकारों का उन घटनाक्रमों पर क्या नजरिया था?
कुछ ही दिनों पहले एक कथित साध्वी ने मेरठ में गाँधी जी की तसवीर पर उसी तरह गोलियाँ चलाईं, जिस तरह 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी पर प्रार्थना सभा के दौरान चलाई थीं।
ये ‘संत’ और ‘साध्वियाँ’ हमारी आज की सियासत में किसकी पैदाइश हैं? यह बात भी आईने की तरह साफ़ है कि ऐसे तमाम तत्व घोर वर्णवादी और वैचारिक रूप से मनुवादी होते हैं। अनेक हिन्दुत्ववादी संगठनों की औपचारिक-अनौपचारिक बैठकों में आज भी महात्मा गाँधी को जिस अपमानजनक ढंग से संबोधित किया जाता है, वह किसी से छिपी बात नहीं है। हाल ही में एक सिरफिरे ने कहा, ‘महात्मा गाँधी भारत के नहीं, पाकिस्तान के राष्ट्रपिता होंगे!’
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क्या यह सच नहीं कि जिस दिन गाँधी जी की नृशंस हत्या की गई, नागपुर के कुछ ख़ास हलकों में प्रसन्नता जताई गई थी? यह महज संयोग नहीं कि गाँधी जी की हत्या के महज चार दिनों बाद 4 फरवरी, 1948 को देश में सांप्रदायिक विद्वेष का माहौल पैदा करने के गंभीर आरोप में आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया गया था। 
क्या यह सच नहीं है कि जो विनायक दामोदर सावरकर मौजूदा सत्ता के संचालकों और संपूर्ण संघ परिवार के पूजनीय हैं, वही सावरकर नाथूराम गोडसे के प्रेरणास्त्रोत भी थे!

गाँधी जी की हत्या मामले में अभियुक्त थे सावरकर

सावरकर भी गाँधी हत्याकांड के एक प्रमुख अभियुक्त थे और उन पर हत्या की साजिश में शामिल रहने का आरोप लगा था। लेकिन वह ठोस सबूतों के अभाव में छूट गये थे। पर बाद में कपूर कमीशन ने सन 1969 की अपनी जाँच रिपोर्ट में उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत पाए थे। यह भी तथ्य है कि सावरकर के समर्थन और सहयोग से गोडसे ने कुछ समय तक पुणे से एक स्थानीय अख़बार भी निकाला। एनडीए-1 के राज में सावरकर की एक बड़ी तसवीर संसद के केंद्रीय कक्ष में लगाई गई। 

भारत की जान लेने पर आमादा विचार!

विचारधारा के स्तर पर इसे आप क्या कहेंगे? मैं ‘हिंदू आतंक’ या ‘मुसलिम आतंक’ कभी नहीं कहता! मैं भी मानता हूँ कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता! पर आतंक की राजनीति और वैचारिकी तो होती है! इसलिए मैं इस प्रवृत्ति को ‘मनुवादी आतंक’ कहता हूँ! नाथूराम गोडसे, नारायण दत्तात्रेय आप्टे, विनायक दामोदर सावरकर, गोपाल गोडसे और उनके अन्य सहयोगी यही तो थे। कथित हिंदुत्ववादी संगठनों और सभाओं ने उन्हें दीक्षित किया था। मनुवादी सोच और सांप्रदायिक कट्टरता के जहरीले विचार उन्हें इन्हीं संगठनों-सभाओं में मिले थे! तब इन ज़हरीले विचारों ने इस देश के राष्ट्रपिता की जान ले ली थी। आज वही विचार भारत नामक इस महान राष्ट्र की जान लेने पर आमादा हैं!

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