लगता है कि प्रधानमंत्री ने ग़ालियों को दिल पर कुछ ज़्यादा ही ले लिया है। जेन ज़ी को माफ़ करने के बावजूद वे उसे भूल नहीं पा रहे हैं। फ्रेंड्स की ग़ालियाँ अब भी उनके मन में काँटों की तरह चुभती रहती हैं।
देश चाहे उनके बारे में कुछ भी सोचे, जेन ज़ी उन्हें कितना ही अनपढ़, नालायक या पुराना मॉडल घोषित करे, मगर उनका दिल तो मोम का बना हुआ है। वे अखरोट की तरह हैं- बाहर से सख़्त, भीतर से नरम। फ़र्क़ बस इतना है कि अखरोट को तोड़ने के लिए पत्थर चाहिए और उनके लिए ट्रेंडिंग हैशटैग ही काफ़ी है।
वास्तव में दरियादिल नेता इसी तरह सोचता है। कोई और प्रधानमंत्री होता तो “रात गई, बात गई” कहकर आगे बढ़ जाता, लेकिन वे ऐसे आदमी नहीं हैं। वे उन छात्र-छात्राओं को लेकर लगातार चिंतित हैं। उनका भविष्य कैसे सँवारा जाए, उनकी प्रतिभा को कैसे दिशा दी जाए, उनकी ग़ालीबाज़ी को राष्ट्र निर्माण में कैसे लगाया जाए- यही सोचते रहते हैं।
उनका मानना है कि देश में बेरोज़गारी भले ही बढ़ती रहे, मगर प्रतिभा की बर्बादी नहीं होनी चाहिए। इसी मान्यता के तहत वे ग़ालीबाज़ों को यथोचित सम्मान और पुरस्कार देते रहते हैं।
प्रधानमंत्री को ग़ाली देने वाले बच्चों से कितना प्यार है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने उनके इंस्ट्राग्राम वाले वीडियो पहले ही मँगवा लिए थे। जिनके चेहरों की पहचान पुलिस और दूसरी एजेंसियों ने कर ली थी, उनकी रिपोर्ट भी उनके पास पहुँच चुकी है। वे पूरी सहानुभूति के साथ विचार कर रहे हैं कि इन आंदोलनकारियों को भविष्य कैसे बनाया जाए।
ताज़ा ख़बरें
हालाँकि यह बात सही है कि आंदोलनकारियों की जीत के बाद से उन्हें एक तरह की हार का एहसास भी सता रहा था। किसी को भी सताएगा। अगर वह देश का प्रधानमंत्री हो, तब तो और भी। उन्होंने माफ़ी ज़रूर दे दी थी, लेकिन वे गाँधीवादी तो हैं नहीं। संघ का प्रशिक्षण उन्हें कुछ और करने के लिए प्रेरित करता है।
फिर वे हार मानने वाले आदमी भी नहीं हैं। उनके लिए यह साबित करना ज़रूरी है कि वे हारे नहीं हैं, उन्होंने मैदान छोड़ा नहीं है, बस रणनीतिक लिहाज़ से पीछे हटे हैं। इतिहास इसे पराजय की तरह दर्ज़ नहीं करता, उसके लिए तो ये रणनीतिक चाल है।
मोदी जी पर इस हार को जीत में बदलने की धुन उन पर ऐसी सवार हुई कि वे नाना प्रकार के जतन कर रहे हैं। उन्हें पता है कि असली विजय तभी मानी जाएगी जब जेन ज़ी को उसी की पिच पर हराया जाए।
क्रिकेट में हारो तो दूसरी सीरीज़ खेल लो, चुनाव में हारो तो अगला चुनाव लड़ लो, मगर सोशल मीडिया में हार जाओ तो इतिहास के पन्नों में नहीं, मीम्स के फ़ोल्डर में दर्ज हो जाते हो।
लाल क़िले से भी उन्होंने अपनी यही सदिच्छा ज़ाहिर की थी। “दिमाग़ी नक्सल” का जुमला उन्होंने यूँ ही नहीं उछाला था। पंद्रह-बीस दिनों के गहन चिंतन-मनन, मनन पर पुनः चिंतन और चिंतन पर फिर से समीक्षा के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि दिमाग़ी नक्सलियों को दिमाग़ी पैदल बनाना होगा।
राजनीति में हर समस्या का समाधान शब्दकोश बदलने से शुरू होता है। जब वास्तविकता परेशान करे, तो नया जुमला खोज लो।

जेन ज़ी को अपने प्रभाव का अंदाज़ा ही नहीं है। वह सोच रही होगी कि उसने तो बस कुछ ग़ालियाँ दी हैं। उसे क्या पता कि दिल्ली में उसकी ग़ालियों का फ़ोरेंसिक विश्लेषण हो रहा है। भाषाविद् बुलाए गए हैं। मनोवैज्ञानिक बुलाए गए हैं। कुछ वरिष्ठ नेता तो इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यदि इन बच्चों को समय रहते नहीं रोका गया तो वे भविष्य में व्यंग्य भी करने लगेंगे, जो लोकतंत्र के लिए और भी ख़तरनाक है।

बताया जाता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है, जिसका नाम है—"राष्ट्रीय ग़ाली क्षमता संवर्धन मिशन"। समिति का काम यह पता लगाना है कि जेन ज़ी के लड़के-लड़कियाँ इतनी नई-नई ग़ालियाँ कहाँ से सीख रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर बताया कि सरकार इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना चाहती है। ध्यान रहे, सरकार न कि देश।
और देखिए, वे नए योद्धाओं के साथ मैदान में उतर पड़े हैं। वे जेन ज़ी को खुला चैलेंज दे रहे हैं—“आ जाओ, कर लो मुक़ाबला।” उनमें एक नया आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है। जंतर-मंतर आंदोलन के बाद वे सदमे में थे, हैरान भी थे। उन्हें धक्का लगा था कि ये कल के लड़के-लड़कियाँ उन्हें परास्त कैसे कर सकते हैं, उनसे आगे कैसे निकल सकते हैं। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने सच स्वीकार किया और अब पूरी तैयारी के साथ फिर मैदान में हाज़िर हैं।
जेन ज़ी, सावधान हो जाओ। वह समय और था। उस समय जब तुमने हमला किया था, दुश्मन सावधान नहीं था और राउंड वन में तुम्हारी विजय हो गई थी। लेकिन अब नहीं जीत पाओगे। तुम्हारी सोशल मीडिया स्किल्स धरी की धरी रह जाएँगी। तुम मीम बनाओगे, वे महामीम बनाएँगे। तुम ट्रोल करोगे, वे ट्रोलाचार्य उतार देंगे। तुम हैशटैग चलाओगे, वे हैशटैग का शतचंडी यज्ञ कर देंगे।

ज़रा आँखें खोलकर देखो। सामने बीजेपी की नई आईटी सेना खड़ी है। एक से एक धुरंधर ग़ालीबाज़ उसमें तैनात किए गए हैं। अमित मालवीय इसलिए नप गए कि ग़ालीबाज़ी की इस आधुनिक स्पर्धा में तुमसे पिछड़ गए थे।

ये भी सुना जा रहा है कि पार्टी अब आईटी सेल में नई भर्ती प्रक्रिया पर विचार कर रही है। लिखित परीक्षा में पूछा जाएगा—“एक पत्रकार, एक प्रोफ़ेसर और एक छात्र को एक ही ट्वीट में अपमानित करने की सर्वश्रेष्ठ विधि क्या है?” इंटरव्यू में उम्मीदवार को पाँच मिनट में सात झूठ, नौ आरोप और ग्यारह व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करनी होंगी। जो उम्मीदवार तथ्य का सहारा लेगा, वह तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
आईटी सेल कार्यकर्ताओं के लिए बाक़ायदा प्रशिक्षण शिविर भी लगाए जाएँगे। पहले दिन का विषय होगा—"हर विषय को अस्सी बनाम बीस में कैसे बदलें"। दूसरे दिन—"किसी भी मुद्दे को पाकिस्तान तक पहुँचाने की उन्नत तकनीक"। तीसरे दिन प्रायोगिक परीक्षा होगी, जिसमें उम्मीदवार को एक मौसम संबंधी पोस्ट में भी राष्ट्रवाद सिद्ध करना होगा।
कहा जा रहा है कि गुजरात में “राष्ट्रीय ग़ाली विश्वविद्यालय” भी खोला जा सकता है। वहाँ ट्रोल विज्ञान, चरित्र हनन प्रबंधन, फ़ेक न्यूज़ इंजीनियरिंग और आईटी सेल दर्शन जैसे विषय पढ़ाए जाएँगे। पीएचडी का विषय होगा—“लोकतंत्र में अपशब्दों की रचनात्मक भूमिका”। स्वर्णपदक उस छात्र को मिलेगा जो बिना किसी तथ्य के सबसे ज़्यादा लोगों को राष्ट्रद्रोही साबित कर दे।
वैसे भी जो नए योद्धा तैनात किए गए हैं उन्होंने ग़ालीबाज़ी में ऐसी महारत हासिल कर रखी है कि भाषा भी उनसे डरकर शब्दकोश में छिप जाती है। उन्होंने बचपन से, बल्कि कहा जाता है कि गर्भावस्था से ही इसका अभ्यास शुरू कर दिया था।
उन्हें ऐसे परिवेश में पाला गया जहाँ तर्क को कमजोरी और शोर को शक्ति माना जाता था। वे मानते हैं कि बहस वह कला है जिसमें प्रतिद्वंद्वी को ग़लत साबित नहीं करना पड़ता, बस इतना काफ़ी है कि उसे बोलने न दिया जाए।

जेन ज़ी के रणबाँकुरो, मैदान में उतरने से पहले उनके पुराने पोस्ट देख लेना। ये लोग चरित्र हनन में उस्ताद हैं। ख़ास तौर पर महिलाओं के मामले में तो उन्होंने ऐसी दक्षता हासिल कर ली है कि कभी-कभी लगता है जैसे यह उनका राजनीतिक कौशल नहीं, सांस्कृतिक विरासत हो।

लेकिन जेन ज़ी को कमज़ोर समझना भूल होगी। यह वही पीढ़ी है जिसने बचपन में कार्टून देखते-देखते मीम बनाना सीख लिया, किशोरावस्था में शिक्षकों की नकल उतारी और युवावस्था में नेताओं को ट्रेंड करा दिया। इन बच्चों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन्हें किसी चीज़ का डर नहीं लगता। न प्रिंसिपल का, न थानेदार का, न प्रवक्ता का। इन्हें सिर्फ़ धीमे इंटरनेट से डर लगता है।
जेन ज़ी की यह शायद सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि है कि उसने देश की सबसे बड़ी पार्टी को बच्चा बना दिया है।
लेकिन इस महायुद्ध का सबसे रोचक पक्ष अभी बाकी है। पहली बार भारत में दो पीढ़ियाँ आमने-सामने हैं—एक वह जो मानती है कि सत्ता सम्मान से बड़ी चीज़ है, और दूसरी वह जो मानती है कि मीम सत्ता से बड़ा हथियार है।
एक तरफ़ संगठित आईटी सेल है, दूसरी तरफ़ बिखरे हुए इंटरनेट योद्धा। एक तरफ़ प्रशिक्षित ट्रोल हैं, दूसरी तरफ़ बेरोज़गार रचनात्मकता। एक तरफ़ रणनीति है, दूसरी तरफ़ जुनून।
देखना दिलचस्प होगा कि यह लड़ाई कहाँ जाकर रुकती है। जेन ज़ी है, जिसे लगता है कि हर सत्ता का मज़ाक बनाया जा सकता है। सत्ता को लगता है कि हर आरोप या सवाल को साज़िश साबित किया जा सकता है। एक तरफ़ मीम है, दूसरी तरफ़ मशीनरी।
जेन ज़ी को ये ख़ुशफ़हमी छोड़नी होगी कि ग़ाली का जवाब माफ़ी से मिलेगा। वे गाँधी के नहीं गोडसे के अनुयायी हैं। वे पहले ग़ाली का जवाब ग़ाली से देंगे और फिर गोली से।